13 March, 2008

डूबते सुरज की कुछ तस्वीरें

ये शाम की तनहाइयां ! ऐसे में तेरा गम...!!!



सांझ ढले! गगन तले! हम कितने एकाकी!



ढल गया दिन, हो गई शाम


लग जा गले कि फिर कभी मुलाक़ात हो ना हो!!!




लुक्खा फोटोग्राफर
तस्वीर बनाये क्या कोई, क्या कोई लिखे तुझपे कविता :)

7 टिप्पणियाँ:

Surya said...

कला को बस माध्यम चाहिये बाहर निकलने का ..
केमेरा ही सही अब !
और ये आखिरी तस्वीर कुद्द ’दूबते सूरज’ के अन्दर जमी नही ...

yunus said...

अच्‍छा है तुम्‍हारे हाथ में कैमेरा है बंदूक नहीं । सूरज के साथ साथ खुद को शूट करने का मोह छोड़ नहीं पाए हंय । बहरहाल सारे सूरज अच्‍छे लगे आखिरी तस्‍वीर वाले सूरज पर ग्रहण लगा दिखा । फोटोग्राफर अच्‍छे बन सकते हो । सूरज हो गया अब चांद की बारी है ।

Udan Tashtari said...

लुक्खा फोटोग्राफर
तस्वीर बनाये क्या कोई, क्या कोई लिखे तुझपे कविता :)


---सत्य वचन,,बालक..बाकी तो बढ़िया हहिये है..मेरे यह चौचक और सच की अभिव्यक्ति. :)

Preeti Datar said...

What a splendid sight!
Bravo with your evenings ventures at the lake side :)
(i know the smiley looks ridiculous, but hey...)

दिनेशराय द्विवेदी said...

इन चित्रों को देख अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई हालाँकि ये शूट उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाएंगे। इसलिए लिख रहा हूँ शायद अब की बार वह कविता शूट हो जाए तो दोनों को एक साथ पेश किया जाए।
" उस ने आते ही
कटार मार दी
सूरज के सीने में
और रवि
रवि रक्त से
रक्त सा हो गया
हो गया साम्राज्य, फिर
उस क्रूर कलुषित रात्रि का
जिस की अग्रदूत
बन आई थी
वह निर्दयी सांझ
जिस की अग्रदूत बन
आई थी, वह निर्दयी सांझ......"

मुझे इस कविता के शूट की प्रतीक्षा रहेगी।

कंचन सिंह चौहान said...

सुदर.... बहुत सुंदर

prabhakar said...

विकास जी आप तो नये रंग चुनकर ला रहे हैं।

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