नन्हकू और झबरू

रात हो चली है, नन्हकू का कुत्ता भी ससुर भूँकते भूँकते सो गया. लेकिन नन्हकू को आज नींद नहीं आ रही. आये भी कैसे? कल दोपहर में नुक्कड़ के भोज के पत्तलों से जो दाने चाटे थे, उसके बाद कुछ मिला है भला? आसमान में कितने तारे हैं? सुना है कि मरने के बाद लोग तारे बन जाते हैं. तो क्या नन्हकू के माँ बाप भी तारा बन गये हैं? बचपन से आजतक, जब से याद है तब से, उन्हीं उन्हीं तारों को देखता रहा है. कभी कभी बादल छा जायें तो देख नहीं पाता बेचारा. वैसे उस वक्त देखने की फ़ुरसत भी कहाँ होती है? उस बखत तो बस सर छुपाने के लिये जगह ही ढूँढता है. लेकिन कभी भी उन तारों में अपने माँ की मूरत नजर नहीं आती. या क्या पता आती भी हो? वो भला पहचानेगा कैसे? जब से याद है तब से इस कुत्ते के अलावा और कोई तो याद नहीं आता.

आखिर भगवान ने कैसी दुनिया बनायी है. धरती पर बड़े छोटे का फ़र्क बना दिया तो बना दिया. लेकिन ये आसमान भी उससे अछूता कहाँ है? आसमान में भी तो बड़े तारे और छोटे तारों का फ़र्क होता है. और नन्हकू के बाप जैसे तारे तो शायद दूरबीन लगा के देखने से भी नहीं दिखें. अगर एक दूरबीन होती तो मजा आ जाता. कुत्ते की गुर्राहट से चौंका तो नन्हकू को फिर याद आया कि पेट में कुछ भी नहीं है. आज तो झबरू भी भूखा ही है. नहीं नहीं! ये स्साला भूखा नहीं होगा. ये कहीं ना कहीं से सूँघ के कुछ खा ही चुका होगा. और फिर जानवर होने का यही तो फायदा है कि कहीं से भी किसी की जूठन खाओ कोई कुछ नहीं कहता. सच! यहाँ तो जूठन भी लोग कुत्ते को देते हैं. नन्हकू के लिये तो बस गालियाँ हैं. इससे तो बेहतर होता कि मैं कुत्ता होता. हे भगवान! पिछले जनम के पाप का सारा बदला इसी जनम में निकाल लो. अगले जनम के लिये ये कष्ट का खाता बंद कर देना. और हो सके तो अगले जनम में मुझे कुत्ता ही बनाना.

हाँ ये ठीक होगा! खाने के ज्यादा टंटे नहीं होंगे और कल क्या खाऊँ - इसकी फ़िकर भी नहीं होगी. आखिर कुत्ते की बुद्धि ही कितनी होती है जो उसे चिंता होगी. चिंता तो दिमाग वालों को ही होती है. नन्हकू दिमाग वाला है यह सोचकर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गयी. लेकिन कल के खाने का क्या जुगाड़ हो? दिमाग चलने का नाम ही नहीं ले रहा. चलते चलते थक कर सो गया. दिमाग के साथ साथ नन्हकू को भी नींद आ गयी.

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आज तीसरा दिन है. कहीं कुछ नहीं मिला. काम तो देते नहीं कोई. फटे कपड़े देखकर ही लोग नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं. अरे भाई! नन्हकू कोई चोर नहीं है. लेकिन किसी को ये बात समझाये कैसे? आखिर लोगों का भी क्या दोष. ऐसे गंदे कपड़े पहनने वाले लोग कभी सभ्य हो सकते हैं भला? भीख भी नहीं मिलेगी. शरीर चलने लायक जो है.

आज रहा नहीं जा रहा. झबरू आज फिर आराम से सो रहा है. शायद किसी रईस के यहाँ से चिकेन तंदूरी खा कर आया होगा. पेट की आग सही नहीं जा रही. दिमाग भी जलने लगा है. क्या करे, क्या ना करे? ऐसी हालत में तो फाँसी लटका लेना चाहिये. नन्हकू को जीवन से प्रेम भी तो है. क्या जबर्दस्त मरॊड़ उठी है पेट में. सुना है कि अकाल के बखत बंगाल में आदमी आदमी को खा जाता था. नन्हकू के लिये हर रोज अकाल ही है लेकिन आज तक उसने किसी आदमी को नहीं खाया. छीः! भूखा पेट कैसी कैसी बातें सोचने को मजबूर करता है. आदमी कोई खाने की चीज है? क्यों नहीं है भाई? माँस ही तो है. फिर वो बकरी हो या किसी मुर्गे का या इंसान का. सुना है कि कुछ लोग खाते भी हैं लाशें. उन्हें बड़ी सुविधा होती होगी ना? रोज ही तो लोग मरते हैं, उनका पेट हमेशा भरा होता होगा. झबरू स्साला खुद तो खा के आ गया और अब डकार ले रहा है. झबरू! नन्हकू के पास दिमाग नहीं है, इस बार 'ये' सोच कर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

आज वो भरपेट खायेगा. तो क्या हुआ कि कल से उसे अकेले सोना होगा. वैसे भी झबरू स्साला भूँकता बहुत है.

अढ़ाइ किल्लो

- साढ़े तीन किल्लो से कम में ना होखी ए मालिक.
- हाँ, तहराऽ के पाँच किल्लो देवऽ तानी
- बाबूजी! सब मँहगा गइल बाटे. तीन किल्लो में परती ना पड़ी.
- ना कैसे पड़ी हो? तहार बाप के पड़ जात रहल. अऽ तहार परतिए ना पड़ी. तूँ ही बड़का लाट साहेब भइल बाड़.
- बाप के जमाना में दुअन्नी में खाना मिलर रहे. अभी नीमकवो पाँच रुप्ल्ली का हो गैल हऽ
- तऽ इ में हम का करीं? कउनो हमार नीमक कम्पनी हई? ४० साल से ३ किल्लो फ़िक्स हऽ. वही मिली.
- जरी दया करीं मालिक. दिन भर भरल दुपहरिया में काम करब. तऽ साढ़े तीन किल्लो चाऊ कोई बेसी नइखे.
- जब बेसी नैखे तऽ काहे खाती नौटंकी करते बाड़?
- मालिक तहरा खाती बेसी नइख. हमरा लागी तऽ बहुते ना बा?
- मने अब तू हूँ बहुते माँगे लगलऽ ना हो? लागता कि तहरा काम करे के मन नइखे. इ बिंदिवा के, बुनेसरा के, सुरऽमिया के, सब के भूखहीं ना रखब हो? साढ़े तीन तऽ तहरा मिले से रहल. इ भर गाँव में केहु ना दिहीस. जा तुहूँ बम्बई. बाकी सुनऽ तानीं कि हुओं से मार के भगात हवन सब के. जा साले! लात खइह आऊ का.
- ए मालिक! घर दुआर छोड़ के थोड़े ना जाइब. रऊए जरी खयाल करीं.
- खयाल तऽ हम करहीं लिहली हऽ हो. तहरा साढे तीन चाही आऊ हम तीन से एक्को ग्राम फ़ालतू ना देहब.
- साढ़े तीन किल्लो दे दीहीं मालिक.
- अरे तहराऽ दे दें तब का बाकि ना माँगिहन. तहरा आधा किल्लो बुझात हऽ आउ ससुरा हम १०० ठो मजूरा रखले बानीं तऽ एक - डेढ़ मन ऐसहीं बर्बाद ना हो जायी.
- बरबाद कहाँ मालिक. तहार खाम तऽ तहार जसवो तो गाम.
- इ सब कुछ ना! हमरा दे देवे से सबके देवे के पड़ी. अऽ फिर हमरोऽ गाली पड़ी कि हमहीं मजूरन के भाड़ा बढ़ा दिहली. तऽ कल से तू मत अइहो.
- अइसन गजब ना करीं.
- हमार ना इ तहारे करल गजब हऽ. अब खइह सारे सुथनी.
- ना मालिक ऐसन ना कहीं. तीने किल्लो दे दीहीं.
- ना! अब तहराऽ अढ़ाइये मिली. सब के पता तऽ चले की जादे मुँह चींघारे से का होखेला.

पिलीज

- काहे रे छौंरा! बात काहे नहीं सुन रहा है रे?
- तोर बात कौची सुनें? तुमको बोलने आता है पहिले ढंग से?
- मनेऽ अब हम बुढ़रिया में बोले के ढंग सीखें?
- लैका थे तब ना सीखे तऽ अब तो सीखना परबे करेगा.
- सार! तोरा हम जखनी से एगो छोटा सा काम कह रहे हैं तऽ नौटंकी झाड़ रहे हो?
- निमऽन से कहोगे तब्बे ना काम करेंगे.
- अब नीमन से बोले हमको नहीं आता है.
- तऽ हमरो कोई काम धाम करे ना आता है.
- ठीक है तब! बोलिहो हमरा से कुछ. तब हम भी ढंग सिखावेंगे.
- पहले अपने सीखिये तब हमको सीखाइयेगा.
- इ सब बकवास कहाँ से सीख के आते हो बे?
- इ बकवास नहीं है, पढ़ाई है. इस्कूल में बताया गया है.
- इस्कूलिया में इ बताया गया है कि बाप के तू-तड़ाक करियो?
- तु बाप नहीं है. डईडी है. आउ ईंग्रेजी में सबको यु-ए कहा जाता है. तऽ हम हिन्दी अनुवाद में सबको तू कहते हैं. अपने ना भेजे थे अंग्रेजी इस्कूल में.
- हुआँ इ सीखा है कि बाप का काम ना करियो?
- नहीं! जबतक कोई ’पिलीज’ ना बोले तब तक नहीं करता हूँ.
- इ पिलीस का है? ’मारेंगे तऽ मुँह टूट जायेगा’ के अंग्रेजी है?
- इ तऽ नहीं मालूम. बाकी बिना पिलीज सुने हम कोई कमवे ना करेंगें
- पिलीज, अब जा के अलुआ कबाड़! नहीं तऽ हिन्दी में ’मारेंगे तऽ मुँह टूट जायेगा’.

सुमित्रा के लिये - बिसनु द्वारा

देखो सुमित्रा! अब इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है. दोष तो किसी का नहीं. लेकिन, किसी ना किसी को दोषी ठहराये बगैर मन ना मानता हो तो मुझे ही दोषी ठहराना. तुम्हारी इसमें कोई गलती नहीं. मुझे पता है कि मैंने तुमसे जितने भी वादे किये उनमें से आधे से ज्यादा पूरे नहीं कर सका - इसका मुझे अफसोस है कि नहीं ये भी नहीं जानता. हा! ना जानने का अफ़सोस जरूर रहेगा. एक तरह से तुम बच गयी, गढ्ढे में गिरने से. आखिर ऐसे झूठे आदमी के साथ रहकर भी तुम कैसे जी पाती? ऐसे नाकारा के साथ रहने का क्या फ़ायदा जो अपने वादे भी पूरे नहीं करता हो और पिछले साल तो मैं तुम्हारा जन्मदिन भी भूल गया.

बहुत भुलक्कड़ हो गया हूँ. इसलिए तुम्हें भूलने में भी मुझे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिये. अब तुमसे माफी माँगकर तुम्हारे प्रेम को गाली तो नहीं दूँगा लेकिन मन ही मन मैं शर्मिंदा हूँ. तुमने उन लोगों की बात बतायी थी ना, जो वस्तु की तरह मासूम लड़कियों को इस्तेमाल करके छोड़ देते हैं, जिन्हें मैंने ना जाने कितनी गालियाँ दी थी - आज मैं खुद को भी उनकी श्रेणी में खड़ा पाता हूँ. तुम ऐसा नहीं मानती क्युँकि तुमने तो प्रेम किया है मुझसे. लेकिन येबात भी तो वैसी ही है ना. मैंने भी तो वही किया. यदि मैं इतना ही कमजोर हूँ तो फिर मुझे प्रेम करने का ही क्या अधिकार था.

लेकिन सुमित्रा, तुम तो जानती हो कि जिंदगी अपनी हो कर भी अपनी कहाँ होती है? आधे पर परिवार का शासन होता है और शेष आधे पर इस निष्ठुर समाज का, जो हमें कभी भी साथ रहने नहीं देगा. कभी कभी क्रोध तो आता है. लगता है कि सब कुछ छोड़ छाड़ कर तुम्हारे साथ एक अलग दुनिया बसा लूँ, लेकिन कैसे? दुनिया कभी अकेली होती है भला? और भाग जाऊँगा तो मेरे बूढ़े लाचार माँ बाप का क्या होगा? घर में जो दो अनब्याही बहनें बैठी हैं, उनका क्या होगा? कौन करेगा एक भगोड़े और जात निकाले की बहन से शादी? और फिर दहेज का इतना सारा पैसा कहाँ से आयेगा? समझो कि तुम्हारा बिसनु अब शिव बनके ऐसा विष पीने जा रहा है जिससे उसके अलावा सारे जग का कल्याण होगा. अपने कल्याण की बात सोचने का अधिकार नहीं. अब इतना स्वार्थी कैसे बन जाऊँ? तुम ही कहो!

ये सब मुझे पहले सोचना चाहिये था - तुम्हारा ये कहना बिल्कुल सही है. लेकिन प्यार कभी सोच विचार के तो होता नहीं. वो तो बस हो गया और होते ही सारी परिस्थिति तुम्हें बतायी तो थी. तुम्हीं तो कहती थी कि जो होगा वो देख लेंगे. अब देखने का वक्त आ गया है, देखो! देखो कि कैसे आदमी का कद एक दिन में बौना हो जाता है, देखो कि एक क्षण में दुनिया का कायापलट कैसे होता है. देखो कि दो लोगों के प्रेम से कितने लोग घबराते हैं. सोचा तो था सब कुछ. लेकिन अगर सोचा हुआ ही हो जाता तो दुनिया में हर कोई तत्क्ष्ण ही मोक्ष ना पा लेता? सोचा तो था उस वत. लेकिन अब वक्त के बदलने से सारी चीजें बदल गयी हैं.

मैं पता नहीं इतनी बकवास कैसे कर रहा हूँ. लेकिन एक बात साफ़ है सुमित्रा कि मैंने तुमसे सच्चे हृदय से प्रेम किया था. तुम कहती हो कि ये तुम्हारा दोष है जो मुझपे भरोसा कर लिया. लेकिन नहीं! दोष नहीं है तुम्हारा. क्युँकि तुम्हारा भरोसा तो सच्चा ही था. इसिलिए कह रहा हूँ कि किसी ना किसी को दोषी ठहराये बगैर मन ना मानता हो तो मुझे ही दोषी ठहराना. मैं धोखेबाज हूँ. गालियाँ देना मुझे. इन सब यत्नों से मझे भूलने में तुम्हें बड़ी मदद मिलेगी. मगर मेरा नसीब तो देखो, कि मेरे पास ऐसी भी कोई सुविधा नहीं. मैं तुम्हें भूलने का यत्न करूँ भी तो मन को पीड़ा होती है और अपने आप को बड़ा ही तुच्छ एवं क्षुद्र समझने लगता हूँ. तुरत ही तुम्हारा आकार इतना बड़ा हो गया है कि तुम्हारी छाया में मैं खुद को बौना महसूस कर रहा हूँ.

तुम्हारा बिसनु मजबूर है - यह कहके मैं तुम्हारे कोप से बचने की कोशिश नहीं करूँगा. लेकिन एक बात याद रखना सुमित्रा कि मैंने तुम्हें सच्चे दिल से अपनाया था. जो बातें अब बातें लग रहीं हैं, वो बातों से बढ़कर थी. सिद्ध करने का कोई तरीका तो है नहीं मेरे पास. सो, जो मन में आये सोचना. तुम्हारी याद दिल में हमेशा बनी रहेगी और मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे दिल में मेरा जो भी थोड़ा बहुत अवशेष है - वो जल्दी ही नष्ट हो जाये.

- भूतपूर्व तुम्हारा

आज कुछ लिखने बैठा हूँ

लिखने बैठा हूँ. कुछ सूझ नहीं रहा. पर लिखने का कीड़ा निरंतर जोर मार रहा है. कुछ तो लिखना ही होगा वरना मन के उस अभिमान का क्या होग जो मानता है कि मैं भी एक लेखक हूँ, कम से कम लेखक बनने की अपार संभावनाओं से भरा तो हूँ ही. सो, मिथ्या को सच बनाने के लिये कुछ सोचना होगा. वैसे भी आजकल अधिकांश लोग लिखते कहाँ हैं? हर कोई तो अपने भ्रम को सत्य माने ही कागज काला करता है. (उपमा गलत हो गयी. कीबोर्ड का जिक्र आना था. लेकिन मुहावरों का प्रयोग ना करूँ तो लेखक कौन मानेगा?)

सोचता हूँ कि छत से लटक रहे मकड़ी के जाले के बारे में लिख दूँ. मेरी अकर्मण्यता, खाली जेब के कारण नौकर ना रख पाने की असमर्थता - सब झलक जायेगा. और इन सबका मूल बेरोजगारी एवं प्रकारांतर से सरकार की लाचारी सिद्ध की जा सकती है. नल में पानी का ना आना, बाहर खेलने वाले मजदूर के बच्चे, फ्रिज के ऊपर चलती चींटी, जमीन पे पड़ा मेजपोश, खाली जिंदगी सरीखा फूलदान, सामने खाड़ी में बनता नमक, सड़क के उस किनारे छोटे पर्वत के मानिंद खड़ा दीमकों का टीला - कितना कुछ तो है लिखने को.

और अगर सांसारिक चीजों से मन ऊब जाये तो अध्यात्म की कमी भी नहीं. मन के अंदर छुपा शैतान, आत्मा का आलोक, सामने वाले मंदिर में बैठा पत्थर - सब कुछ तो विषय ही हैं.

लेकिन इन नीरस बातों में मन कहाँ लगेगा? कुछ रस की बातें होनी चाहिये. वैसे भी बारिश हो रही है. रोमांटिक सा मौसम हो रहा है. ऐसे में तो मैं मीना के बारे में लिख सकता हूँ. "कहाँ छुपी हो, हे मीने! तुझ बिन जीवन मे रंग नहीं..." पर मीना से सुंदर तो रूपमती थी. बेकार ही उसके बाप से झगड़ बैठा. गलती तो खैर मेरी नहीं थी. फिर भी एक तमाचा सह ही लेता तो रूपमती आज मेरे साथ इस खिड़की पर बैठी हवा खा रही होती. हाय! ऐसा विरह भाव जागा है. कोई विरह गीत लिख मारूँ तो दिन सफ़ल हो जाये. लेकिन विरह जगाने का जिम्मा सिर्फ़ एक के माथे लादना भी उचित नहीं. सोनी, पिंकी, पद्मा, अभिलाषा, मुहल्ले के पास वाले नुक्कड़ के पान दुकान वाले की बेटी, हरे रंग वाले बंगले की खुद से कार चलाने वाली युवती - सबकी याद एक साथ मिल जाये तो क्या ही राग पैदा हो?

पर अगर प्रेम पर लिखा, तो सारे बुढ्ढे मेरी खाल नोंच ले जायेंगे. आखिर ’लेखक की नैतिक जिम्मेवारी’ रूपी हथियार से कोई बचे भी तो कैसे? सो नैतिकता पर ही लिख मारता हूँ. आजकल के युवा वैसे भी अनैतिक होते जा रहे हैं. हमारे समय में....वाह! ये सही होग. ’हमारे समय में ऐसा होता था..वगैरह’- ये लिख देता हूँ. मुझे ना जानने वाले लोग बिना विवाद किये मुझे अनुभवी मान बैठेंगे. फिर क्या है? उसके बाद लिखने की जरूरत नहीं रहेगी. एक बार लेखक जब अनुभवी लेखक बन जाये तो लिखने की आवश्यकता ही कहाँ रहती है. फिर तो बस बोलना होता है लिखने के बारे में. और वो क्या कठिन है? जो मिठाई खिला दे उसकी रचना में बड़ी मिठास है. जो कुछ ना खिलाये - उसमें प्रारम्भ में संभावनाएं तो दिखी, परंतु अंत तक आते आते संभावना से न्याय नहीं कर पाये. कहीं धंधा चल निकला, तो बैठे बैठे अच्छा कहने की कमीशन खायेंगे. आलोचक - समीक्षक बनना तो बड़े फायदे का होगा. फिर मौका देख के संपादक भी बन जायेंगे. कोई रचना पसंद आ गयी, तो अपने नाम से छापने में सुविधा रहेगी. वैसे भी कोई नौसिखिए लेखक की बात माने या अनुभवी संपादक की. हर बुद्धिमान बुद्धिजीवी जानता है कि फायदा किधर है. सो ये तय रहा. पहले एक अनुभवी लेखक फिर संपादक. लेकिन इन सबके पहले कुछ लिखना होगा. लिखने ही तो बैठा हूँ. ये दिमाग है कि पता नहीं कहाँ कहाँ उड़ने लगता है.

सोचता हूँ कि छत से लटक रहे मकड़ी के जाले के बारे में लिख दूँ...

जाति पूछो लइकन का, मत पूछो तुम ग्यान

अरे बिनेऽसराऽऽऽऽ! हियाँ आव!
- जी मालिक.
तू भी तो हरिजन है ना रे?
- जी मालिक.
तऽ जाके आईआईटी वगैरह में काहे नहीं पढ़ा?
- मालिक मेरे वश का नहीं था. कहाँ तो बीए करे में हालत दुबरा गया.
ह्म्म्म! लेकिन देख! तू अप्पन छोकरवा को जरूर भेजना.
- मालिक पास होगा तब ना? सुने हैं कि कोई बड़ा भारी एग्जाम होता है.
अरे नहीं कैसे होगा? देख एक तो सत्तर ठो कौलेज बन गया है. और नहीं पास होगा तो केस कर दिहो कि हरिजन हैं इसलिये फ़ेल किहीस है.
- लेकिन इ तऽ गलत न होगा?
बनेगा हरीश-चन्दर? आजकल तो इ फैसन है रे. जा के केस ठोक. और हुआँ जाके भी अगर छोकरा ना पढ़े तब्बो कॊई फ़ेल ना करेगा?
- नहीं पढ़ेगा तऽ फ़ेल तो हो ही जायेगा न?
अरे उ सब पुराना बात है. इ नया समाचार देख. अब कोई परोफ़ेसर फ़ेल करे के पहिले लइकन का जात पूछेगा. नहीं तो कौन रोज रोज कमीशन के पास दौड़े?

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इस समाचार से प्रेरित:
http://www.merinews.com/catFull.jsp?articleID=135778
http://www.ibnlive.com/news/iitd-to-review-scst-students-expulsion/67293-3.html

सीधा सा सवाल

- तू पगला गया है क्या?
- नहीं रे! इ तो एडभांस लोग पूछते हैं आजकल!
- जाके अप्पन चेहरा देख ऐनक में. बड़ा आया एडभांस बनने.
- देख सुनीता! जादे बकबक मत कर. एतना बढिया से पूछ रहे हैं त हाँ बोलने से मर नहीं जायेगी.
- बाकी का पूछ रहा है? अब तोरा एतना अन्गरेजी हम कहाँ जानते हैं?
- अरे सीधा सा सवाल है - ’बिल उ बी माई भैलेन टाइन’?
- देख इसका मतलब जाने बिना मैं कुछ नहीं कह सकती.
- अब मतलब केकरा से पूछें?
- मतलब तुझे भी नहीं पता?
- तू आजकल बहुत नौटंकी झाड़ने लगी है. मतलब से का मतलब? हम पूछे हैं, तू हाँ कह. आऊ फिर दोनो सिनेमा देखने जायेंगे. नहीं कहेगी त हमको अकेले जाने पड़ेगा.
- त इ बोल ना कि फिलीम जाने के लिये कह रहा है.

अपने समय को लिखो!

एक दिन मैं एक आदरणीय की बाइक की पिछली सीट पर बैठा उनका प्रवचन सुन रहा था। कुछ देर तक मेरे लेखन की कूड़ात्मकता का बखान करने के बाद उन्होने मुझसे कहा कि 'अपने समय को लिखो!' फिर उन्होने समय को प्रदर्शित करने वाले महान लेखक आदि के उद्धरण इत्यादी देने प्रारंभ कर दिए। तत्पश्चात सामयिक लेखन के महता की आरती हुई।

"अगर तुम अपने बगल मे रोज नालियाँ देखते हो, तो नालियाँ लिखो ना! फूल की खुशबू लिख के खुद को फूल क्यों साबित करते हो?"

बीच में मैंने टोकने की कोशिश की।

"मैंने, नाली तो नही पर, नाले पर एक कविता जरूर लिखी है। और फटाक से संदर्भ पेश किया।
'मेरा मन -
एक नाले की तरह है।
शाश्वत नाला।
जिसका और छोर पता नहीं चलता
सिर्फ सडांध महसूस होती है....'

परन्तु उन्हें मेरे काव्य या लेखन में शायद कोई दिलचस्पी थी ही नही। वो तो बस समय-के-बारे-में-लिखो रुपी कुछ प्रलाप-सदृश किये जा रहे थे।

"तुम हमेशा ये चिरकुट प्रेम की चिरकुटई लिखते हो। इसमे क्या सार है? समय को....

"अरे काहे का भेजा फ्राई कर रहे हैं? सार तो इस संसार मे ही नहीं है। बेमतलब का मेरे पास ढूँढने मे तो बिल्कुल नही है। वैसे भी मैं आपके समय का थोडे लिखूंगा? नारी - भिखारी, अत्याचार - अखबार, गन्दी राजनीति और गरीब जनता एक बारे में आप लिखिए। मैं अभी अभी जवानी की चौखट पर आया हूँ। यही मेरा समय है। और मेरे समय में प्रेम ही लिखा जा सकता है। प्रेम ही लिखा जाता रहा है और प्रेम ही लिखा जाएगा। जिन्हें मिल जाता/जाती है, वो प्रेम की खूबसूरती पे लिखते हैं। जिन्हें नही मिलता वो प्रेम के वैकूफ्य ('बेवकूफी' से अच्छा शब्द लगा) पर लिखते हैं। जिनका मिल के खो जाता है, वो विरह की आग लिखते हैं। और जो कुछ नहीं समझ पाते वो प्रेम का दर्शन लिखते हैं। "

लंबा चौडा गुबार निकाल लेने के बाद, मैंने मानो उद्घोष किया - "मेरी लेखनी पूर्णतया सामयिक है।"

वो धीर गंभीर हो कर सुनते सुनते अचानक हँसने लगे और बोले, "तुमने बात के सार को नहीं समझा। समय से मेरा तात्पर्य था - काल। अपने काल को लिखो। तुम 'उम्र' से कन्फ्यूज़ हो रहे हो। मैं बुढ्ढा हूँ, तुम युवा हो। हमारी उम्र अलग अलग है लेकिन हमारा काल एक ही है। मैं उस काल की बात कर रहा हूँ।"

हँसी मुझे भी आ गयी।
(अभी तक समय समय कर रहे थे, अब काल की पुँछ पकड़ ली! हः)

"ये किसने कह दिया की हम दोनों एक ही काल के हैं? आप मेरे भविष्य काल हो, मैं आपका भूतकाल हूँ और मेरी सारी रचनाएँ वर्तमान काल की हैं।"

मुझे लगा था की वो निरुत्तर हो जायेंगे। लेकिन नहीं! अजीब सा जीवट था उनमे भी। अनुभव की तलवार का प्रयोग हर वृद्ध की तरह उन्हें भी आता था।

"मैं मानता हूँ कि भूतकाल में मैंने भी बहुत चिरकुटई की है इसलिए तुम्हे रोक रहा हूँ। "

मैंने देखा कि ना तो वो मुझे अपना तात्पर्य समझा पा रहे हैं, ना मैं उनकी कही बातें पचा पा रहा हूँ। और फिर हमारे अलग होने का वक़्त भी हो चला था। सो मैंने कह दिया कि मैं कोशिश करूंगा।

फिर दुनिया के झमेले मे व्यस्त हो गया। सारी बात हवा हो गयी। धीरे धीरे व्यस्तता के चलते लिखना भी कम हो चला था।

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एक दिन अचानक, बहुत दिनों बाद मेरी मुलाक़ात उनसे हो गयी। वो तुरत पूछ बैठे, "क्या बात है? आजकल लिख नहीं रहे हो?"

मैंने भोली सूरत बनाकर कहा, "आपने ही तो कहा था कि काल को लिखने की कोशिश करो। तो कोशिश जारी है।"

व्यस्तता के बारे में बोल नहीं सका। संसार की महाशून्यता पर विवाद करने के मूड में नहीं था।

"फिर भी कुछ तो लिखा होगा" पूछ के इस तरह से मुझे देखा कि ना कहते मुझे लज्जा आने लगी। कुछ ना कुछ तो कहना ही होगा - यही सोच कर, दार्शनिक गंभीरता से जो मन में आया बकने लगा। और बकता रहा, बकता रहा।

"आपसे बातें करने के बाद मेरी आँखें खुली और मैंने काल के बारे में सोचना प्रारंभ कर दिया। समय या काल को लोग निरंतर समझते हैं। लेकिन मेरे विचार से यह अर्धसत्य है। वैसे मैं मानता हूँ कि सत्य कभी आधा नहीं हो सकता लेकिन इस स्थिति के लिए इससे सटीक शब्द मेरे कोष में नहीं है। काल निरंतर नहीं, रूक रूक के चलता है। घडी की बैटरी कभी ना कभी तो खतम होती है। और बैटरी बदलने मे थोडा वक्त भी लगता है। एक क्रांति होती है - समय दौड़ता है। मनुष्य आजाद होता है - समय चलता है। इंसान हर रोज अपने पुराने दिन को दुहराने लगता है - धीरे धीरे काल थक कर सो जाता है। एक स्थिर भाव पूरे समाज पे छा जाता है। तब तक, बैटरी नही बदली जाती...मेरा मतलब है - जबतक एक नयी क्रांति नही आती।

हमारा समाज आज ऐसे ही स्थिर-भावी-काल से हो कर गुज़र रहा है। इसलिए मैं क्रांतिकारी विचार नहीं, सन्नाटा लिख रहा हूँ। मेरे ना लिखने को 'न लिखना' ना समझिए। मैं आजतक की अपनी सारी रचनाओं से बड़ी व महान रचना लिख रहा हूँ। अपने काल को लिख रहा हूँ। हमारा काल अभी विश्राम कर रहा है, गतिशील नहीं है। इसलिए इस लेख मे अभी शब्द नहीं हैं। मैं विराम लिख रहा हूँ। एक दिन गति भी लिखूंगा। तब मेरे लेख में शब्द भी वैसे ही चमकेंगे जैसे हार में हीरा ....."

मैं धुन मे आके बोलता गया, बोलता गया।

उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव आये। उन्होने प्यार से मेरी पीठ थपथपाई और चुपचाप चले गए।

और मैं उस दिन से आज तक अपने भाषण का भावार्थ समझने की चेष्टा कर रहा हूँ।

कहानी, जो लिखी नही गयी

वो मुझसे रोज जिद करने लगी थी कि तुम मेरे बारे में एक कविता लिखो। जब भी जैसे भी थोडे वक्त के लिए मिलती - इसी बात को पकड़ के बैठ जाती थी। ऐसा नहीं था कि मैं उसे झूठा दिलासा दे कर टालना चाहता था। मेरी भी बहुत इच्छा थी कि उसके बारे मे कुछ लिखूं। परन्तु जैसे ही लिखने बैठता, दिमाग भक्क से हो जाता। मानो किसी ने ऊपर की बत्ती ही बुझा दी हो। शायद मैं उसके ना होने के अहसास तले दब जाता था। यह बात अजीब ना लगते हुए भी अजीब इसलिए थी क्यूंकि वो कभी भी मेरे पास थी ही नही।

उससे मिलना भी मेरे लिए एक इत्तेफाक था। और जिस वक्त मुझे पहली बार मिली, उस वक्त मुझे ऐसा बिल्कुल नही लगा था कि बात इस कदर आगे बढ़ जायेगी कि वो मुझसे एक कविता की माँग कर बैठेगी। अंदेशा होता तो शायद मैं उसके चरित्र मे कविता ढूँढने कि कोशिश भी करता। पर शायद यह ठीक ही था। क्यूंकि मेरी कोशिश उसे मुझसे दूर भगा देती। साधारण तरीके से मिलने का जो आनंद है, उसमे कृत्रिमता की बू आ जाती और मैं एक बहुत ही अलग किस्म की प्रजाति से मिलने से चूक जाता।

एक दिन मैं अपने कमरे के एकांत मे सन्नाटे पी रहा था। बाहर एक दोस्त बडे ही जोर जोर से बातें कर रहा था। अब एक लड़के के बात करने का अंदाज इतना तो बता ही देता है कि दूसरी ओर घर से पापा बोर कर रहे हैं या किसी महिला मित्र की दिलकश बातें सुनने को मिल रही हैं।

'क्या बे! बहुत मीठी मीठी बातें हो रही है।
'नहीं यार। एक फ्रेंड यहां आई हुई है। अब मेरे पास इतना वक्त तो है नही कि मैं उससे मिलता रहूँ। परीक्षाएं सर पर हैं।
'मेरे पास तो बहुत वक्त है। मुझे मिला दे।

मेरे मुख से निकली यह बात मेरे लिए इतनी बड़ी समस्या का कारण बन जायेगी, ये मैंने कभी नही सोचा था। उसने सचमुच मिलवा दिया। उसके दूरगामी परिणाम तो यह हुए कि मुझे जबरदस्ती मगजमारी करके एक कविता लिखनी पड़ रही है। परन्तु कविता कोई साधारण सी चीज तो है नही, जो यूं ही निकलने लगे। खासकर तब जब कि कविता किसी व्यक्ति विशेष की प्रशंसा मे लिखनी हो। वैसे उसने प्रशंसा का तो जिक्र भी नही किया परन्तु मैं तो मनुष्य हूँ ना! थोडी सी इंसानियत तो मुझमे है ही। और फिर वो इतनी बुरी भी नही थी।

वस्तुतः वो बहुत अच्छी थी। जब कविता लिखने के लिए मैंने अपने भेजे को खंगालना प्रारंभ किया तो उसके साथ बिताया हर पल धीरे धीरे आ गया। बिल्कुल शफ्फाक। मानों मैंने उस पर धूल ही नही जमने दी हो कभी। जैसे एक दर्पण पर रोज पानी फिरा दो। रात भर बैठ के गाने गाना, अँधेरे मे पागलो की तरह घूमना, चाँदनी रात में पार्क मे बैठ के शराब की बोतल खाली करना, सड़कों पे इस तेजी से चिल्लाना की अगल बगल के लोग देखने लगें और थक जाने पर आहिस्ते से सो जाना, जैसे तूफ़ान अभी अभी थोडी देर के लिए शांत हुआ हो - सब कुछ कितना अद्भुत था, कितना अनोखा, कितना सुन्दर, कितना प्रिय। सचमुच वो बहुत अच्छी थी।

'डीड यू रोट माई पोएम?
'नो बाबा! आई ऍम स्टिल वर्किंग ऑन इट।
'डू इट फास्ट ना। आई वांट टु रीड इट ए.एस.ए.पी।
'पगली। थोडा तो वक्त दो। अब कविता लिखने के अलावा बहुत काम हैं जीवन मे। मैं व्यस्त हूँ।

लेकिन चाहे जितना भी कह लूं मैं जानता था कि मेरे पास वक्त की कोई कमी नही है। और उसके बारे मे लिखने के लिए तो बिल्कुल नही। शायद मैं लिखना ही नही चाहता था। वो इतनी अच्छी जो थी।

ईमानदारी आसान है। लेकिन जब सच को मुखौटे पहनाने हों, तो वक्त तो लगता ही है। अब दिल मे तो बहुत सारी बातें हैं जो मैंने उससे कभी कही नहीं। गलती से वो सब कुछ कविता मे झलक गया तो? मैंने कोशिश तो बहुत कि मुझे उसकी बुराइयाँ भी दिखें। लेकिन मानो मेरे अन्दर कोई दुश्मन बैठ के मुझे पट्टी पढा रहा था। उसका शराब पीना मुझे बुरा नही लगता था। एक दो मौक़े ऐसे भी आये जब वक्त दे के वो मुझसे नही मिली, मुझे बिल्कुल नही अखडा। एक बार तो वो अपने घर से भाग के सीधे यहां तक आ पहुंची, और मुझे ये उसकी खूबी लगी। उस दिन तो हम रेस्टोरेंट मे लंच करने भी गए।

लोग कहते हैं कि जब किसी की बुराइयाँ भी अच्छाईयां लगने लगे तो समझो की तुम्हे...!

'नही नही! ऐसा नही हो सकता।
'पर मेरे दोस्त तुम खुद ही तो कह रहे हो कि तुम्हे उसकी सारी बातें अच्छी लगती हैं।
'हाँ! लेकिन वो मुझे अच्छी कैसे लग सकती है?
'तुम पगला गए हो? जब उसकी सारी बातें अच्छी लगती हैं तो वो तो अच्छी लगेगी ही ना?
'क्या ये जरूरी है?
'तुम सचमुच पागल हो गए हो। मतलब साफ है! लोग प्यार मे पागल हो ही जाते हैं।
'अरे यार! कुल जमा १०-१२ घंटे का वक्त हमने साथ गुजरा होगा। और तुम कहते हो कि....!

शायद वो सच कह रहा था. उन १०-१२ घंटों का असर इस कदर हो गया था कि मैं उसपे एक कविता लिखते डरने लगा था। जो बात इतने दिनों तक खुद से भी छिपाई, कहीं उसे पता चल गयी तो? वो तो शायद किसी और को पसंद करती है। अगर मैंने कुछ गड़बड़ की तो जो थोडी बहुत दोस्ती है, वो भी समाप्त हो जायेगी; जिसे मैं खोना नही चाहता था।

'शायद' नही, वो सचमुच सच कह रहा था। मैं १०-१२ घंटे की मित्रता नही खोना चाहता। पिछले २२ वर्षों मे इतने मित्र बनाए और खोये हैं जिनका कोई हिसाब नही। और इस एक को खोने का भय...! वो सच कह रहा था। मुझे बहुत सोच समझ कर उसकी कविता लिखनी होगी। या फिर कहानी लिख देता हूँ। कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।

'तुम पर मैं कविता लिख पाऊँ, इतनी प्रतिभा नही है मुझमे।
'वाह! क्या ये कविता का शीर्षक है?
'नही बाबा! मैं सोच रहा था कि मैं एक कहानी लिख दूं तुम्हारे बारे मे।
'कहानी? इट्स बेटर। गूड! डू दैट।
'ओके! जस्ट गिव मी सम मोर टाइम.
’आई वान्ट माई स्टोरी पुट अप. प्लीज! ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट.
'आई विल राइट मेनी थिंग्स. बट, आई वोन्ट मेन्शन योर नेम देयर.
’फ़ाइन. पीपल विल टीज यू. आई कैन अन्डरस्टैन्ड.

जब खुद के अन्दर ही युद्ध मचा हो तो लोगों की हँसी कहाँ सुनाई देगी?

कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।
ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट
कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।
ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट
ओनली यू कैन डू जस्टिस ट