ना लिखे जाने का लिखा जाना
मेरे अन्दर बहुत कुछ लिखे जाने योग्य है
और बहुत कुछ ऐसा है -
जिसका ना लिखा जाना ही बेहतर होगा।
मेरे अपनों के लिए, मेरे सपनों के लिए,
मेरे परिचितों और मेरे समाज के लिए।
और फिर जो कुछ कुत्सित है -
उसे लिख कर और प्रदर्शित करते रहना,
नग्नता की तस्वीरें - ख़ुद भी देखना औरों को भी दिखाना,
सामाजिक बदलाव एवं क्रान्ति की खोखली बातें करना,
नारियों के सशक्तिकरण के झूठे बिम्बों पर प्रहार करना,
घिनौनी हरकतों से लाभ कमाती व्यवस्थाओं पर आक्षेप लगाना,
क्रिकटरों के पीछे अंधी सभ्यता को - रोटी एवं खून की महत्ता सिखलाना,
टीवी से रिश्तों की परिभाषा सीखते समाज को -
प्रेम, दोस्ती, ईमानदारी, स्वाभिमान एवं इज्जत जैसे शब्दों की परिभाषाएं देना,
- ना आवश्यक है, ना ही करनीय.
ये वो बातें हैं - जो ना लिखे जाने योग्य की 'कटेगरी' में लिख दी गई हैं.
जिन्हें लिखने की अंदरूनी तड़प होती होगी कहीं -
लेकिन उतने अन्दर देखने का वक्त नहीं है अब
और ना ही आदत बची है.
बाहर को बचाने की जद्दोजहद में अन्दर की गलियाँ अब अपरिचित हैं।
अब वो अन्दर, अन्दर ही अन्दर ख़तम हो गया सा लगता है.
और फिर,
शब्दों में क्रूरता सबको स्वीकार्य न होगी - का भाव
मेरे महान एवं स्वीकृत लेखक होने के अहम् के विरुद्ध जाती है।
सो वो ना लिखे जाने वाली बातें, ना लिखी रह जाती हैं।
और बहुत कुछ ऐसा है -
जिसका ना लिखा जाना ही बेहतर होगा।
मेरे अपनों के लिए, मेरे सपनों के लिए,
मेरे परिचितों और मेरे समाज के लिए।
और फिर जो कुछ कुत्सित है -
उसे लिख कर और प्रदर्शित करते रहना,
नग्नता की तस्वीरें - ख़ुद भी देखना औरों को भी दिखाना,
सामाजिक बदलाव एवं क्रान्ति की खोखली बातें करना,
नारियों के सशक्तिकरण के झूठे बिम्बों पर प्रहार करना,
घिनौनी हरकतों से लाभ कमाती व्यवस्थाओं पर आक्षेप लगाना,
क्रिकटरों के पीछे अंधी सभ्यता को - रोटी एवं खून की महत्ता सिखलाना,
टीवी से रिश्तों की परिभाषा सीखते समाज को -
प्रेम, दोस्ती, ईमानदारी, स्वाभिमान एवं इज्जत जैसे शब्दों की परिभाषाएं देना,
- ना आवश्यक है, ना ही करनीय.
ये वो बातें हैं - जो ना लिखे जाने योग्य की 'कटेगरी' में लिख दी गई हैं.
जिन्हें लिखने की अंदरूनी तड़प होती होगी कहीं -
लेकिन उतने अन्दर देखने का वक्त नहीं है अब
और ना ही आदत बची है.
बाहर को बचाने की जद्दोजहद में अन्दर की गलियाँ अब अपरिचित हैं।
अब वो अन्दर, अन्दर ही अन्दर ख़तम हो गया सा लगता है.
और फिर,
शब्दों में क्रूरता सबको स्वीकार्य न होगी - का भाव
मेरे महान एवं स्वीकृत लेखक होने के अहम् के विरुद्ध जाती है।
सो वो ना लिखे जाने वाली बातें, ना लिखी रह जाती हैं।
"बाहर को बचाने की जद्दोजहद में अन्दर की गलियाँ अब अपरिचित हैं।"
बस मूक हो गया मैं । बहुत कुछ कह दिया गया है इस एक पंक्ति में ही ।
bahut sensible likha hai boss. aur sahi me sab kuch likhna anivarya nahi hota. haan ..cricket par, nari par, blah blah..bhi kabhi bahut absurd aur kabhi sensible lagte hai likhne ke liye.
bahut accha laga padhkar :)
वह भी लिखा जा सकता है, लेकिन उस के लिए उच्च कलात्मक स्तर और भारी अभ्यास की जरूरत है।
sashakt rachnaa....
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