जवाब



तुम्हारे अन्दर का जीवन
निकलने की कोशिश में
तुम्हारे आंखों की खिड़कियों पर
अपने हाथ पाँव मारता तो है कभी कभी।

परन्तु तुमने ही
मानों सारे दरवाजे एवं खिड़कियों पर
मोटे ताले डालकर -
भावों की चाभियाँ
ह्रदय के गहरे समंदर के
अथाह एकांत में
ना जाने क्यों, फेंक दिया है।

और फिर, तुम तो जानती ही हो
कि मुझे तैरना नहीं आता।
फिर भी हिम्मत करके कूद गया हूँ
लहरों के थपेडों से
मेरी आंखों में खारा पानी
भर जाया करता है कभी कभी।

तुम्हारे अन्दर का समंदर
धीरे धीरे अब मेरे अन्दर सरकने लगा है
मेरे फेफडे जवाब दे दें,
उससे पहले तुम्हे जवाब देना होगा।
हिम्मत के हथौडे से,
तोड़ दो ना सारे ताले!

7 टिप्पणियाँ

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डॉ. अजीत कुमार said...

जबरदस्त भावों से भरी कविता , उतनी ही उत्कृष्टता के साथ प्रस्तुति.
धन्यवाद.


Preeti Datar said...

I like the deep rooted sentiments, the vidid desciptives and the urgency to have your lover speka up and act, so that the love stays or begins...

and i won't sa I love your voice for the nth time, you already know it! )


परमजीत बाली said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना है।बहुत बढिया!!

तुम्हारे अन्दर का जीवन
निकलने की कोशिश में
तुम्हारे आंखों की खिड़कियों पर
अपने हाथ पाँव मारता तो है कभी कभी।


Mired Mirage said...

सुन्दर!
घुघूती बासूती


Surya said...

लाजवाब !!


कंचन सिंह चौहान said...

sach me bahut sundar..!


Anonymous said...

bemisaal!!
vikas aise bhaw aisi anubhuti bahut kam hoti hai jab aap kisi ki krati ke madhyam se khud ko mehsus karein. aap me wo baat hai. bahut badhai.
lagta hai apme ek darshnik panap raha hai
pratiksha

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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