नन्हकू और झबरू
रात हो चली है, नन्हकू का कुत्ता भी ससुर भूँकते भूँकते सो गया. लेकिन नन्हकू को आज नींद नहीं आ रही. आये भी कैसे? कल दोपहर में नुक्कड़ के भोज के पत्तलों से जो दाने चाटे थे, उसके बाद कुछ मिला है भला? आसमान में कितने तारे हैं? सुना है कि मरने के बाद लोग तारे बन जाते हैं. तो क्या नन्हकू के माँ बाप भी तारा बन गये हैं? बचपन से आजतक, जब से याद है तब से, उन्हीं उन्हीं तारों को देखता रहा है. कभी कभी बादल छा जायें तो देख नहीं पाता बेचारा. वैसे उस वक्त देखने की फ़ुरसत भी कहाँ होती है? उस बखत तो बस सर छुपाने के लिये जगह ही ढूँढता है. लेकिन कभी भी उन तारों में अपने माँ की मूरत नजर नहीं आती. या क्या पता आती भी हो? वो भला पहचानेगा कैसे? जब से याद है तब से इस कुत्ते के अलावा और कोई तो याद नहीं आता.
आखिर भगवान ने कैसी दुनिया बनायी है. धरती पर बड़े छोटे का फ़र्क बना दिया तो बना दिया. लेकिन ये आसमान भी उससे अछूता कहाँ है? आसमान में भी तो बड़े तारे और छोटे तारों का फ़र्क होता है. और नन्हकू के बाप जैसे तारे तो शायद दूरबीन लगा के देखने से भी नहीं दिखें. अगर एक दूरबीन होती तो मजा आ जाता. कुत्ते की गुर्राहट से चौंका तो नन्हकू को फिर याद आया कि पेट में कुछ भी नहीं है. आज तो झबरू भी भूखा ही है. नहीं नहीं! ये स्साला भूखा नहीं होगा. ये कहीं ना कहीं से सूँघ के कुछ खा ही चुका होगा. और फिर जानवर होने का यही तो फायदा है कि कहीं से भी किसी की जूठन खाओ कोई कुछ नहीं कहता. सच! यहाँ तो जूठन भी लोग कुत्ते को देते हैं. नन्हकू के लिये तो बस गालियाँ हैं. इससे तो बेहतर होता कि मैं कुत्ता होता. हे भगवान! पिछले जनम के पाप का सारा बदला इसी जनम में निकाल लो. अगले जनम के लिये ये कष्ट का खाता बंद कर देना. और हो सके तो अगले जनम में मुझे कुत्ता ही बनाना.
हाँ ये ठीक होगा! खाने के ज्यादा टंटे नहीं होंगे और कल क्या खाऊँ - इसकी फ़िकर भी नहीं होगी. आखिर कुत्ते की बुद्धि ही कितनी होती है जो उसे चिंता होगी. चिंता तो दिमाग वालों को ही होती है. नन्हकू दिमाग वाला है यह सोचकर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गयी. लेकिन कल के खाने का क्या जुगाड़ हो? दिमाग चलने का नाम ही नहीं ले रहा. चलते चलते थक कर सो गया. दिमाग के साथ साथ नन्हकू को भी नींद आ गयी.
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आज तीसरा दिन है. कहीं कुछ नहीं मिला. काम तो देते नहीं कोई. फटे कपड़े देखकर ही लोग नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं. अरे भाई! नन्हकू कोई चोर नहीं है. लेकिन किसी को ये बात समझाये कैसे? आखिर लोगों का भी क्या दोष. ऐसे गंदे कपड़े पहनने वाले लोग कभी सभ्य हो सकते हैं भला? भीख भी नहीं मिलेगी. शरीर चलने लायक जो है.
आज रहा नहीं जा रहा. झबरू आज फिर आराम से सो रहा है. शायद किसी रईस के यहाँ से चिकेन तंदूरी खा कर आया होगा. पेट की आग सही नहीं जा रही. दिमाग भी जलने लगा है. क्या करे, क्या ना करे? ऐसी हालत में तो फाँसी लटका लेना चाहिये. नन्हकू को जीवन से प्रेम भी तो है. क्या जबर्दस्त मरॊड़ उठी है पेट में. सुना है कि अकाल के बखत बंगाल में आदमी आदमी को खा जाता था. नन्हकू के लिये हर रोज अकाल ही है लेकिन आज तक उसने किसी आदमी को नहीं खाया. छीः! भूखा पेट कैसी कैसी बातें सोचने को मजबूर करता है. आदमी कोई खाने की चीज है? क्यों नहीं है भाई? माँस ही तो है. फिर वो बकरी हो या किसी मुर्गे का या इंसान का. सुना है कि कुछ लोग खाते भी हैं लाशें. उन्हें बड़ी सुविधा होती होगी ना? रोज ही तो लोग मरते हैं, उनका पेट हमेशा भरा होता होगा. झबरू स्साला खुद तो खा के आ गया और अब डकार ले रहा है. झबरू! नन्हकू के पास दिमाग नहीं है, इस बार 'ये' सोच कर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी.
आज वो भरपेट खायेगा. तो क्या हुआ कि कल से उसे अकेले सोना होगा. वैसे भी झबरू स्साला भूँकता बहुत है.
आखिर भगवान ने कैसी दुनिया बनायी है. धरती पर बड़े छोटे का फ़र्क बना दिया तो बना दिया. लेकिन ये आसमान भी उससे अछूता कहाँ है? आसमान में भी तो बड़े तारे और छोटे तारों का फ़र्क होता है. और नन्हकू के बाप जैसे तारे तो शायद दूरबीन लगा के देखने से भी नहीं दिखें. अगर एक दूरबीन होती तो मजा आ जाता. कुत्ते की गुर्राहट से चौंका तो नन्हकू को फिर याद आया कि पेट में कुछ भी नहीं है. आज तो झबरू भी भूखा ही है. नहीं नहीं! ये स्साला भूखा नहीं होगा. ये कहीं ना कहीं से सूँघ के कुछ खा ही चुका होगा. और फिर जानवर होने का यही तो फायदा है कि कहीं से भी किसी की जूठन खाओ कोई कुछ नहीं कहता. सच! यहाँ तो जूठन भी लोग कुत्ते को देते हैं. नन्हकू के लिये तो बस गालियाँ हैं. इससे तो बेहतर होता कि मैं कुत्ता होता. हे भगवान! पिछले जनम के पाप का सारा बदला इसी जनम में निकाल लो. अगले जनम के लिये ये कष्ट का खाता बंद कर देना. और हो सके तो अगले जनम में मुझे कुत्ता ही बनाना.
हाँ ये ठीक होगा! खाने के ज्यादा टंटे नहीं होंगे और कल क्या खाऊँ - इसकी फ़िकर भी नहीं होगी. आखिर कुत्ते की बुद्धि ही कितनी होती है जो उसे चिंता होगी. चिंता तो दिमाग वालों को ही होती है. नन्हकू दिमाग वाला है यह सोचकर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गयी. लेकिन कल के खाने का क्या जुगाड़ हो? दिमाग चलने का नाम ही नहीं ले रहा. चलते चलते थक कर सो गया. दिमाग के साथ साथ नन्हकू को भी नींद आ गयी.
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आज तीसरा दिन है. कहीं कुछ नहीं मिला. काम तो देते नहीं कोई. फटे कपड़े देखकर ही लोग नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं. अरे भाई! नन्हकू कोई चोर नहीं है. लेकिन किसी को ये बात समझाये कैसे? आखिर लोगों का भी क्या दोष. ऐसे गंदे कपड़े पहनने वाले लोग कभी सभ्य हो सकते हैं भला? भीख भी नहीं मिलेगी. शरीर चलने लायक जो है.
आज रहा नहीं जा रहा. झबरू आज फिर आराम से सो रहा है. शायद किसी रईस के यहाँ से चिकेन तंदूरी खा कर आया होगा. पेट की आग सही नहीं जा रही. दिमाग भी जलने लगा है. क्या करे, क्या ना करे? ऐसी हालत में तो फाँसी लटका लेना चाहिये. नन्हकू को जीवन से प्रेम भी तो है. क्या जबर्दस्त मरॊड़ उठी है पेट में. सुना है कि अकाल के बखत बंगाल में आदमी आदमी को खा जाता था. नन्हकू के लिये हर रोज अकाल ही है लेकिन आज तक उसने किसी आदमी को नहीं खाया. छीः! भूखा पेट कैसी कैसी बातें सोचने को मजबूर करता है. आदमी कोई खाने की चीज है? क्यों नहीं है भाई? माँस ही तो है. फिर वो बकरी हो या किसी मुर्गे का या इंसान का. सुना है कि कुछ लोग खाते भी हैं लाशें. उन्हें बड़ी सुविधा होती होगी ना? रोज ही तो लोग मरते हैं, उनका पेट हमेशा भरा होता होगा. झबरू स्साला खुद तो खा के आ गया और अब डकार ले रहा है. झबरू! नन्हकू के पास दिमाग नहीं है, इस बार 'ये' सोच कर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी.
आज वो भरपेट खायेगा. तो क्या हुआ कि कल से उसे अकेले सोना होगा. वैसे भी झबरू स्साला भूँकता बहुत है.