पर सनम इतना तो है

मैं कहाँ कहता हूँ, तेरे बिन नहीं जी पाऊँगा?
मैं कहाँ कहता हूँ, तू जो ना मिली मर जाऊँगा?
मैं कहाँ कहता हूँ, सूना तेरे बिन संसार है?
पर सनम इतना तो है कि मुझको तुमसे प्यार है !
मैं नहीं ये जानता कि प्यार का मतलब है क्या.
जिन्दगी भर के लिए इकरार का मतलब है क्या.
पागल हूँ मैं, नादान हूँ, इस से कहाँ इनकार है?
पर सनम इतना तो है कि मुझको तुमसे प्यार है !
सातों जनम में साथ दूँगा कह नहीं सकता.
इस जनम में भी मैं हर पल रह नहीं सकता.
चाँद तारे लाऊँगा, ये सोचना बेकार है...
पर सनम इतना तो है कि मुझको तुमसे प्यार है !
नोट: यह मैंने ३ साल पहले लिखी थी. उस वक्त मैं सुलेखा पर यथार्थ के नाम से लिखा करता था. और ५-६ कवितायें वहाँ पोस्ट की थी.

First one to comment!
Your poetry has grown by leaps and bounds in these three years.
But hey, i liked this one purely for its simplicity and use of simple words!
विकास जी,बहुत ही सुन्दर प्रेम गीत लिखा है।्तथा उतना ही सुन्दर आप ने ब्लोग बनाया है।बधाई स्वीकारें।
मैं नहीं ये जानता कि प्यार का मतलब है क्या.
जिन्दगी भर के लिए इकरार का मतलब है क्या.
पागल हूँ मैं, नादान हूँ, इस से कहाँ इनकार है?
पर सनम इतना तो है कि मुझको तुमसे प्यार है !
उम्मीद है कि इन तीन-चार सालों में प्यार कामतलब समझ गये होंगे.
hmm accha hai..but you I feel tum is se bahut jayada accha likh sakte ho
हर प्क्ति भावना से ओत प्रोत.... यथार्थ और भावनाओं का सटीक संगम... बहुत खूब..!
विकाश अब इस मूड से बाहर आ जाओ अब तुम बड़े हो गये हो…:)
achchi hai !
Post a Comment