एक और अभिनेता
पीस दिया गया
उसी चक्की में,
एक और अभिनेता।
वही, आपकी जानी-पहचानी चक्की -
जिसमें अच्छे अच्छे यूँ ही पीस दिए जाते हैं।
भौतिक जरूरतों के जोर
और अपनों की अभिलाषाओं के शोर ने
लील ली, एक और की कलात्मक लिप्सा।
अब ये भी
अपने घर के एकांत अंधेरे में
आईने के समक्ष
विविध भंगिमाओं में
ब्रेख्त, चेखव और कालिदास के संवाद पढेगा
और उजाला होते ही
संभ्रांत बन, पैर में जूते पहन
चला जाया करेगा अपनी नौकरी पर।
अभिनय से अलग हट चुका - यह अभिनेता
अब जीवन भर अभिनय करेगा।
उसी चक्की में,
एक और अभिनेता।
वही, आपकी जानी-पहचानी चक्की -
जिसमें अच्छे अच्छे यूँ ही पीस दिए जाते हैं।
भौतिक जरूरतों के जोर
और अपनों की अभिलाषाओं के शोर ने
लील ली, एक और की कलात्मक लिप्सा।
अब ये भी
अपने घर के एकांत अंधेरे में
आईने के समक्ष
विविध भंगिमाओं में
ब्रेख्त, चेखव और कालिदास के संवाद पढेगा
और उजाला होते ही
संभ्रांत बन, पैर में जूते पहन
चला जाया करेगा अपनी नौकरी पर।
अभिनय से अलग हट चुका - यह अभिनेता
अब जीवन भर अभिनय करेगा।
अच्छा लगा कि इस साझे अनुभव को फौरन कविता में बदल दिया है । छा गए
बहुत सुंदर, एकदम यथार्थ कविता है।
waah! yeh bas tum hi likh sakte ho…
aur ye kavita kabhi sach naa ho yehi meri dua hai….
बेहतर । धन्यवाद ।
खुबसूरत रचना .............
बहुत उम्दा रचना है
अच्छी कविता, अच्छा ब्लॉग.....
साभार
हमसफ़र यादों का.......
Hope this creation isn't inspired by your real life...
Well written!
bahut pyari aur sachhi kavita
जीवन की यह चक्की, बडे बडों को पीस देती है। इस जीवंत कविता के लिए बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
kaafi achchhi poems likhate hain...
bas kahna chhahunga ....dost ye panktiyan choo kar nikal gayi...
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