मेरी खिड़की वाली दुनिया

मेरी खिड़की से जो दुनिया दिखती है -
वो गोल नहीं है.
उसका आकार अनियमित सा है.
(समय के संदर्भ में)

एक वक्त ये सपाट सी जमीन बन जाती है,
दूर तक जिसका विस्तार होता है
और अगले ही क्षण सिमट कर रह जाती है
जिसे देख सकना भी दुश्वार होता है.

मेरी खिड़की वाली दुनिया में द्वन्द्व नहीं है,
निरपेक्षता वहाँ शून्य हो जाती है.
यहाँ अच्छाई और बुराई - सापेक्ष है
नैतिक और अनैतिक भी.

ये दुनिया, दुनिया होते हुये भी - दुनिया ना होकर
मेरी आँखों से उठ सकने वाली
सभ्यता का बोझ है.

13 टिप्पणियाँ

Make A Comment

noopur said...

wow............


दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

विकास भाई, बहुत कुछ कह गए हो छोटी सी कविता से। बधाई!


Udan Tashtari said...

बढ़िया.

जन्म दिन की बधाई.


हिमांशु । Himanshu said...

अंतिम पंक्तियाँ तो शानदार हैं । बेहतर रचना । आभार ।


हिमांशु । Himanshu said...

विकास भाई, आपका भी जन्मदिन है क्या ? समीर जी तो बधाई भी दे गये ।
यदि है, तो हमारी भी शुभकामनायें स्वीकारें ।
यदि नहीं है, तो जब है तब के लिये रख लें ।


yunus said...

ओए सुना है तुम्‍हारा जन्‍मदिन है ।
पार्टी के लिए कहां आना है खबर करो ।
हम तैयार हैं ।


yunus said...

और हां हैप्‍पी बर्थडे बैचलर


अमिताभ मीत said...

Classic Boss.

And yes, I get to learn from the above comment that its your day today too ...... Many happy returns ......


डॉ .अनुराग said...

कल ही नंदनी की भी एक ऐसी ही कविता पढ़ी थी ...खिड़की के विम्ब को लेकर ...दोनों का सन्देश एक ही है ..दुनिया के प्रति संवेदनशीलता


सागर said...

एक शब्द ! वाह


अर्चना तिवारी said...

सुंदर भाव


Rakesh said...

ये दुनिया, दुनिया होते हुये भी - दुनिया ना होकर
मेरी आँखों से उठ सकने वाली
सभ्यता का बोझ है.
wah
vikas
bahut ache bhav hai aapka
aur bayan kerne ki shally bhi
bahut acha laga aapko padhna


rahi said...

nice wording .......
:)

Post a Comment


top