तो मैं भी

कलम उठाने से कवितायें लिखी जा सकती
या फिर पैदा किये जा सकते विचार
या लहलहायी जा सकती एक क्रांति
या फिर सहेजा जा सकता कोई चिंतन
- तो उठा लेता मैं भी.

बस कह भर देने से आ सकता परिवर्तन
या उड़ेली जा सकती समझ
या बाँटी जा सकती संवेदना
या साबित किया जा सकता प्रेम
- तो कह देता मैं भी.

यदि सो जाने से संजोये जा सकते स्वप्न
या धकेली जा सकती चिंतायें
या रोकी जा सकती भटकन
या मिल सकती जीवन ऊर्जा
- तो सो जाता मैं भी.

13 टिप्पणियाँ

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M VERMA said...

बस कह भर देने से आ सकता परिवर्तन
====
- तो कह देता मैं भी.
वाह क्या भाव है बहुत सुन्दर


Nirmla Kapila said...

सुन्दर अभिव्यक्ति है शुभकामनायें


Pramod Singh said...

वाह क्‍या भाव हैं सुंदर अगर कह भर देने से हो जाते
तो कह देता मैं भी..


हिमांशु । Himanshu said...

सो कर देखे जाने वाले स्वप्न नहीं,जागती आँखों वाले सपनों की जरूरत है हमें ।

खूबसूरत कविता । आभार ।


श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

वाह भाई,, बेहतरीन...


pratyaksha said...

लेकिन है सचमुच अच्छा :-)


VaRtIkA said...

:)


विश्व दीपक said...

कह तो दिया आपने..... ;) और लिख भी डाली कविता....देखिए परिवर्त्तन तो आएगा हीं, और नहीं कहीं तो कम से कम कविता लिखने के तरीके और सलीके में..

आपने बहुत हीं बढिया लिखा है।

बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक


डॉ .अनुराग said...

अद्भुत लिखते हो दोस्त ....


Pankaj Upadhyay said...

:) beautiful


राज यादव said...

विकास भाई...क्या अद्वितीय सा लिखते हो यार....रोंगटे खड़े हो जातें है ....कोई जवाब नहीं आपका... आपका पूरा ब्लॉग मैं अब तक कम से कम २० बार पढ़ चूका हूँगा...लेकिन जब भी पढता हूँ ...हरदम नयापन सा लगता है....लेकिन आप हैं कहाँ आजकल....मेरे ब्लॉग पर आना तो बिलकुल बंद ही कर दिए हैं आप....


yunus said...

देर से पढ़ा ।
लेकिन इतनी भी देर नहीं हुई कि तारीफ ना की जा सके ।
लिखी थी कविता तो बैचलर थे ।
खत्‍म हो चुकी अब बैचलरी ।


somyaa said...

kavita mein shabd simit aur bhav adhik hain... bahut sunder rachna hai.

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