मेरी सोच

अब मैं नहीं सोचता.
सोचने की प्रथा जाने कब की खत्म हो चुकी है.
’आउटसोर्स’ कर दिया है - मंथन भी.
अब मेरे बदले दूसरे सोचते हैं

मैं बस उन पर सहमति की मुहर लगाता हूँ
लगाऊँ या नहीं - की सोच भी
मेरे बदले और लोगों के मन में चलती है.

क्या कहना है, क्या नहीं -
क्या करना है, क्या नहीं -
क्या ठीक है, क्या गलत -
क्या मानुषिक है, क्या घृणित -
क्या कानून है, क्या अपराध -
इनमें से कुछ भी सोचना
दूसरों के अधिकार-क्षेत्र का हनन सा लगता है.

’स्वतंत्र’ नाम का शब्द -
जिसके लिये कभी करोड़ो ने आहुति दी थी,
एक अविश्वसनीय सा विचार जान पड़ता है.

और जिनकी मूर्तियों को शहीद कह कर -
चौराहे पर कबूतरों के बीच छोड़ दिया गया,
उन्हें जोर से ’बेवकूफ़’ कहने की इच्छा होती है.

पर कोई सोच ( मेरी नहीं? ) -
रोक लेती है मेरी आवाज.
मरोड़ जाता है कोई मेरी जीभ.
और कोई भी सोच - इसे हिंसा का नाम नहीं देती.

कभी कोई आहिस्ते से पूछ जाता है -
’मेरा विचार’, किसी अहम मसले पर.
मेरा जवाब क्या हो - की सोच
बड़ी खूबसूरती से सवाल में छुपी होती है.

और मैं मतदान के योग्य तभी माना जाता हूँ
जब ’मेरा’ मत - उनकी सोच से निकलता है.

सो, मैंने सोचना ही छोड़ दिया.
अब सिर्फ़ सर हिलाता हूँ अपना -
हवा के साथ साथ.

अब मैं एक जिम्मेदार नागरिक हूँ.
अब मैं खुश हूँ.
सब मुझसे खुश हैं.
मैं, मैं नहीं रहा - ’आदर्श’ हो गया हूँ.

6 टिप्पणियाँ

Make A Comment

विनय said...

शब्दों को जैसे पत्थर पे उकेरा है

----------
ज़रूर पढ़ें:
हिन्द-युग्म: आनन्द बक्षी पर विशेष लेख


Pramod Singh said...

सीधा-सीधी दिख रहा है कीबोर्ड पर उकेरा है, जबरिये बिनयजी बोल रहे हैं पत्‍थर पर उकेरा है! बोले में बिनम्रता कहां है? फिर काहे ला जरूर पढ़ लें आनंदजी बच्‍छीजी पर बिसेस? लेकिन तुम कह ही रहे हो तुमरी सोच अब तुमरी कहां रही, सब 'आउटसोर्सिंग' वाला समय है, त भरोसा से अब कुच्‍छो कहां कहा जा सकता है, बाबू, हमसे कहोगे नै पढ़ेंगे अऊर चुप्‍पे ले जाके पढ़ आओगे?


विश्व दीपक ’तन्हा’ said...

बहुत बढिया सोच!

अब असमंजस में हूँ कि यह सोच भी आप हीं की है या आउटसोर्स किया है।:)

-विश्व दीपक


हिमांशु said...

"पर कोई सोच ( मेरी नहीं? ) -
रोक लेती है मेरी आवाज.
मरोड़ जाता है कोई मेरी जीभ.
और कोई भी सोच - इसे हिंसा का नाम नहीं देती."

वास्तविक. सुन्दर अभिव्यक्ति.


Vipin Kumar said...

pyari kavita, tumhari badalti pravriti par maano ek muhar laga di :-)


VaRtIkA said...

youn hi sochte rahein…aapki soch hum sabhi ko sochne par majboor karti rehti hai…ek bahut mild aur phir bhi bahut strong vyang hai…. though it is a disguised sarcasm, it hits hard… the entire poem seems to be a complaining confession of a common man who gave up to d circumstances…. par ek aam insaan ki haar samaaj ki haar hoti hai aur yahan usi haar ko lafz diye gaye hain…aur ye lafz goonjte hain, cheekhte hain aur hriday ko bhedte hain…

aakhiri pankti k shabdon kaa chayan eik accha chunaav hai...

Post a Comment


top