तुम जो नहीं हो मेरे पास
सोचता था
कि जिस दिन तुम्हारी तस्वीर सामने रख
तुम्हारी आवाज सुनूँगा
उस दिन भाव, मेरे अंदर इस कदर छलकेंगे
कि कविता की कई गगरियाँ भर जायेंगी.
और आज,
जब तुम्हारे चित्र को सामने रख
तुम्हारी आवाज का मधु पी रहा हूँ -
हॄदय के सितार पर
कोई गीत ही नहीं उपजता.
टूटे हुए छंदों के अलावा
कोई राग नहीं बजता.
अगर कुछ है,
तो बस कोलाहल.
और अपूर्णता का कटु अहसास.
तुम जो नहीं हो मेरे पास.
तुम्हारी आँखों में रंग तो है,
पर उनमें वह प्रेम नहीं मिलता
और ना ही तुम्हारी शरारत का भान होता है.
तुम्हारी जुल्फ़ों की लंबाई तो है,
मगर उनकी खुशबू कहाँ से लाऊँ?
और तुम्हारा प्रेम भरा स्पर्श कैसे पाऊँ?
तुम्हारे मुस्कान का तो एक अंश
मेरे पास आ गया है,
लेकिन तुम्हारे आँसुओं को
अपने हाथों से कैसे हटाऊँ?
इन्हीं खयालों में दिल है उदास.
आखिर तुम जो नहीं हो मेरे पास.

1 टिप्पणियाँ:
Wah Vikash ji, badey form mein lagtey ho :P
Ek aur sixer!!
Bahut khoob, aur kaya bolu?
Saare shabd tumne chura jo liye hai :)
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