हम लोग
हम वृत्त की परिधि पे खड़े हुए लोग हैं
और हमारा जीवन - केन्द्र तक पहुँचे जा सकने की
अलसाई, मुरझाई जद्दोजहद।
फीके अभिमान और बासी अवचेतन के साथ जीते - हम,
अपनी लिप्साओं की विकल विवशता और
अनुरोधों के मृदु अवरोधों के बीच
परिधि से परिधि तक की दूरी तय किए जाते हैं।
एक-दूसरों के विराट प्रतिबिम्बों में
अपना बौना व्यक्तित्व संभाले रखने की कड़वी चेष्टा -
हमारी जीभ की शून्य होती संवेदना में ना चुभे
इस प्रत्याशा में लालायित रहते - हम,
तेजी से दौड़ने के अनुसंधान में रत हैं।
परन्तु हमारा दौड़ना, (लाख कोशिशों के बाद भी)
ना तो केन्द्र की दूरी कम करता है
और ना ही परिधि की पुरानी परिभाषा परिवर्तित कर पाता है.
हम उसी दौड़
और उसी परिभाषा की उपलब्धि के साथ
मर जाने वाले लोग हैं।
और हमारा जीवन - केन्द्र तक पहुँचे जा सकने की
अलसाई, मुरझाई जद्दोजहद।
फीके अभिमान और बासी अवचेतन के साथ जीते - हम,
अपनी लिप्साओं की विकल विवशता और
अनुरोधों के मृदु अवरोधों के बीच
परिधि से परिधि तक की दूरी तय किए जाते हैं।
एक-दूसरों के विराट प्रतिबिम्बों में
अपना बौना व्यक्तित्व संभाले रखने की कड़वी चेष्टा -
हमारी जीभ की शून्य होती संवेदना में ना चुभे
इस प्रत्याशा में लालायित रहते - हम,
तेजी से दौड़ने के अनुसंधान में रत हैं।
परन्तु हमारा दौड़ना, (लाख कोशिशों के बाद भी)
ना तो केन्द्र की दूरी कम करता है
और ना ही परिधि की पुरानी परिभाषा परिवर्तित कर पाता है.
हम उसी दौड़
और उसी परिभाषा की उपलब्धि के साथ
मर जाने वाले लोग हैं।
बहुत अधिक रेखागणितीय हो गई। पर रचना बहुत अच्छी है।
रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!
Bahut dinon ke baad koi gambheer rachna padhne ko milee.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
ई त गनित बला कौनो कबिता लग रहा है.. खैर जे है से है.. लेकीन ई कबिता हमको त खूब निम्मन लगा है.. :)
संश्लिष्ट कविता । आभार ।
Post a Comment