02 May, 2008

अब ये देश जला दो

राम मरे रावण के हाथों, सीता मैय्या जल गई
गुरुग्रंथ बस ग्रंथ बन गया, उमर बुद्ध की ढल गई

कुछ भी नहीं है शेष, अब ये देश जला दो.

मुसलमान ने हिन्दु मारा, खुदा हुए परेशान
हिन्दु ने हथियार उठाया, अब रोया भगवान
मंदिर मस्जिद सब घबराये, खतरे में है जान
हँसता है हैवान, ना मिलता एक भी अब इंसान

धर्म का ये संदेश कि अब ये देश जला दो.

मधुशाला की साकी को, खुद मदिरालय ने मारा
हिमगिरि का उत्तुंग शिखर भी, मूक रहा बेचारा
हारे को हरिनाम मिले क्या? हरि स्वयं भी हारा
कवि भरा है कोलाहल से, सूखी कविता धारा

दंग है हर दर्वेश तो अब ये देश जला दो.

खून रोज ही देते हैं, आजादी ना मिल पाई
और सुरसा के मुख के जैसे, बढ़ती है मंहगाई
संसद में बरसात, बदली है सारे देश में छाई
लोग कहीं और तंत्र कहीं हैं, लोकतंत्र है भाई

लो माचिस है पेश, अब ये देश जला दो.

5 टिप्पणियाँ:

anitakumar said...

ये हुई न बात्…बहुत खूब लिखी है।

Udan Tashtari said...

लो माचिस है पेश, अब ये देश जला दो.


--यही हालात कर डाली इन लोगों ने. बहुत उम्दा, विकास.

राज भाटिय़ा said...

मुसलमान ने हिन्दु मारा, खुदा हुए परेशान
हिन्दु ने हथियार उठाया, अब रोया भगवान
मंदिर मस्जिद सब घबराये, खतरे में है जान
हँसता है हैवान, ना मिलता एक भी अब इंसान
क्या बात कही हे विकास सभी आप जेसा सोचे तो कितना अच्छा हो.

आलोक कुमार said...

machis ke saath kirasan tel bhi pesh hai... :)

navya said...

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