अपने जन्मदिवस पर

जिंदगी के पच्चीस साल बिता चुकने वाले मित्र -
तुम्हें बधाई देता हूँ.

उपलब्धियों का पिटारा भले ही खाली मिले,
लेकिन उनके ऊपर बधाईयों की रंगीन रिबन का अधिकार
तुमने निःसंदेह अर्जित किया है – जीवन को जीते रह कर.

और फिर – तुम मेरे सुख दुःख के साथी रहे हो,
मेरे संग सपनों की चूरन समेटी है
पंख बटोरे हैं अतृप्त अभिलाषाओं के.

ऐसे में मैं, अपनी इच्छा के विरुद्ध ही सही -
तुम्हें बधाई तो दूँगा ही.
सो ये लो मेरी बधाई
और सजा लो ताम झाम के साथ.
और चले जाओ औफिस आराम से -
लग जाओ अपनी दिनचर्या में.

जब शाम को घर आओगे
तो मैं तुम्हारी खातिर खिचड़ी बनाऊँगा
तुम्हारे साथ बैठूँगा, तुम्हारे साथ खाऊँगा.

फिर हम दोनों मिल के
गोदार्द की एक फ़िल्म देख लेंगे.
मैं तुम्हें मुक्तिबोध की दो कवितायें सुनाऊँगा
और तुम बैठ के मेरा स्केच बनाना.

फिर मैं तुम्हारे लिये पियानो पर कोई धुन बजाऊँगा.
डरो मत! वो हैप्पी बर्थडे वाली धुन नहीं होगी.
तुम्हारी पसंद का संगीत होगा.
मोज्जार्ट का टर्किश मार्च या बीटहोवन की फ़ुर एलिस.

फिर मैं तुम्हें आजाद कर दूँगा – तुम सो जाना.
जब जागेंगे – एक नया दिन होगा.
तुम्हारी उम्र, मौत के एक कदम और नजदीक जा चुकी होगी.
अगली बधाई में ३६४ दिन बचे होंगे.

लेकिन मैं कल भी तुम्हारे लिये खिचड़ी बनाऊँगा
और फिर तुम्हारे साथ एक फ़िल्म देखूँगा – कुरोसावा की.
पाब्लो की कवितायें पढेंगे
और पियानो पर बाख का संगीत बजायेंगे

8 टिप्पणियाँ

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Udan Tashtari said...

ऐसी भी क्या मायूसी..उत्सव मनाईये कि एक बरस का अनुभव और अर्जित हुआ!!


सागर said...

फिर हम दोनों मिल के
गोदार्द की एक फ़िल्म देख लेंगे.
मैं तुम्हें मुक्तिबोध की दो कवितायें सुनाऊँगा
और तुम बैठ के मेरा स्केच बनाना.


मोज्जार्ट का टर्किश मार्च या बीटहोवन की फ़ुर एलिस.

लेकिन मैं कल भी तुम्हारे लिये खिचड़ी बनाऊँगा
और फिर तुम्हारे साथ एक फ़िल्म देखूँगा – कुरोसावा की.
पाब्लो की कवितायें पढेंगे
और पियानो पर बाख का संगीत बजायेंगे

..... भाई, मेरे को भी शामिल कर लेना, मेरा भी दिल जन्मदिन मानाने का करने लगा... मैं माउथ ओरगन बजाना चाहता हूँ...
कहो तो लोलिता भी पढेंगे मिल कर...


दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मैं ने तो आज अपना जन्मदिन मनाया है। खुश खुश!


Pramod Singh said...

बलाई, बलाई.. थोड़ा लेटे-लेटे आई..


VaRtIkA said...

hum sabhi dohri zindagiyaan jeete hain... ek "hum" ve hote hain jo hum hain, doosre vo "jo aadarsh sthiti mein hum honaa cahhte hain ya hote"... dono "main" khud ko akelaa paate hain kyunki inn dono ke siwaa koi yeh nahin jaanta ki doosra bhi exist karta hai...janmdin par un dono "main" ko ek karne ka khyaal accha hai... kavita bahut acchi bann padi hai... tumne dono "main" ki samaanta aur antar dono hi bahtu acche se dikhaa diye... dono kaa matbhed bhi..........

par itni udaaseentaa.....??? ek to itne din baad kuch likhe ho... veh bhi janmdinn par... aur vo aisa... kahein re...?


kanchan said...

kavita to aap ki hamesha achchhi hoti hai, Vartika ji ka comment bhi bahut khoob hai...darshan se labaalab..!

janmadin ki der se badhai...! kshama sahit


vimal verma said...

are bhaai janmdin ki badhaai .... kavita bhi aapke janmdin ko kuchh vishesh banaa rahaa hai ...ek baar phir se badhaaeeeeeeeeeeee


rahi said...

great dost ... keep it up

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