tag:blogger.com,1999:blog-11728010.post-2051869065598198272007-12-10T18:51:00.000+05:302007-12-10T18:51:00.000+05:30विकास ये जो टुकड़े टुकड़े समय है इसमें ही कुछ मन क...विकास ये जो टुकड़े टुकड़े समय है इसमें ही कुछ मन का कर लेना सीख लो । बाद में तो इससे भी कम समय मिलेगा । चवन्‍नी की तरह समय । बहरहाल अच्‍छा पढ़ा है । तुमसे जब अगली बार मुलाकात होगी तो बताऊंगा कि इसमें कहां कहां तुमने नाटकीयता को मिस किया है । बहुत जल्‍दी में थे क्‍या । <BR/><BR/>ये कविता हमें लाईटहाउस की तरह रोशनी देते है ।yunushttp://www.blogger.com/profile/12193351231431541587noreply@blogger.com