15 April, 2008

वो शख्स बड़ा अजीब है

तुम जिसे प्यार कर बैठी हो,
वो शख्स बड़ा अजीब है.

वर्षों तक उसके साथ रहने पर भी
मैं आज तक उसे समझ नहीं पाया

आज तक उस के मन के अछूते कोने में
अपनी टांग ना जमा पाया.

तो फिर उसकी अजीब हरकतों का राज
तुम्हें कैसे समझाऊँ?
जो चित्र कभी देखा ही नहीं
उसकी आकृति कैसे बनाऊँ?

तुम जिसे प्यार कर बैठी हो,
वो शख्स बड़ा अजीब है.

कभी बेबात ही हँस देता है पागलों की तरह
कभी रोता है - एक मासूम चेहरा ले कर
कभी बन जाता है दार्शनिक
और खरोंचने लगता है तुम्हारी आत्मा
तो कभी छोटी सी बात समझने में
एक युग लगा देता है.

कभी तुम्हारी सारी उलझन यूँ ही सुलझाता है
और कभी सीधी सी राह में
खुद भी उलझ जाता है.

कभी मृत्यु भी उसे नहीं डरा पाती
तो कभी महज तुम्हारा ना होना -
उसे मार देने को पर्याप्त है.

तुम जिसे प्यार कर बैठी हो,
वो शख्स बड़ा अजीब है.

8 टिप्पणियाँ:

PD said...

superb.. mere dost superb..

अतुल said...

कभी मृत्यु भी उसे नहीं डरा पाती
तो कभी महज तुम्हारा ना होना -
उसे मार देने को पर्याप्त है.

Manish said...

अज़ीब कविता है ये :)

दीपक said...

उम्दा,सुन्दर अर्थपुर्ण ,लाजवाब ,रोचक, मजेदार ,
वाह सुभान अल्लाह !!

Udan Tashtari said...

वाकई!! वो शक्स बड़ा अजीब है!

अभिषेक ओझा said...

बहुत खूब... !

Aditya Patel said...

Uttam :)

विकास कुमार said...

प्रतिक्रिया का धन्यवाद सज्जनों. :)

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