पागल का प्रेम प्रलाप



मैं समझता था कि तुम मेरे प्रेम का ईंधन हो
फिर अब तक यह आग बुझी क्यों नही?

सपनों में तुम 'मेरी' होती हो
और लोग पूछते हैं कि आजकल मैं इतना सोता क्यों हूँ?

तुम बिन जीवन बदरंग नही, अब भी सात रंग हैं
तुम, तुम, तुम, तुम, तुम, तुम और तुम।

आजकल तुम्हारे चारों और धूल बहुत उड़ती है
तुम सामने आती हो और आँख में कुछ गिर-सा जाता है।


हाँ! तुमने सच कहा था - मैं सचमुच तुम्हे भूल गया हूँ।
और उस झील को भी जहाँ पहली बार तुम्हारा हाथ थामा था

कह तो दिया मैंने कि मेरा तुमसे कोई वास्ता नही
अब यादों को भी झूठ बोलना सिखाऊं?


12 टिप्पणियाँ

Make A Comment

crazy devil said...

its very personal from u..and should say..dil ke alffaz nikal ke likh dia hai tumne


Rahul Priyedarshi said...

Excellent Vikas Ji
jabardast hai


परमजीत बाली said...

बहुत भावपूर्ण रचना है।


Surya said...

सच मे सात रन्ग दिखे इस रचना मे !


Pramod Singh said...

परमजीत भाई ने पहले कह ही दिया है, मैं वही दोहराता हूं.. कि भाव तो हैं ही, पूर्ण भी है..


मीत said...

What say Boss ? Have you left anything unsaid ?? Its just ... well, its just what it is. No comments ?? No, not quite... its a beauty, Vikash...


Udan Tashtari said...

वाह भई वाह..छा गये..बहुत बधाई. जारी रहो.


आलोक कुमार said...

pagal ka prem pralaap...bhaawnaaon se ot-prot hai...
blog ka huliya to bahut rachnaatmak hai :)))


Preeti Datar said...

तुम बिन जीवन बदरंग नही, अब भी सात रंग हैं
तुम, तुम, तुम, तुम, तुम, तुम और तुम।

^ Yeh saat rang khub hai! :)
I love the voice modulations!!


विकास कुमार said...

धन्यवाद आप सबों का. :)
इसी तरह दयादृष्टि बनाये रखें.


Kratee said...

prem ..............


bharatgoyal said...

deep words for deep feelings...
nicely expressed.

Post a Comment


top