उसका सोचना

बहुत दिन हुए उसे कुछ भी लिखे हुए। ऐसा नही था कि उसके दिमाग में हमेशा उठती रहने वाली कुलबुलाहट बंद हो गई थी। ऐसा भी नहीं था कि उसका मन उचट गया था, लिखते रहने से। सब कुछ पहले जैसा ही था - एग्जैक्ट्ली सेम। उसने बहुत बार कोशिश की थी कुछ लिखने की। कई बार लिखा भी -लेकिन इससे पहले की शब्दों का संसार सजता - उसे मिटा देता। जो कुछ भी लिखा था, जो कुछ भी लिखने जाता था- सब महत्वहीन लगने लगे थे। जीवन इन सब उटपटांग कविताओं और प्रेम के पैगामों से कुछ अधिक सा है, वो हमेशा से जानता था। लेकिन उसकी इस जानकारी ने उसके दिमाग पे इस बेचैनी से कभी दस्तक नहीं दी। हर बीतता वक्त हमें कुछ पीछे ना छोड़ दे - के डर से वो हर वक़्त भरा होता। लाइफ इज वैरी फास्ट दीज डेज़इफ यु स्टाप फॉर मोमेंट, यु विल बी लेफ्ट अलोन

वो औरों जैसी जिंदगी नहीं जीना चाहता था। लेकिन औरों की जिंदगी के अलावा उसने कोई और जिंदगी देखी भी नहीं थी। शायद इसलिए उसका हर लिखना, उसे किसी के निजी जीवन की चोरी सा लगने लगा था। अनुभव के नाम पर उसके पास, लेखकों में जिनती उम्र होनी चाहिए उतनी किसी तरीके से नहीं थी। वो लिखने के अलावा कभी कभी पढा भी करता था।परन्तु जितने सम्माननीय लेखक थे - वो उन सा नहीं होना चाहता था। और वो जिन सा होना चाहता था उनमे से कोई भी 'सम्मानित' लेखक नहीं था। सो कभी कभी उसे इस लेखन के धंधे से चिढ भी मचती थी। 'धंधा' - राइटिंग, एंड ऑल आर्ट्स फॉर दैट सेक - इज गौड डैम बिजिनेस नाउ

उसे कला के पतन पर ज्यादा दुःख था या अपनी सामयिक कलाहीनता पे - इसका उसे ठीक ठीक पता कभी नहीं चलता था। इस बारे में सोचने से ही उसका सर गर्म हो जाता था। लुक एट दी प्रीवियस जेनरेशनदे वर मोर कंसर्न्ड अबाउट आर्ट एंड ऑल। लेकिन हम लोग सिर्फ़ ऊंची बिल्डिंग और महंगी कारें ही जानते हैं। कुछ खिलाड़ियों को ही देश का आइकन बना दिया गया है। एक कलाकार काम भी करे तो क्या इन पागलों के लिए करे?

वैसे भी कोई पेंटर नही दिखता। पेंटिंग का शौक लिए बहुत लोग दिखते हैं लेकिन कोई पेंटर नहीं दीखता। पेंटर होना - कुछ ना होने की निशानी है। उसी तरह लेखक या कवि होना भी है। आप इनका शौक पाल सकते हैं। पर ये शौक कभी आपको नहीं पालते। कम से कम इस देश में तो नहीं ही पालेंगे। क्यूँ? ऐसा क्यूँ हो गया है? कहाँ गलती हो गई है? ये देश तो बहुत महान हुआ करता था न? कितनी कलाओं ने यहाँ जन्म पाया है? जन्म देने के बाद पालने की जिम्मेवारी क्या किसी और की होती है? योग योगा ना बना होता तो क्या अब तक खो ना चुका होता? गणेश को भी स्वीकृति मिल सके के लिए गणेशा का अवतार क्यूँ लेना होता है? सुरज अब क्या पश्चिम से उगेगा? हमारी गली में भी?

वो अक्सर सोचता रहता था कि कहीं तो गलती हुई है। किसी से तो हुई है। एक पूरे समाज से एक साथ एक वक्त पर एक ही गलती का हो जाना उसे बड़ा अजीब लगा करता। इस गलती की जड़ ढूँढने में समय बिताने में उसका बहुत समय बीत जाता था। दिस वर्क इस फार मोर इंम्पौर्टेंट फॉर मी दैन राइटिंग. उसे अच्छी तरह पता था कि इस सोच का कोई नतीजा नहीं होगा। लेकिन उसे इस बात का विश्वास था कि थोडा वक्त इस सोच में बिताने से शायद उसके सोचने के तरीके में कोई तब्दीली आ जाए। देन आई कैन राइट बेटर

सोचते सोचते उसे अक्सर नींद आने लगती। नींद में उसे पुस्तकालय दीखते। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में हर मुहल्ले में दिखा करता था। उसमे किताबें दिखतीं। रसियन, अंग्रेजी और फ्रेंच किताबों के हिन्दी अनुवाद और साथ में हिन्दी की कई किताबें। ढेर सारी किताबें। और कहीं किसी कोने में एक किताब पर उसे उसका नाम भी दिखता। फिर डरकर उसकी आँख खुल जाती। कब होगा ऐसा? कब हिन्दी में लिखी जाने वाली किताबों को भी पाठक मिलेगा। कब हिन्दी के 'धंधे' को 'बाजार' मिलेगा? आजकल उसके दिमाग में एक और खतरनाक बात चल रही थी। शुड आई साइलेंटली स्विच टु इंग्लिशआफ्टर ऑल माई इंग्लिश इज ऑल्सो प्रेट्टी गुड

2 टिप्पणियाँ

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Vipin Kumar said...

I think ..writing is more of a disciplined work than anything else. I mean if its business than there has to be some discipline in it..! right?

BTW, nice to see you back.


VaRtIkA said...

"वैसे भी कोई पेंटर नही दिखता। पेंटिंग का शौक लिए बहुत लोग दिखते हैं लेकिन कोई पेंटर नहीं दीखता। आप इनका शौक पाल सकते हैं। पर ये शौक कभी आपको नहीं पालते। जन्म देने के बाद पालने की जिम्मेवारी क्या किसी और की होती है? गणेश को भी स्वीकृति मिल सके के लिए गणेशा का अवतार क्यूँ लेना होता है? सुरज अब क्या पश्चिम से उगेगा? हमारी गली में भी?"

gehen chintan... chintan jisse jhnakrit hokar chintan ki aur tarangein jaagti hain... iss soch kaa nateeja shayad uski soch ki tarah hi kuch naa ho... shayad sochne ke tareeke mein tabdeele bhi naa aaye....par phir bhi........... kuch jhankaarein zindaa hone kaa gumaan zindaa rakhti hain...

sunder soch... sunder lekhan...

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