समझने योग्य

मुझे तुम्हारे कंक्रीट के जंगल से कोई शिकायत नहीं

और ना ही नफ़रत है तुम्हारे लगाव से.

और ना ही गुस्सा हूँ तुम पर, तुम्हारे चुनाव से.


लेकिन मैं ये पेड़-पौधे, ये दूब, ये कांटे नहीं छोड़ पाऊँगा

जो कुछ जन्म से मेरा है, प्राकृतिक है

वो जमीनी बंधन ’मैं’ नहीं तोड़ पाऊँगा.

मेरी भावात्मक जड़ता मुझे उतनी ही प्रिय है -

जितना मेरा निजत्व

और मैं स्वयं से मुँह नहीं मोड़ पाऊँगा.


सो मुझे इस गाँव की कच्ची गलियों में अज्ञातवास करने दो

’आज मेरे घर पानी नहीं आया’,

’रात में बिजली आँखमिचौली खेलती रही’,

’कल फिर मेरा खाना जल गया’ -

रूपी समस्यायें मुझे खुद से जोड़े रखती है ,

ये मैं तुम्हें समझाऊँ भी तो क्या समझोगे?


मेरी जली हुई ’मैगी’ तुम्हारे फ़ाइव स्टार के ’पास्ता’ से

हमेशा जीत जाती है – इसमें समझने योग्य कुछ है भी तो नहीं.

9 टिप्पणियाँ

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महामंत्री - तस्लीम said...

आपकी भावनाओं को सलाम करने का जी चाहता है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }


ओम आर्य said...

bahut hi sundar bhaiya.........


M VERMA said...

मेरी जली हुई ’मैगी’ तुम्हारे फ़ाइव स्टार के ’पास्ता’ से
हमेशा जीत जाती है
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bahut khoob shandar rachana


राज यादव said...

Hi Vikas, hope you doing well.
अभी परसों आप का ब्लॉग पढ़ा था..लेकिन लैपटॉप फोर्मेट होने की वज़ह से ...आपके ब्लॉग का यु.आर.एल भूल गया था...काफी सर्च किया..फिर जा के मिला....जीवन के इस भागते दौर में टाईम ही नहीं मिलता कुछ लिखने पढने का....फिर भी पता कभी-२ आप के ब्लॉग जरुर पढता हूँ.....पता नहीं क्यों ,आपकी रचनाओं में मैं हरदम अपने आप को पता हूँ..ऐसा लगता है की ये सब मेरे बारे में ही लिखा गया है......आज बहुत दिन बाद आपके ब्लॉग पर कमेन्ट दे रहा हूँ...लेकिन सच बात तो ये है...आपकी रचनाये टिप्पडी की मोहताज़ नहीं होती..कुछ रहता ही नहीं कहने को...सब कुछ आपके सब्द ही बोल देते है....

लेकिन मैं ये पेड़-पौधे, ये दूब, ये कांटे नहीं छोड़ पाऊँगा
जो कुछ जन्म से मेरा है, प्राकृतिक है

अब चलता हूँ ....वक़्त ने फिर आवाज लगाया है अपनी अल्पता पे ...

धन्यवाद
राज यादव
विचारों की ज़मीन - http://rajy.blogspot.com


विकास कुमार said...

@raaj ji!

bahut bahut dhanyawad. aisi ek tippani mujhe mahinon likhne ki prerna deti hain. bahut bahut aabhar.


vikas mogha said...

लिखना हैं इतिहास, तुम्हारी जरुरत हैं
समय नहीं अब पास , तुम्हारी जरुरत हैं
अधूरे हैं सपन प्यासे हैं नयन
मन में अधूरी पड़ी हैं आश , तुम्हारी जरुरत हैं
इक्छा तुम्हारे जैसा होने की तुम से ही लगायें लोग
तुमको क्यों नहीं अहसास कि तुम्हारी जरुरत हैं
एकता कि शक्ति ने यहाँ बदली हैं तकदीरें
तुम को नही विस्वास, तुम्हारी जरुरत हैं
श्रण तुम पर जन्म का, चाहो तो चूका दो
समाज चाहता हैं विकास, तुम्हारी जरुरत हैं


vikas mogha said...

मैं , नयी बात के साथ करने एक शुरूवात आ रहा हूँ
मैं लाने सम्पूर्ण जाति को एक साथ लाने आ रहा हूँ
जनता हूँ कुछ मुझसे सहमत न होंगे
अपनी उपजाति और गोत्रो के बन्धनों से बाहर एकमत न होंगे
बगैर उनकी परवाह किये मैं बढा जा रहा हूँ
एक एक को पिरोह के एक माला बनाने मैं आया रहा हूँ
पेड़ की छाव में छोटे से गाव में एक बूढी अम्मा
पदने की उम्र में भेड बकरियों के साथ खेलते बच्चे
मैले और फटे कपड़ो में लिपटी एक चाची
इन सब की इच्छाओं को मिलकर अपनी एक इच्छा
इनके उनत्ति के सपनो के संग सव्पन अपना मिला रहा हूँ
अपना सर्वस्व इनपे अर्पित करने का धेय ले मैं आ रहा हूँ मैं आ रहा हूँ
जानता हूँ तुम एक दिन रह न सकोगे
यह सामाजिक अन्याय तुम सह न सकोगे
उपजाति और गोत्रो के बन्धनों से मुक्त होकर
स्वया को एकता की माला में पिरोह कर
तुम आओगे वहां जहां मैं जा रहा हूं
मैं , नयी बात के साथ करने एक शुरूवात आ रहा हूँ
मैं लाने सम्पूर्ण जाति को एक साथ लाने आ रहा हूँ


Pankaj Upadhyay said...

hey vikaas...

kaise ho dost aur maza aa gaya tumhe yahan pakar..chalo feed reader mein aapki feed register kar di gayee hai. BTW shaadi ke liye dher saari subhkamnayen..

aur achha lag raha hai ki phir tumhari kavitaon ko padhne ka mauka milega :)

Take care
Bye


rahi said...

Great ......

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