भय
अब तक तो सब कुछ ठीक था
फिर ना जाने कहाँ से आकर
यह अज्ञात भय
मेरे मन के कोने में सुगबुगाने लगा है.
तुमसे कुछ शब्द ही तो कहे थे.
कुछ देर ही तो,
तुमसे अपनी अनुभूतियाँ बाँटी थी.
उसकी इतनी बड़ी सजा?
मन को चाहे अस्वीकृति के
कितने भी पाठ पढाऊँ
वो तो मानो मेरा होकर भी
मेरा ही विद्रोही बन गया है.
कवितायें लिखता हूँ
और फिर उन्हें मिटाने की इच्छा होती है.
शब्दों के अर्थ - बेमतलब हो गये हैं
शब्दों का उपयोग - बचकाना लगने लगा है.
यदि बिना शब्दों की कविता लिखी जा सकती
तो मैं भी एक बार कोशिश कर देखता.
मैं भी तुम्हारी चेतना में छुपे
उस अज्ञात उत्तर को तलाशता
जिसे शब्दों के आवरण से नहीं ढँका जा सकता.
इतिहास के पन्नों में पढी वो सारी कथायें,
जो काल्पनिक जान पड़ती थी -
उन्हीं से अपना मनोविज्ञान समझ पा रहा हूँ.
सारी उपमाएँ, महज उपमाएँ नहीं रह गयी हैं
वरन वास्तवितकता से अधिक सत्य बन गयी हैं.
मैं भी अब साधारण नहीं रहा.
तुम्हारे विचार ने मुझे छूकर
अलौकिक बना दिया है.
अब मैं पृथ्वी पर नहीं रहता.
जीता हूँ, तुम्हारे मन के धरातल पर.
जहाँ तुम्हारा साम्राज्य है.
जहाँ तुम्हारा एक विचार - मुझे मृत्यु देने को पर्याप्त है.
और अजीब बात है,
कि मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं.
भय है तो वापस इसी धरा पे आ जाने का.

आलौकिक ! बहुत अच्छे,ऐसा काम करते ही क्यौं है जिससे भय उपजता हो, कुछ ऐसा कीजिये कि प्यार पनपे,कविता अच्छी लगी मित्र,और फ़्रेम तो बड़ा चौकस बनाएं है नया गेट अप अच्छा है, लगे रहिये...
बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती
बहुत खूब मित्र!
भय और प्रेम का अच्छा सामंजस्य बैठाया है आपने।
बधाई स्वीकारें।
-विश्व दीपक ’तन्हा’
A BIG Thank you for the translation *hugs*
I like how the poet's mood wings in the poem, the clsoing two stanzas being the icing on the cake :)
love your voice again.... :D
मस्त कविता है विकास जी।
gajjab podcasting karte ho yar...
aawaaz me dhaaansu dramatisation kiya hai..
"तुमसे कुछ शब्द ही तो कहे थे.
कुछ देर ही तो"
’भय’ भी है अगली मे ’जवाब’ भी चाहते हो....
आखिर चल क्या रहा है इस कवी के जीवन मे ?
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