कालजयी कविता

ओ रे कवि!
आज तू मुझपे भी कविता लिख ले।

देख!
मेरी अंधी हो चुकी आंखों में
सपनों का अवशेष भी नही।
शायद अब ये दुनिया को
तेरी कविता की सुन्दरता दिखा सकेगी।

वर्षों के निराहार से जन्मी
यह कंकाल रुपी काया
तेरे काव्य को ढांचा दे सकती है।

बरसों से मेरी आवाज दबते दबते
इतनी दब चुकी है
कि अब तू इसे मुखर ध्वनि प्रदान कर
एक महान कवि बन सकता है।

ओ रे कवि!
देख आज मैं मृत्यु के कगार पे बैठी हूँ।
इससे अधिक ख़ुशी की बात और क्या होगी?

मेरी मौत की करुणा से जन्मा तेरा महाकाव्य
निःसंदेह तुम्हे अमर कर देगा।

आख़िर मैं भी तेरी कुछ हूँ।
अधिकारहीन भले सही,
परन्तु कृतघ्न नही कर्तव्य परायण हूँ।

और तेरे यश के लिए -
अपने शरीर का अंग अंग
लहू की एक एक बूँद
चेतना का हर एक अंश
सौपने को तैयार बैठी हूँ।

आ!
एक नहीं सौ बार घोंप मेरी पीठ मे छुरा।
जब तू कहेगा उफ्फ्फ़ करूंगी,
तुझे शब्द दूँगी।
और जब तू कहेगा मौन रहकर
तुम्हारा गुस्सा सह लूंगी।

चाहो तो सहस्त्र बार मेरी हत्या करना
या चुपके से कह देना
मैं स्वयम ही मौत का कफ़न लिए सो जाऊंगी।

जैसे आज सो रही हूँ।

ओ रे कवि!
रक्त के इन बूंदों की खुशबू महसूस कर
और आज तू मुझपे भी कविता लिख ले।

पुनः -
कोई कालजयी कविता।

10 टिप्पणियाँ

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Anonymous said...

achi hain, lekin badi hi dukhbhari hain..


tanha kavi said...

विकास भाई,
बड़ी हीं बेहतरीन रचना है। यूँ हीं लिखते रहें।

-विश्व दीपक 'तन्हा'


anitakumar said...

विकाश बहुत ही सुन्दर और गहरी बात कही है इस कविता के माध्यम से, सुन्दर अभिव्यक्ति और बहुत ही प्रौढ़ विचार, यार तुम ऐसा लिखोगे तो हमारी उम्र के लोग क्या करेगें


vandana said...

Vikash Ji
Great job.... Nice Poem


ALOK KUMAR said...

pata nahii kyun...mujhe bilkul bhii achchhi nahii lagii...shaayad hum abhii praudh nahii huye hain :p


rachana said...

कालजयी कविता किसी प्रयोजन या प्रयास के तहत नही लिखी जाती बल्कि वो परिस्थितिवश अनायास लिखी जाती है....


जोशिम said...

विकास, आपका दीवान बहुत बड़ा है इसलिए समय लगा - सारी कविताओं (हिन्दी) की उम्र आपसे बड़ी लगती है - प्रतिभा कमाल है - बहुत बहुत बहुत अच्छी लगानेवाली कवितों की अपनी फेहरिस्त में - "ना आया" , ईंट, "स्याह", "गुस्सा", "रे मच्छर", "तमाशा", "अनुत्तरित प्रश्न" "अरे रुको! ऊब गया ..." , "बुद्धिजीवी" रखूंगा - इतने बड़े संकलन को आपको छपवाना चाहिए - सस्नेह मनीष
[ p.s. - i still can't figure out how you find time to do this @ IITB - whatever, keep finding time -rgds)


विकास कुमार said...

मनीष जी! सबसे पहले तो हार्दिक आभार स्वीकारें कि आपने अपना इतना वक्त दिया. रही बात छपवाने की तो आजकल ब्लोग भी बड़ा सशक्त माध्यम है. फिर मेरे जैसे बालक की कवितायेंं खरीद कर तो कोई पढ़ेगा नहीं और इसलिये कोई प्रकाशक ऐसा जोखिम क्युँ ले?

रही बात वक्त की तो २४ घन्टे में आधे घंटे तो निकल ही जाते हैं लिखने के लिये. जहाँ तक विचारों का सवाल है - वे तो बेलगाम घोड़े हैं, कभी भी कहीं भी आ जाते है. :)

एक बार फिर ब्लोग पर आने के लिये धन्यवाद.

तन्हा जी! अनिता जी! आलोक! आप सब ही तो मुझे उत्साह देते हैं, सो एक बार फिर धन्यवाद!

रचना जी! और वंदना जी! स्नेह बनाये रखें. :)


आलोक कुमार said...

कालजयी के बाद लिखना बंद कर दिया आपने ...देखिये निराश लौट रहा हूँ आपके ब्लोग से :(


Kratee said...

shabdo ki kami hai mere shabhkosh me tareef karne k liye..bas aur kya keh sakti ho....

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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