पिंक्कीया की पिनक

"कहते कहते माथा फिराया ना, त चट्ट से दू लप्पड़ धर देंगे.
"चिचियाते रह जाएगी.
"ओतना देरी से बोल रहे हैं कि जा के ललटेन जला के संझौत देखा दो.
"एक्को बात पियार से माने इ लैकी, त अदमिये बन जाये.

रोज जैसे इ भाषण सुन सुन के अब पिंकीया पर कोई असर नहीं होता. सब ऐसे ही धिराते हैं हरदम्मे.

रोज डेली एक्के गाना. अब इ में हम्मर कौन गलती है कि गाय बियाये में एक हफ़्ता का देरी हो गया है? चाहे उ सुरेन्दरा मुँहझौंसा आके सब लेम्बु झार गया है पेड़ से? चाहे उ गंगुलिया रिटायर हो गया. कोई चाहे कुच्छो करे बाकी सब आके झाड़ेंगे हमको ही. साला घर में पाकिस्तान जैसा औकात बना दिया है मेरा. आखिर हमारा भी आईडेंटिटी है कि नहीं जी? आऊ सेल्फ़ रेस्पेक्ट?

विन्नीया का बियाह ठीक हो गया है आऊ हमारा नहीं हुआ. इसमें हम कौची करें? अब कुँआर लड़की जाके अपने लिये खुद्दे तो लड़का नहींये ना ढूँढेगी? अपना गलती केकरो नहीं लौकता है. कुछ पैसा-उसा जमा किये होते, दु ठो मोटर्साइकिल देवे का औकात होता, चाहे तीन चार बीघा खेतवे होता दहेज में देने के लिये - त का लइके का कमी है? उ सब बुझाता नहीं है आउ खाली हमको ही कहते रहते हैं. बिन्नीया का हमसे जादे खबसूरत है? चाहे रंगवे हमसे बरोबर का है? सतवां से लेके बरहवां तक का कौन लैका हमको देख के सीटी नहीं मारा है? ताड़ पर वला लइकन सब हमको बीयुटीफ़ुल भी बोलता रहता था.

हम सब समझते हैं. मुफ़त में एगो बेगार मिल गया है सब को. सब दन्ने का गुस्सा आके हियें उतारेंगे. सवेरे उठ के गाय हम दुहें, आउ उहे दूध का एक ठो बूँदो हमरे लिये पाप है. गोयठा भी हमहीं ठोकें. कपड़ा फींचे, संझौत देखावें. हमको कोई और काम नहीं है? हम पढे नहीं जा सकते थे? मैडम क्युरी कोई संझौत देखाती थी? आउ इंदिरा गांधी कभी गोयठा ठोकी है? हम उ सब काम करते हैं जो उ सब से भी नहीं हो सकता था. लेकिन इ अनएडूकेटेड, और्थोडोक्सवन के कुच्छ नहीं बुझायेगा.

रोज बाजा पे सुनेंगे सब, कि लैका-लैकी एक समान. देस अब तरक्की कर गया है. बाकी इ लोग को खाली खैनी मिलते रहे त देसो को चुन्ना में रगड़ लेंगे. एकाद दिन हम सुना देंगे ना तब समझ में आयेगा. चुप्पेचाप रहते हैं त सब आइंस्टीन बनल रहते हैं. बिट्टु भैय्या से कभियो कम नंबर आता त ना बोलते. हमेसा फ़स्ट डीविजन लाये हैं. लेकिन भैय्या पटना जायेगा पढ़े आऊ हम हियाँ बैठ के गाय भैंस देखेंगे. हद्द अन्याय है. एक्स्टरीमे हयिय्ये है.

आज हमहुँ न जलायेंगे ललटेन. देखते हैं कौन जलाता है आउ कइसे खाना बन जाता है.

"अरे पिंकीया! तू हियां परल है? हुआँ बाबुजी चिल्ला रहे हैं. खोजाई हो रहा है.
"कंहड़ काहे रही है रे? कुछ हुआ है का?
"ए बाबुजी पिंकीया के तो बोखार लगल है. डागदर के पास ले जाना पडे़गा.

एन्ने से इ आउ ओन्ने से उ चिल्ला रहे हैं. आउ पिंकीया काँख में पियाज डाल के चुपचाप पड़ी हुई है.

8 टिप्पणियाँ

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VaRtIkA said...

tippni ki zaroorat hi nahin iss post ko...


pushkarsrigyan said...

bahoot sahi likha hai ....... khas kar ke khanti magahi ka upyog man ko bha gaya


दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुंदर!


सागर said...

कल्हे एक ठो अइसने पोस्ट परमोद बाबू के ब्लॉग पर पढ़े... भासा त लगा जैसे की उसी का सिकुअल पढ़ रहे हैं... एक लालटेन हमहूँ जलाएं का ? लालू जी बात करनी होगी लेकिन ... जो जलाये हुए हैं उनकरा रोशनी तनी डाउन है.


डॉ .अनुराग said...

झकास ठेले हो भाई.......एक दम झकास !!


Anonymous said...

:-)

प्रत्यक्षा


Vipin Kumar said...

Majjaa aa gayil bhaiya hamka tain...!


Ravi said...

Kamal hai vikash ji...aap jahan hath dalne bani uhan se hira hi nikalne bani...waise a post ka kono jabab naikhe....!

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