एक वादा


अब तुम अपने साथ किये गये वादों का हिसाब मत माँगना.

पहले ही जिम्मेदारियों के बोझ तले मेरे कंधे टूट गये

और दबाव से ये हृदय, प्रेम सहित पिस गया है.

पहले ही सारे आँसुओं का स्टौक खतम कर बैठा हूँ.

और दिमाग का पूरा गणित धुल गया है उनके साथ.

समझोगी कभी? कि ना तो आँसू दे सकूँगा अब

ना ही जवाब और ना ही कोई हिसाब.

ना ही पूरा कर सकूँगा

वो समंदर किनारे वाले घर का सुनहरा सा ख्वाब,

जो तुम्हारे साथ बैठकर मैंने देखा था कभी.

जो भी मेरा था – वो बिक गया आधी कीमतों पे.

अब बस टूटे शब्द बचे हैं - उनकी कोई कीमत नहीं ना?

बस वही अब मेरे हैं – सो वही दे सकूँगा तुम्हें.

आखिर एक वादा तो अटूट रह पाये -

जो मेरा है, वो तुम्हें सौंपने का

5 टिप्पणियाँ

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नई कलम - उभरते हस्ताक्षर said...

shayad yahi ek shayar ke haq men rah jata hai.

shahid "ajnabi"


Science Bloggers Association said...

इसी हिसाब किताब के चक्‍कर में तो जिंदगी का मजा बेकार हो जाता है।

वैसे कविता अच्‍छी लिखी है आपने। बधाई।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }


M VERMA said...

अब बस टूटे शब्द बचे हैं - उनकी कोई कीमत नहीं ना?
bahut keemati shabd piroye hain aapne toote hue shabdo ke liye


VaRtIkA said...

behad pyaari rachnaa....


गायत्री said...

"आखिर एक वादा तो अटूट रह पाये -

जो मेरा है, वो तुम्हें सौंपने का ".

बहुत सुंदर भाव .

http://www.lonely-in-the-crowd.blogspot.com

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