मुम्बई
ये शहर चूस लेता है आत्मा को.
कभी कभी टूटे विश्वास जगाता है.
और जब -
आशाओं एवं उम्मीदों की खाद से,
रिश्तों की फ़सल उगने को होती है
जला देता है सब कुछ - तेज गर्मी से.
बिखेर देता है फिर से.
जीवन, विश्वास, आस्था, आशा, सबकुछ.
वो भी इस कदर
कि समेटने को अरब सागर की बाहें भी
छोटी पड़ जाती है.
और कंधे तो होते ही नहीं यहाँ.
ये शहर चूस लेता है आत्मा को.

6 टिप्पणियाँ:
बड़ी गहरी बात कह गये दिल की गहरे एहसासों की जुबानी. बधाई.
आज का सच कह दिया हे आप ने विकास,बहुत खुब धन्यवाद
एकदम सही है।
सही कहा दोस्त
सही कह रहे हो
i just wrote something on mumbai and den i came across this...how our views differ!!!
despite of anything and evrything which happens to the city, which happens or has happened to me in d city, i love it with all my heart!!!
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