मेरी खिड़की वाली दुनिया
मेरी खिड़की से जो दुनिया दिखती है -
वो गोल नहीं है.
उसका आकार अनियमित सा है.
(समय के संदर्भ में)
एक वक्त ये सपाट सी जमीन बन जाती है,
दूर तक जिसका विस्तार होता है
और अगले ही क्षण सिमट कर रह जाती है
जिसे देख सकना भी दुश्वार होता है.
मेरी खिड़की वाली दुनिया में द्वन्द्व नहीं है,
निरपेक्षता वहाँ शून्य हो जाती है.
यहाँ अच्छाई और बुराई - सापेक्ष है
नैतिक और अनैतिक भी.
ये दुनिया, दुनिया होते हुये भी - दुनिया ना होकर
मेरी आँखों से उठ सकने वाली
सभ्यता का बोझ है.
वो गोल नहीं है.
उसका आकार अनियमित सा है.
(समय के संदर्भ में)
एक वक्त ये सपाट सी जमीन बन जाती है,
दूर तक जिसका विस्तार होता है
और अगले ही क्षण सिमट कर रह जाती है
जिसे देख सकना भी दुश्वार होता है.
मेरी खिड़की वाली दुनिया में द्वन्द्व नहीं है,
निरपेक्षता वहाँ शून्य हो जाती है.
यहाँ अच्छाई और बुराई - सापेक्ष है
नैतिक और अनैतिक भी.
ये दुनिया, दुनिया होते हुये भी - दुनिया ना होकर
मेरी आँखों से उठ सकने वाली
सभ्यता का बोझ है.
wow............
विकास भाई, बहुत कुछ कह गए हो छोटी सी कविता से। बधाई!
बढ़िया.
जन्म दिन की बधाई.
अंतिम पंक्तियाँ तो शानदार हैं । बेहतर रचना । आभार ।
विकास भाई, आपका भी जन्मदिन है क्या ? समीर जी तो बधाई भी दे गये ।
यदि है, तो हमारी भी शुभकामनायें स्वीकारें ।
यदि नहीं है, तो जब है तब के लिये रख लें ।
ओए सुना है तुम्हारा जन्मदिन है ।
पार्टी के लिए कहां आना है खबर करो ।
हम तैयार हैं ।
और हां हैप्पी बर्थडे बैचलर
Classic Boss.
And yes, I get to learn from the above comment that its your day today too ...... Many happy returns ......
कल ही नंदनी की भी एक ऐसी ही कविता पढ़ी थी ...खिड़की के विम्ब को लेकर ...दोनों का सन्देश एक ही है ..दुनिया के प्रति संवेदनशीलता
एक शब्द ! वाह
सुंदर भाव
ये दुनिया, दुनिया होते हुये भी - दुनिया ना होकर
मेरी आँखों से उठ सकने वाली
सभ्यता का बोझ है.
wah
vikas
bahut ache bhav hai aapka
aur bayan kerne ki shally bhi
bahut acha laga aapko padhna
nice wording .......
:)
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