एक और अभिनेता

पीस दिया गया
उसी चक्की में,
एक और अभिनेता।

वही, आपकी जानी-पहचानी चक्की -
जिसमें अच्छे अच्छे यूँ ही पीस दिए जाते हैं।

भौतिक जरूरतों के जोर
और अपनों की अभिलाषाओं के शोर ने
लील ली, एक और की कलात्मक लिप्सा।

अब ये भी
अपने घर के एकांत अंधेरे में
आईने के समक्ष
विविध भंगिमाओं में
ब्रेख्त, चेखव और कालिदास के संवाद पढेगा
और उजाला होते ही
संभ्रांत बन, पैर में जूते पहन
चला जाया करेगा अपनी नौकरी पर।

अभिनय से अलग हट चुका - यह अभिनेता
अब जीवन भर अभिनय करेगा।

12 टिप्पणियाँ

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yunus said...

अच्‍छा लगा कि इस साझे अनुभव को फौरन कविता में बदल दिया है । छा गए


दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुंदर, एकदम यथार्थ कविता है।


VaRtIkA said...

waah! yeh bas tum hi likh sakte ho…

aur ye kavita kabhi sach naa ho yehi meri dua hai….


हिमांशु । Himanshu said...

बेहतर । धन्यवाद ।


ओम आर्य said...

खुबसूरत रचना .............


विनय said...

बहुत उम्दा रचना है


woyaadein said...

अच्छी कविता, अच्छा ब्लॉग.....

साभार
हमसफ़र यादों का.......


Minakshi said...

Hope this creation isn't inspired by your real life...
Well written!


crazy devil said...

bahut pyari aur sachhi kavita


Science Bloggers Association said...

जीवन की यह चक्‍की, बडे बडों को पीस देती है। इस जीवंत कविता के लिए बधाई।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }


विनय said...

kaafi achchhi poems likhate hain...


vikings said...

bas kahna chhahunga ....dost ye panktiyan choo kar nikal gayi...

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