23 January, 2008

अपने समय को लिखो!

एक दिन मैं एक आदरणीय की बाइक की पिछली सीट पर बैठा उनका प्रवचन सुन रहा था। कुछ देर तक मेरे लेखन की कूड़ात्मकता का बखान करने के बाद उन्होने मुझसे कहा कि 'अपने समय को लिखो!' फिर उन्होने समय को प्रदर्शित करने वाले महान लेखक आदि के उद्धरण इत्यादी देने प्रारंभ कर दिए। तत्पश्चात सामयिक लेखन के महता की आरती हुई।

"अगर तुम अपने बगल मे रोज नालियाँ देखते हो, तो नालियाँ लिखो ना! फूल की खुशबू लिख के खुद को फूल क्यों साबित करते हो?"

बीच में मैंने टोकने की कोशिश की।

"मैंने, नाली तो नही पर, नाले पर एक कविता जरूर लिखी है। और फटाक से संदर्भ पेश किया।
'मेरा मन -
एक नाले की तरह है।
शाश्वत नाला।
जिसका और छोर पता नहीं चलता
सिर्फ सडांध महसूस होती है....'

परन्तु उन्हें मेरे काव्य या लेखन में शायद कोई दिलचस्पी थी ही नही। वो तो बस समय-के-बारे-में-लिखो रुपी कुछ प्रलाप-सदृश किये जा रहे थे।

"तुम हमेशा ये चिरकुट प्रेम की चिरकुटई लिखते हो। इसमे क्या सार है? समय को....

"अरे काहे का भेजा फ्राई कर रहे हैं? सार तो इस संसार मे ही नहीं है। बेमतलब का मेरे पास ढूँढने मे तो बिल्कुल नही है। वैसे भी मैं आपके समय का थोडे लिखूंगा? नारी - भिखारी, अत्याचार - अखबार, गन्दी राजनीति और गरीब जनता एक बारे में आप लिखिए। मैं अभी अभी जवानी की चौखट पर आया हूँ। यही मेरा समय है। और मेरे समय में प्रेम ही लिखा जा सकता है। प्रेम ही लिखा जाता रहा है और प्रेम ही लिखा जाएगा। जिन्हें मिल जाता/जाती है, वो प्रेम की खूबसूरती पे लिखते हैं। जिन्हें नही मिलता वो प्रेम के वैकूफ्य ('बेवकूफी' से अच्छा शब्द लगा) पर लिखते हैं। जिनका मिल के खो जाता है, वो विरह की आग लिखते हैं। और जो कुछ नहीं समझ पाते वो प्रेम का दर्शन लिखते हैं। "

लंबा चौडा गुबार निकाल लेने के बाद, मैंने मानो उद्घोष किया - "मेरी लेखनी पूर्णतया सामयिक है।"

वो धीर गंभीर हो कर सुनते सुनते अचानक हँसने लगे और बोले, "तुमने बात के सार को नहीं समझा। समय से मेरा तात्पर्य था - काल। अपने काल को लिखो। तुम 'उम्र' से कन्फ्यूज़ हो रहे हो। मैं बुढ्ढा हूँ, तुम युवा हो। हमारी उम्र अलग अलग है लेकिन हमारा काल एक ही है। मैं उस काल की बात कर रहा हूँ।"

हँसी मुझे भी आ गयी।
(अभी तक समय समय कर रहे थे, अब काल की पुँछ पकड़ ली! हः)

"ये किसने कह दिया की हम दोनों एक ही काल के हैं? आप मेरे भविष्य काल हो, मैं आपका भूतकाल हूँ और मेरी सारी रचनाएँ वर्तमान काल की हैं।"

मुझे लगा था की वो निरुत्तर हो जायेंगे। लेकिन नहीं! अजीब सा जीवट था उनमे भी। अनुभव की तलवार का प्रयोग हर वृद्ध की तरह उन्हें भी आता था।

"मैं मानता हूँ कि भूतकाल में मैंने भी बहुत चिरकुटई की है इसलिए तुम्हे रोक रहा हूँ। "

मैंने देखा कि ना तो वो मुझे अपना तात्पर्य समझा पा रहे हैं, ना मैं उनकी कही बातें पचा पा रहा हूँ। और फिर हमारे अलग होने का वक़्त भी हो चला था। सो मैंने कह दिया कि मैं कोशिश करूंगा।

फिर दुनिया के झमेले मे व्यस्त हो गया। सारी बात हवा हो गयी। धीरे धीरे व्यस्तता के चलते लिखना भी कम हो चला था।

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एक दिन अचानक, बहुत दिनों बाद मेरी मुलाक़ात उनसे हो गयी। वो तुरत पूछ बैठे, "क्या बात है? आजकल लिख नहीं रहे हो?"

मैंने भोली सूरत बनाकर कहा, "आपने ही तो कहा था कि काल को लिखने की कोशिश करो। तो कोशिश जारी है।"

व्यस्तता के बारे में बोल नहीं सका। संसार की महाशून्यता पर विवाद करने के मूड में नहीं था।

"फिर भी कुछ तो लिखा होगा" पूछ के इस तरह से मुझे देखा कि ना कहते मुझे लज्जा आने लगी। कुछ ना कुछ तो कहना ही होगा - यही सोच कर, दार्शनिक गंभीरता से जो मन में आया बकने लगा। और बकता रहा, बकता रहा।

"आपसे बातें करने के बाद मेरी आँखें खुली और मैंने काल के बारे में सोचना प्रारंभ कर दिया। समय या काल को लोग निरंतर समझते हैं। लेकिन मेरे विचार से यह अर्धसत्य है। वैसे मैं मानता हूँ कि सत्य कभी आधा नहीं हो सकता लेकिन इस स्थिति के लिए इससे सटीक शब्द मेरे कोष में नहीं है। काल निरंतर नहीं, रूक रूक के चलता है। घडी की बैटरी कभी ना कभी तो खतम होती है। और बैटरी बदलने मे थोडा वक्त भी लगता है। एक क्रांति होती है - समय दौड़ता है। मनुष्य आजाद होता है - समय चलता है। इंसान हर रोज अपने पुराने दिन को दुहराने लगता है - धीरे धीरे काल थक कर सो जाता है। एक स्थिर भाव पूरे समाज पे छा जाता है। तब तक, बैटरी नही बदली जाती...मेरा मतलब है - जबतक एक नयी क्रांति नही आती।

हमारा समाज आज ऐसे ही स्थिर-भावी-काल से हो कर गुज़र रहा है। इसलिए मैं क्रांतिकारी विचार नहीं, सन्नाटा लिख रहा हूँ। मेरे ना लिखने को 'न लिखना' ना समझिए। मैं आजतक की अपनी सारी रचनाओं से बड़ी व महान रचना लिख रहा हूँ। अपने काल को लिख रहा हूँ। हमारा काल अभी विश्राम कर रहा है, गतिशील नहीं है। इसलिए इस लेख मे अभी शब्द नहीं हैं। मैं विराम लिख रहा हूँ। एक दिन गति भी लिखूंगा। तब मेरे लेख में शब्द भी वैसे ही चमकेंगे जैसे हार में हीरा ....."

मैं धुन मे आके बोलता गया, बोलता गया।

उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव आये। उन्होने प्यार से मेरी पीठ थपथपाई और चुपचाप चले गए।

और मैं उस दिन से आज तक अपने भाषण का भावार्थ समझने की चेष्टा कर रहा हूँ।

8 टिप्पणियाँ:

PD said...

बहुत बढिया.. मजा आ गया पढ कर.. :D

Mired Mirage said...

वाह मजेदार ! यदि बड़ी उम्र के लोगों या कह लीजिये वृदध आपको इतने दार्शनिक लेखन के लिए उकसा सकते हैं तो एक आध भाषण हम भी दे देंगे आपको ।
घुघूती बासूती

Manish said...

अच्छा लगा आप लोगों के बीच ये वार्त्तालाप .

Tarun said...

bahut khoob vikas kya sashvat lekh likha hai ;)

Shiv Kumar Mishra said...

'अपने समय' को कमाल का लिखा है....

Vipin Kumar said...

dum toh hai tumhari baato mein ...par jaisa tumney kaha ki satya ardhsatya hota hai toh mein bhi maanta hu ki tumhara satya bhi ardhsatya hi hai ...yeh aavshyak nahi hai ki kranti ho tabhi aap ..." kaal " ke baarey mein likhengey kranti toh chal hi rahi bas pehchana nahi jaa raha hai aapse.

Anonymous said...

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आलोक कुमार said...

sahii lekh...main bhii kaal ko dhoondhne ka prayaas karoonga :)

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