परजानिया (२००५) : फिल्म इसे कहते हैं


बहुत सुना था इस फिल्म के बारे मे, मगर कभी देखने का सुअवसर प्राप्त ना हो सका था था। आज मौका मिलते ही ये फिल्म देख डाली। ऐसा लगा कि इतने दिनों से इसे ना देखकर मैंने अपने प्रति कोई अपराध किया हो।

गोधरा के दंगों पर बनी यह फिल्म, दर्शक को अन्दर तक हिला देती है और एक सामान्य दर्शक भी यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि ऐसी कौन सा भाव है जो मनुष्य को इतना गिरा देता है कि उसे पशु कहते भी लज्जा आ जाये।

एक मुस्लिम बस्ती पर हिन्दुओं के आक्रमण में एक पारसी लड़के 'परजान' का खो जाना, एक घटना हो सकती है पर फिल्म...! फिल्म इस घटना के पहले शुरू होकर इसके बाद भी बनी रहती है।

परजान का काल्पनिक शहर 'परजानिया' महज कल्पना नही, एक चुनौती लगती है। मैं सिनेमाई तकनीक के मामले मे शून्य हूँ। परन्तु एक उत्साही दर्शक की हैसियत से इतना कह सकता हूँ कि विश्व के किसी भी कोने मे बनी फिल्मों के बीच यह फिल्म सर उठाकर खडे होने की ताकत रखता है।

इसे मैं दर्शकों का दुर्भाग्य ही कहूंगा कि जहाँ 'सांवरिया' और 'welcome' जैसी फिल्में इतने दिनों तक सिनेमाघर की शोभा बढाता है वहीं परजानिया जैसी बेहतरीन फिल्में कब आती और चली जाती हैं - पता ही नहीं चलता।

5 टिप्पणियाँ

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Tarun said...

100% tum se sehmat hoon vikas, is desh me om shanti om jaisi films best film ki category ke liye nominate ho sakti hai. Lekin acchi filmo ki poch wahan bhi nahi hai.


400092 said...
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yunus said...

विकास ये जो तुमने 2008 में देखा वाला विजेट लगाया है ना ये बहुत ही सकडि़या देने वाला है । अभी साल शुरू हुआ नहीं । तुमने इत्‍ता सारा देख लिया ।


anitakumar said...

सौलह आने सच


विकास कुमार said...

अभी उतना वक़्त नहीं मिल पाता. बहुत व्यस्त चल रहा हूँ. नहीं तो मैं दिन में दो के रेट से देखने वालों में से हूँ. :)

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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