तुम्हें याद है प्रिये
तुम्हें याद है प्रिये -
उस व्यस्त सड़क का सुनसान किनारा?
जहाँ तुम्हारे हाथों में मेरा हाथ ऐसा चिपका था
जैसे हम सोख लेना चाहते हों - एक दुसरे को.
जहाँ मैंने घूरते हुए लोगों को नज़रंदाज करने की कला सीखी थी
और तुम्हें अपनी ओर इस बेताबी से खींच लिया था -
मानों मेरे हृदय के दबाव से तुम सुन पाओगी,
वो मौन आग्रह, वो व्यथित निवेदन -
मुझे उस रात वहीं छोड़, घर वापस ना जाने का.
शायद वही आकांक्षाएँ तुम्हारे अंदर भी रही होंगी.
तभी तो मेरे हाथों पर हर पल तुम्हारा दबाव बढ़ रहा था
और तभी तो तुम और शिद्दत से
मुझे जल्दी भगाने की कोशिश करने लगी थी.
तुम्हें याद है प्रिये?
जब तुम्हारा अभिमान - प्रेम के आगे झुक गया था बिल्कुल,
और तुम कातर शब्दों में माँग बैठी थी मुझसे,
वो चुंबन - जो आजतक मेरे होठों से चिपका है.
तुम्हें याद है प्रिये?
तुम्हारे कपोलों की वो नमी
और तुम्हारे गालों पे कसाव के वो चिन्ह -
जिन्हें हमने झटके से चुरा लिया था वक्त की झोली से,
सारी मर्यादायें, सारे अवरोधों को नकार कर.
याद है वो क्षण?
जब धूल भरे मौसम वाला ये गर्म शहर,
बर्फ़ीला ’प्राग’ हो गया था?
आप की रूमानी कविता बहुत ही अच्छी लगी. अपने पुराने दिन याद आ गए.
"जब धूल भरे मौसम वाला ये गर्म शहर,
बर्फ़ीला ’प्राग’ हो गया था?"
बहुत सुंदर
वाह! बहुत सुंदर! रूमानियत के बिना कोई मिशन नहीं होता। रूमानियत का जीवित रहना निहायत जरूरी है।
"तुम्हें याद है प्रिये?
तुम्हारे कपोलों की वो नमी
और तुम्हारे गालों पे कसाव के वो चिन्ह -
जिन्हें हमने झटके से चुरा लिया था वक्त की झोली से.."
कपोल और गाल दोनों समानार्थी शब्दों का एक ही वाक्यांश में प्रयोग ?
देख लें, कुछ विशेष प्रयोजन तो नहीं ।
Bahut dino bad Vikas ko purane form me dekh kar achchha laga..
nahi to mujhe lag raha tha ki kahin Vikas ke bhitar ke kavi ko naukari ne nigal to nahi liya hai.. :)
pichhali 2-3 post bhi badhiya lagi thi.. comment nahi kar paya tha.. :)
wen i first read the poem, “wow! awesome” was wrd dat came out immediately d moment i finished the last line…
aapne ek chote se inicdent ko itni khoobsoorti se piroya hai ki kavita kahin bhatakti hui si maaloom hi nahin hui… flow, language, pauses, evrything was just perfect….
but i just am a bit disappointed wid d podcast… though nothing is wrong wid it, the only thing is dat the tone dat u have chosen, was different frm wat i imagined it to be… i mean u chose a sadistic tone, but i do not think it demanded it (may be u have written it dat way) … but i still feel even if wat d narrator is recalling is a past thing nd things have changed since then, the incident nd d emotions are something dat are gud enuf to be recalled as a beautiful memory… i being a reader, felt so…but still this is all a point of perception……….. nd as u wrote it, u can see it better…. :)
a gr8 piece of wrk…….
जिंदगी के कुछ पल इस तरह हमारे जीवन से चिपक जाते हैं कि उन्हें हटाना अपने मांस-मज्जा को हटाने जैसा होता है. सुन्दर अभिव्यक्ति.
जहाँ तुम्हारे हाथों में मेरा हाथ ऐसा चिपका था
जैसे हम सोख लेना चाहते हों - एक दुसरे को.
:-)....Beauty.
Bahut Badiya. Shab mujhe goosebumps dete hain!
very very good
वाह बेहतरीन... घिसी पीटी लाइन से कहीं अलग और उम्दा रचना... मज़ा आ गया दोस्त
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