डब्बे में बंद आदमी
लुंज पुंज शरीर वाला आदमी
आज गुस्से में, मजबूरी में,
गुस्से की मज़बूरी में,
मजबूरी के गुस्से में,
पद्मासन लगा के डब्बे में बैठ गया है।
इसकी पैकिंग कर
करते हैं निर्यात -
वो लोग जो अभी भी डब्बे से बाहर हैं।
विदेशों में ऐसे डब्बों की बहुत मांग है
और फिर देश में विदेशी मुद्रा लाने के लिए
देशी डब्बों से आसान उपाय क्या हो?
देश की अर्थव्यवस्था के पिलर भी
कंक्रीट पे नहीं,
इन डब्बों की बुनियाद पर टिके हैं।
इसलिए डब्बों के लिए योजनायें हैं
उनके लिए बजट पारित होते हैं
विकास के नाम पर करोड़ों रुपये
डब्बे में डाले जाते हैं।
लेकिन इसके अंदर बैठा
लुंज पुंज, बीमार, बेकार मरीज
दम्मे की बीमारी से अभी भी खांसता है।
उसका दम घुट जाए,
ज्यादा फर्क नही पड़ता।
क्यूंकि लाश भी डब्बे में ही रहेगी।
ना किसी को लाश की बदबू आएगी
ना ही किसी को डब्बे खाली होने का अहसास होगा।
आज गुस्से में, मजबूरी में,
गुस्से की मज़बूरी में,
मजबूरी के गुस्से में,
पद्मासन लगा के डब्बे में बैठ गया है।
इसकी पैकिंग कर
करते हैं निर्यात -
वो लोग जो अभी भी डब्बे से बाहर हैं।
विदेशों में ऐसे डब्बों की बहुत मांग है
और फिर देश में विदेशी मुद्रा लाने के लिए
देशी डब्बों से आसान उपाय क्या हो?
देश की अर्थव्यवस्था के पिलर भी
कंक्रीट पे नहीं,
इन डब्बों की बुनियाद पर टिके हैं।
इसलिए डब्बों के लिए योजनायें हैं
उनके लिए बजट पारित होते हैं
विकास के नाम पर करोड़ों रुपये
डब्बे में डाले जाते हैं।
लेकिन इसके अंदर बैठा
लुंज पुंज, बीमार, बेकार मरीज
दम्मे की बीमारी से अभी भी खांसता है।
उसका दम घुट जाए,
ज्यादा फर्क नही पड़ता।
क्यूंकि लाश भी डब्बे में ही रहेगी।
ना किसी को लाश की बदबू आएगी
ना ही किसी को डब्बे खाली होने का अहसास होगा।

बड़े दिनॊ बाद रात में निकला हूं,आप भी कमाल कविता करते है ...ऐसे ही लिखते रहिये,कम से कम आपको पढ़्कर हम तो डिब्बे से बाहर निकल ही आएंगे,
बड़ी गहराई है बात में..कई बार पढ़ने के बाद मनन करने को मजबूर करती रचना, बधाई.
शानदार और मजबूत अभिव्यक्ति
बीमारी से अभी भी खांसता है।
उसका दम घुट जाए,
ज्यादा फर्क नही पड़ता।
बहुत आसानी से बड़ी गहरा यथार्थ लिखा है
आप ठीक कहते हैं विकास की सढाँध डिब्बों में बंद है.
सच कहा। निर्यात के नाम पर हमारे पास यही ढकोसला है। अच्छी कविता।
कई अर्थ छवियों वाली एक विचारशील कविता ...
डब्बे में बन्द आदमी ..
दडबे में बन्द आदमी भी है ..बडे शहरों का छोटा आदमी ..घुटता आदमी खुद खुद अपनी सडान्ध में ...
धन्यवाद आप सबों का. :)
Dabbe men band log is kavita ko padhkar sochne par majbur ho jaenge ...
बहुत खूब लिखे हो भाई
bahut hi achchhii :)
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