07 April, 2008

दुनिया

मेरे लिये दुनिया दो हिस्सों में बंटी है.
एक जिसमें मैं रहता हूँ
और दूसरी जो मुझमें रहती है.

दोनों के अलग अलग कानून हैं
एक मुझे जकड़ने की कोशिश करता है
तो दूसरा चाहता है विस्तार.

इन दोनों विश्वों की सीमा पर बैठा मैं -
मूक होकर इनका युद्ध देखता हूँ.

तुम्हें इस जंग का हिस्सा बनाने से
डरता तो हूँ.
लेकिन तुम्हारे बिना,
यह युद्ध ही औचित्य-हीन हो जायेगा.

अजीब सी बात है!
युद्ध का कारण, हथियार, उद्देश्य
सब एक ही हैं.

तुम्हारे बिना दोनों की जीत निरर्थक है.
और तुम्हारे साथ तो हार भी सार्थक ही होगी.

मेरे लिये दुनिया दो हिस्सों में बंटी है.
और तुम जहाँ होती हो - उसे मैं स्वर्ग कहता हूँ.

5 टिप्पणियाँ:

PD said...

मेरे लिये दुनिया दो हिस्सों में बंटी है.
और तुम जहाँ होती हो - उसे मैं स्वर्ग कहता हूँ.

और कुछ नहीं कहना है...

मीत said...

वाह विकास. भाई मन खुश हो गया. बहुत बढ़िया.

Udan Tashtari said...

क्या बात है-बड़ा ही डूब कर लिखा है. बहुत उम्दा.

इरफ़ान said...

तलाश जारी रहे. शुभकामनाएँ.

Minakshi said...

And how do you manage to create such magnificent lines...
They are beautiful...

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