एक निगाह इधर भी

अगर हाथ में कैमरा लग जाये तो तस्वीर लिये बिना मन नहीं लगता. तो कल से मेरे हाथ में एक कैमरा लग गया है. तो, अब यदा-कदा तस्वीरें भी प्रदर्शित की जायेगीं. नमूने के तौर पे यह रहा.

यह दृश्य है, पवई झील का. यह मनोरम ्तस्वीर IIT के प्रांगण से ली गयी है. (मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक)

इसके बाद एक और महत्वपूर्ण बात. पिछले साल मै रोमन में लिखा करता था. तो एक पुरानी कविता प्रस्तुत है.

इस कविता के शब्द यहाँ हैं: क्या करूँ जो आँखें रोती हैं.


पिछले दिनॊं पोस्ट की गयी कविता: कोल्ड स्टोरेज वाला इंजीनियर को भी अब मैंने रिकार्ड किया है. यहाँ भी एक नजर डाली जाये.

और अगर आप मेरे ब्लोग के दाहिने साइडबार में दिख रहे निम्न तरह के बक्से को अपने ब्लोग पर डालना चाहते हैं.

तो पधारिये ब्लोग्बुद्धि पर.

पागल का प्रेम प्रलाप



मैं समझता था कि तुम मेरे प्रेम का ईंधन हो
फिर अब तक यह आग बुझी क्यों नही?

सपनों में तुम 'मेरी' होती हो
और लोग पूछते हैं कि आजकल मैं इतना सोता क्यों हूँ?

तुम बिन जीवन बदरंग नही, अब भी सात रंग हैं
तुम, तुम, तुम, तुम, तुम, तुम और तुम।

आजकल तुम्हारे चारों और धूल बहुत उड़ती है
तुम सामने आती हो और आँख में कुछ गिर-सा जाता है।


हाँ! तुमने सच कहा था - मैं सचमुच तुम्हे भूल गया हूँ।
और उस झील को भी जहाँ पहली बार तुम्हारा हाथ थामा था

कह तो दिया मैंने कि मेरा तुमसे कोई वास्ता नही
अब यादों को भी झूठ बोलना सिखाऊं?


कोल्ड स्टोरेज वाला इंजीनियर



मैं और मेरे अधिकांश दोस्त
इंजीनियर हैं।
कोल्ड स्टोरेज वाले इंजीनियर।

जैसा कि नाम से जाहिर है,
इस तरह के लोगों की एक ख़ास बात होती है
ये अपने साथ, अपने अन्दर
एक कोल्ड स्टोरेज लिए चलते हैं।
कभी कभी इनका आकार
व्यक्तित्व के विस्तार से भी
अधिक विस्तृत होता है।

सबसे अच्छी (?) बात
कि ये कोल्ड स्टोरेज किसी को नहीं दिखता।
जिसके पास है - उसे भी नही।
जो उनके पास हैं - उन्हें भी नहीं।
अच्छा ही है!
ये कोई देखने की चीज थोड़े ही है?
ये है, इस्तेमाल की चीज।
तो होती है इस्तेमाल
बिना देखे, बिना जाने -
मैं और मेरे दोस्त करते रहते हैं इस्तेमाल इसका
सतत, निरंतर।


कुछ लोग बाजार मे घूमना चाहते थे
कुछ को तमाशे देखना पसंद था
तो कोई सबसे ऊंचे वाले झूले पे बैठना चाहता था।

लेकिन इनमे से कोई भी उत्पाती नही था
आज्ञाकारिता का दंभ, रेस में जीवन से
हमेशा जीत ही जाता था।

किसी ने मेले में गोलगप्पे की जिद्द नहीं की
रेवड़ियों की तॄष्णा भी समेट ले गए।

समेटने की अपार क्षमता थी सबमें
कैसे और क्यों - का पता नही।
( बेचारे! अपने अन्दर के कोल्ड स्टोरेज से वाकिफ जो नहीं थे। )

उम्र के विस्तार से ज्यादा
कोल्ड स्टोरेज का विस्तार हो गया।

'आई आई टी', 'एन आई टी' के वे दूकान;
जिसके अलावा सारे रास्तों पे
प्यारे पापा, दादा, नाना, चाचा, पड़ोसी
'निषिद्ध' का बोर्ड लिए खड़े थे
सब के सब पहुँच गए।

पापा, मुझे टोपी नही लेना! - बेटा जिद्द नही करते।
दादा, मैं कुरता खरीदूंगा - देखो सोनू तो टोपी ले रहा है।
अंकल, मुझे मिठाई खानी है - ना! अच्छे बच्चे टोपी पहनते हैं।
मम्मी, मुझे वो पेंटिंग लेनी है - बेटा टोपी लो।
सोनिया आंटी की बेटी तक ने टोपी पहन लिया।

मन में किसी ने शायद गाली दी होगी - "नकलची बन्दर"

लेकिन सबकी मिठाइयां, झूले, कुरते और पेंटिंग
कोल्ड स्टोरेज मे रख दी गयीं।

आज कोई कविता सुनता है - कोल्ड स्टोरेज की याद आती है।
कोई नाटक देखता है - कोल्ड स्टोरेज की याद आती है।
कोई अच्छी से पेंटिंग दिखे - कोल्ड स्टोरेज सी लगती है।

हम सब इंजीनियर होने वाले हैं
पर कोल्ड स्टोरेज का आकर सिकुड़ता हुआ नही दिखता।
लगता है -
एक दिन हमें भी
कोल्ड स्टोरेज मे ही दफ़न होना होगा
और वहीं मिलेंगे उन सारी खोयी चीजों से
जिसे जाने अनजाने हम ठेलते आए हैं।

जी हाँ!
मैं और मेरे अधिकांश दोस्त
इंजीनियर हैं।
कोल्ड स्टोरेज वाले इंजीनियर।

डब्बे में बंद आदमी

लुंज पुंज शरीर वाला आदमी
आज गुस्से में, मजबूरी में,
गुस्से की मज़बूरी में,
मजबूरी के गुस्से में,
पद्मासन लगा के डब्बे में बैठ गया है।

इसकी पैकिंग कर
करते हैं निर्यात -
वो लोग जो अभी भी डब्बे से बाहर हैं।

विदेशों में ऐसे डब्बों की बहुत मांग है
और फिर देश में विदेशी मुद्रा लाने के लिए
देशी डब्बों से आसान उपाय क्या हो?

देश की अर्थव्यवस्था के पिलर भी
कंक्रीट पे नहीं,
इन डब्बों की बुनियाद पर टिके हैं।

इसलिए डब्बों के लिए योजनायें हैं
उनके लिए बजट पारित होते हैं
विकास के नाम पर करोड़ों रुपये
डब्बे में डाले जाते हैं।

लेकिन इसके अंदर बैठा
लुंज पुंज, बीमार, बेकार मरीज
दम्मे की बीमारी से अभी भी खांसता है।
उसका दम घुट जाए,
ज्यादा फर्क नही पड़ता।
क्यूंकि लाश भी डब्बे में ही रहेगी।
ना किसी को लाश की बदबू आएगी
ना ही किसी को डब्बे खाली होने का अहसास होगा।

सीधा सा सवाल

- तू पगला गया है क्या?
- नहीं रे! इ तो एडभांस लोग पूछते हैं आजकल!
- जाके अप्पन चेहरा देख ऐनक में. बड़ा आया एडभांस बनने.
- देख सुनीता! जादे बकबक मत कर. एतना बढिया से पूछ रहे हैं त हाँ बोलने से मर नहीं जायेगी.
- बाकी का पूछ रहा है? अब तोरा एतना अन्गरेजी हम कहाँ जानते हैं?
- अरे सीधा सा सवाल है - ’बिल उ बी माई भैलेन टाइन’?
- देख इसका मतलब जाने बिना मैं कुछ नहीं कह सकती.
- अब मतलब केकरा से पूछें?
- मतलब तुझे भी नहीं पता?
- तू आजकल बहुत नौटंकी झाड़ने लगी है. मतलब से का मतलब? हम पूछे हैं, तू हाँ कह. आऊ फिर दोनो सिनेमा देखने जायेंगे. नहीं कहेगी त हमको अकेले जाने पड़ेगा.
- त इ बोल ना कि फिलीम जाने के लिये कह रहा है.

कनुप्रिया : पूर्वराग

धर्मवीर भारती की कनुप्रिया प्रारंभ से ही मुझे प्रिय रही है। सो मैंने सोचा कि इसे रेकॉर्ड करूं। प्रस्तुत है पहला अंश जिसका नाम है: पूर्वराग। इसके अतिरिक्त चार अंश और भी हैं: मंजरी-परिणय, सृष्टि-संकल्प, इतिहास एवं समापन। एक एक करके सबको आवाज देने की चाह है।

1. पहला गीत


2. दूसरा गीत


3. तीसरा गीत


4. चौथा गीत


5. पांचवां गीत

दो हिस्से : दो किस्से


स्वयं को केन्द्र मान
जो वृत्त मैंने बनाया है
क्यों मैं खुद को ही उसकी परिधि पे पाता हूँ?
क्यों मैं स्वयम से अजनबी बन जाता हूँ?


मैं कवि नही हूँ
शब्दों से मेरा कोई नाता नही
भावनाएँ तो मुझसे भय खाती है।
वो तो लोकल की ठेल में
जब भूखे पेट पर चोट लगती है
तब कविता की 'कै' निकल जाती है।

गर्व

हाँ!
मैं तुम्हारे विश्वास में ढल कर
अपेक्षित आकार ना ले सका.

ना ही
तुम्हारी कल्पना के सागर में नहा
अपने मन की कलुषता गंवा पाया.

मैं - मैं ही रह गया.

और मुझे इस बात का दुःख नहीं,
गर्व है.

  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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