अग्निपरीक्षा

राम गए वनवास तो सीता छाया बनकर साथ गयी
दुर्गम वन मे नंगे पांवों हाथों मे डाले हाथ गयी

उस सीता की पावन निष्ठा अग्नि से अब आंकों तुम
ओ न्यायी ओ रघुराई ज़रा अपने अन्दर झांको तुम

जिस अग्नि के फेरों से तुमने सीता को पाया है
उस अग्नि की ज्वाला मे सारा विश्वास जलाया है

धर्म की डींगे भरते हो, पत्नी संग मगर अधर्म करो
मर्यादा पुरुषोत्तम हो, अपने पौरुष पर शर्म करो

आग लगा दो सीता में, कर्म नही अपकर्म करो
मर्यादा पुरुषोत्तम हो, अपने पौरुष पर शर्म करो

सात जनम की पत्नी प्यारी पल मे हुई पराई
जय जय जय रघुराई, जय जय जय जय रघुराई.

संगीत प्रेमियों के लिए

मैंने कल घूमते घूमते एक ऐसी मजेदार वेबसाइट देखी, जिसे हर संगीत प्रेमी पसंद करेगा। वेबसाइट का पता है : http://www।itwofs.com/

यह वेबसाइट है संगीत की चोरी से संबंधित। (chronicles of plagiarism in indian film music)

किस संगीतकार ने किस भाषा के किस गाने से चुराकर या प्रेरित होकर कौन सा गाना बनाया है, इन सब का ब्योरा वहाँ देखा जा सकता है। गानों की क्लिप्पिंग भी सुनी जा सकती है। आर डी बर्मन से लेके अनु मलिक तक का जिक्र है। आपके पसंदीदा संगीतकार का नाम भी वहाँ हो सकता है। सावधान! हो सकता है कि आपका प्रिय गीत किसी की नक़ल हो। :)

एक बार जरूर जाईये।

कहानी, जो लिखी नही गयी

वो मुझसे रोज जिद करने लगी थी कि तुम मेरे बारे में एक कविता लिखो। जब भी जैसे भी थोडे वक्त के लिए मिलती - इसी बात को पकड़ के बैठ जाती थी। ऐसा नहीं था कि मैं उसे झूठा दिलासा दे कर टालना चाहता था। मेरी भी बहुत इच्छा थी कि उसके बारे मे कुछ लिखूं। परन्तु जैसे ही लिखने बैठता, दिमाग भक्क से हो जाता। मानो किसी ने ऊपर की बत्ती ही बुझा दी हो। शायद मैं उसके ना होने के अहसास तले दब जाता था। यह बात अजीब ना लगते हुए भी अजीब इसलिए थी क्यूंकि वो कभी भी मेरे पास थी ही नही।

उससे मिलना भी मेरे लिए एक इत्तेफाक था। और जिस वक्त मुझे पहली बार मिली, उस वक्त मुझे ऐसा बिल्कुल नही लगा था कि बात इस कदर आगे बढ़ जायेगी कि वो मुझसे एक कविता की माँग कर बैठेगी। अंदेशा होता तो शायद मैं उसके चरित्र मे कविता ढूँढने कि कोशिश भी करता। पर शायद यह ठीक ही था। क्यूंकि मेरी कोशिश उसे मुझसे दूर भगा देती। साधारण तरीके से मिलने का जो आनंद है, उसमे कृत्रिमता की बू आ जाती और मैं एक बहुत ही अलग किस्म की प्रजाति से मिलने से चूक जाता।

एक दिन मैं अपने कमरे के एकांत मे सन्नाटे पी रहा था। बाहर एक दोस्त बडे ही जोर जोर से बातें कर रहा था। अब एक लड़के के बात करने का अंदाज इतना तो बता ही देता है कि दूसरी ओर घर से पापा बोर कर रहे हैं या किसी महिला मित्र की दिलकश बातें सुनने को मिल रही हैं।

'क्या बे! बहुत मीठी मीठी बातें हो रही है।
'नहीं यार। एक फ्रेंड यहां आई हुई है। अब मेरे पास इतना वक्त तो है नही कि मैं उससे मिलता रहूँ। परीक्षाएं सर पर हैं।
'मेरे पास तो बहुत वक्त है। मुझे मिला दे।

मेरे मुख से निकली यह बात मेरे लिए इतनी बड़ी समस्या का कारण बन जायेगी, ये मैंने कभी नही सोचा था। उसने सचमुच मिलवा दिया। उसके दूरगामी परिणाम तो यह हुए कि मुझे जबरदस्ती मगजमारी करके एक कविता लिखनी पड़ रही है। परन्तु कविता कोई साधारण सी चीज तो है नही, जो यूं ही निकलने लगे। खासकर तब जब कि कविता किसी व्यक्ति विशेष की प्रशंसा मे लिखनी हो। वैसे उसने प्रशंसा का तो जिक्र भी नही किया परन्तु मैं तो मनुष्य हूँ ना! थोडी सी इंसानियत तो मुझमे है ही। और फिर वो इतनी बुरी भी नही थी।

वस्तुतः वो बहुत अच्छी थी। जब कविता लिखने के लिए मैंने अपने भेजे को खंगालना प्रारंभ किया तो उसके साथ बिताया हर पल धीरे धीरे आ गया। बिल्कुल शफ्फाक। मानों मैंने उस पर धूल ही नही जमने दी हो कभी। जैसे एक दर्पण पर रोज पानी फिरा दो। रात भर बैठ के गाने गाना, अँधेरे मे पागलो की तरह घूमना, चाँदनी रात में पार्क मे बैठ के शराब की बोतल खाली करना, सड़कों पे इस तेजी से चिल्लाना की अगल बगल के लोग देखने लगें और थक जाने पर आहिस्ते से सो जाना, जैसे तूफ़ान अभी अभी थोडी देर के लिए शांत हुआ हो - सब कुछ कितना अद्भुत था, कितना अनोखा, कितना सुन्दर, कितना प्रिय। सचमुच वो बहुत अच्छी थी।

'डीड यू रोट माई पोएम?
'नो बाबा! आई ऍम स्टिल वर्किंग ऑन इट।
'डू इट फास्ट ना। आई वांट टु रीड इट ए.एस.ए.पी।
'पगली। थोडा तो वक्त दो। अब कविता लिखने के अलावा बहुत काम हैं जीवन मे। मैं व्यस्त हूँ।

लेकिन चाहे जितना भी कह लूं मैं जानता था कि मेरे पास वक्त की कोई कमी नही है। और उसके बारे मे लिखने के लिए तो बिल्कुल नही। शायद मैं लिखना ही नही चाहता था। वो इतनी अच्छी जो थी।

ईमानदारी आसान है। लेकिन जब सच को मुखौटे पहनाने हों, तो वक्त तो लगता ही है। अब दिल मे तो बहुत सारी बातें हैं जो मैंने उससे कभी कही नहीं। गलती से वो सब कुछ कविता मे झलक गया तो? मैंने कोशिश तो बहुत कि मुझे उसकी बुराइयाँ भी दिखें। लेकिन मानो मेरे अन्दर कोई दुश्मन बैठ के मुझे पट्टी पढा रहा था। उसका शराब पीना मुझे बुरा नही लगता था। एक दो मौक़े ऐसे भी आये जब वक्त दे के वो मुझसे नही मिली, मुझे बिल्कुल नही अखडा। एक बार तो वो अपने घर से भाग के सीधे यहां तक आ पहुंची, और मुझे ये उसकी खूबी लगी। उस दिन तो हम रेस्टोरेंट मे लंच करने भी गए।

लोग कहते हैं कि जब किसी की बुराइयाँ भी अच्छाईयां लगने लगे तो समझो की तुम्हे...!

'नही नही! ऐसा नही हो सकता।
'पर मेरे दोस्त तुम खुद ही तो कह रहे हो कि तुम्हे उसकी सारी बातें अच्छी लगती हैं।
'हाँ! लेकिन वो मुझे अच्छी कैसे लग सकती है?
'तुम पगला गए हो? जब उसकी सारी बातें अच्छी लगती हैं तो वो तो अच्छी लगेगी ही ना?
'क्या ये जरूरी है?
'तुम सचमुच पागल हो गए हो। मतलब साफ है! लोग प्यार मे पागल हो ही जाते हैं।
'अरे यार! कुल जमा १०-१२ घंटे का वक्त हमने साथ गुजरा होगा। और तुम कहते हो कि....!

शायद वो सच कह रहा था. उन १०-१२ घंटों का असर इस कदर हो गया था कि मैं उसपे एक कविता लिखते डरने लगा था। जो बात इतने दिनों तक खुद से भी छिपाई, कहीं उसे पता चल गयी तो? वो तो शायद किसी और को पसंद करती है। अगर मैंने कुछ गड़बड़ की तो जो थोडी बहुत दोस्ती है, वो भी समाप्त हो जायेगी; जिसे मैं खोना नही चाहता था।

'शायद' नही, वो सचमुच सच कह रहा था। मैं १०-१२ घंटे की मित्रता नही खोना चाहता। पिछले २२ वर्षों मे इतने मित्र बनाए और खोये हैं जिनका कोई हिसाब नही। और इस एक को खोने का भय...! वो सच कह रहा था। मुझे बहुत सोच समझ कर उसकी कविता लिखनी होगी। या फिर कहानी लिख देता हूँ। कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।

'तुम पर मैं कविता लिख पाऊँ, इतनी प्रतिभा नही है मुझमे।
'वाह! क्या ये कविता का शीर्षक है?
'नही बाबा! मैं सोच रहा था कि मैं एक कहानी लिख दूं तुम्हारे बारे मे।
'कहानी? इट्स बेटर। गूड! डू दैट।
'ओके! जस्ट गिव मी सम मोर टाइम.
’आई वान्ट माई स्टोरी पुट अप. प्लीज! ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट.
'आई विल राइट मेनी थिंग्स. बट, आई वोन्ट मेन्शन योर नेम देयर.
’फ़ाइन. पीपल विल टीज यू. आई कैन अन्डरस्टैन्ड.

जब खुद के अन्दर ही युद्ध मचा हो तो लोगों की हँसी कहाँ सुनाई देगी?

कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।
ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट
कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।
ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट
ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट

सोच रहा हूँ कि उसे कहानी ना लिख पाने की क्या वजह बताऊँगा? 'नो बेबी। आई कांट डू जस्टिस टू इट'.

सोने की कोशिश में रेडियो बजा देता हूँ. ’....तस्वीर बनाये क्या कोई, क्या कोई लिखे तुझपे कविता....!

शीर्षक-हीन कहानी

वो वहाँ बैठी थी। वह भी वहीं बैठा था। एक अरसा हो गया था उसे देखे। अजीब सी बात है कि आज भी उसे देखने के बाद उसका दिल ठीक उसी तेजी के साथ धड़कने लगता है जैसा कि पहली बार धड़का था। वह उसे देख रहा था। और वो बेखबर अपनी किताब मे गुम थी मानो उसके लिए वह अदृश्य था।



पर कहानी की शुरुआत मे ऐसा नही था। यह कहानी की शुरुआत नही थी। यह तो कहानी की समाप्ति के बाद का अवशेष था। प्रारंभ मे उन दोनो के बीच के उत्साह को देखकर लोग दंग रह जाते थे। सामान्यतया नए रिश्तों के साथ साथ डर का एक हिस्सा तो बुन ही जाता है। लेकिन ये दोनो निर्भीक थे। ऐसा लगता था जैसे ये प्रारब्ध को चुनौती देने ही आये हैं। अज्ञान अभिमानी बना देता है। वो दोनों भी अभिमानी थे।


उस वक़्त से आज के बीच एक ऐसा भी दिन आया जब एक दुसरे के रास्ते में दूसरा बोझ लगने लगा। वो स्वीकार कर चुकी थी। वो स्वीकार नही कर सका। इसने उसकी स्वीकृति भी अस्वीकृत कर दी। मिठास, खटास मे तब्दील हो गया था।

'तुम इतना खट्टा कैसे खाते हो?
'बिना नींबू खाने मे वो मजा नही आता।
'एक दिन ये खटास तुम्हारे दिमाग पर चढ़ जायेगी।

इस भविष्यवाणी का एक हिस्सा गलत था, एक सही। खटास चढी, रिश्ते पर।

'सर टूटने से तो खून गिरता है ना?
'क्यों क्या तुम्हारा सर कभी नही टूटा?
'अब तक तो नही।
'इधर आओ मैं तोड़ देता हूँ।
'ऐसा? हिम्मत है इतनी तुममे?
'हिम्मत तो है लेकिन तुम्हारे सर मे कहीं सर नही दिख रहा।
'मजाक छोडो। सचमुच मेरा सर तोड़ पाओगे...?।

वो सर भी नही तोड़ पाया, वो दिल तोड़कर चली गयी।

'अगर हम लोग कभी अलग हों, तो मित्रवत व्यवहार करेंगे। ओ.के?
'नही जी! हम अलग ही नही होंगे।
'ऐसा नही होता। कुछ भी असंभव नही।
'तुम पागलपन वाली बातें मत करो। ऐसी बातें क्यों करते हो?
'क्यूंकि कुछ भी असंभव नही।
'लेकिन ये असंभव है।

सच कहा गया है कि मनुष्य हर असम्भव को संभव कर सकता है। वो सोच रहा है कि उसकी किताब मे ऐसा ही कुछ लिखा होगा। जाने कौन सी किताब है जिसमे वो इतना डूबी है। उसने देखने कि कोशिश की। निगाह किताब पर ढलकते ढलकते उसके चेहरे पर ही चिपक गयी। चुम्बकत्व तो अब भी शेष है।

उसे अहसास हुआ की उसकी उपस्थिति ही उसके पुस्तक प्रेम का कारण है। सो वह चुपचाप उठा और हवा खाने बाहर निकल गया। थोडी देर बाद जब वापस आया तो उसे उसकी हँसी दिखाई दी। अभी भी कितनी दिलकश है? पर उसके आते ही पुस्तक के पन्नों ने खींच कर हँसी को एक झन्नाटेदार थप्पड़ मारा। उसके आगमन का असर इसके चेहरे पर था।

'रिश्ते टूटने पर आवाज नही करते ना?
'करते तो हैं। बस सुनाई नही देता।
'नही नही। मेरे विचार से अगर आवाज करते हैं तो सुनाई भी देते होंगे।
'हो सकता है। लेकिन हम सुन के भी अनसुना कर देते हैं।

वो सोच रहा था कि क्या वो आजीवन अनसुना करती रहेगी। वो चुपचाप 1 घंटे तक एक ही पन्ना पढ़ती रही। फिर उठी और आहिस्ते से चल दी। कमरा अब भरा भरा सा था। बहुत सारे लोग दिख रहे थे। कहानी शीर्षक-हीन छूट गयी।

गुलजार के कुछ गीत

आज कुछ गाने सुन रहा था तो सोचा कि इनमें से कुछ पोस्ट की जायें. ये गाने सबने सुने ही होंगा. पहला गाना है माचिस फ़िल्म का. गाने के बोल हैं : छोड़ आये हम...वो गलियाँ.



दूसरा गीत है १९८६ मे बनी फ़िल्म इजाजत का. ’मेरा कुछ सामान लौटा दो.’ इस गाने के पहले गुलजार की आवाज में कुछ पंक्तियाँ भी हैं.



गुलजार की आवाज से याद आया कि उनके कई गानों के पहले उनकी आवाज है. ’फ़ुरसत के रात दिन’ नाम के अलबम में १९८२ के फ़िल्म ’मासूम’ का यह गाना देखिये. ’तुझसे नाराज नहीं.."



गाने तो बहुत है. मगर अभी बस इतना ही. अधिक गानॊंं के लिये युनूस जी, मनीष जी या विमल जी के ब्लोग पर जाया जा सकता है.

बन गए हम भी नौकर

IIT में प्लेसमेंट के नौवें दिन मेरी भी नौकरी लग गयी. काम बिल्कुल मेरे मन का. वेब की प्रोग्रामिंग संबंधित. कम्पनी ये रही: http://webaroo.com

रहूँगा
भी मुम्बई में ही। लगता है कि अब ब्लोगिंग वाली आदत और खराब होने वाली है। अभी कुछ सूझ नहीं रहा है लिखने के लिये, सो बाकी बातें बाद में.

डिल्बर्ट में IIT

१.

२.

३.

४.

५.


६.

धर्मवीर भारती की एक कविता

आजकल मेरी हालत थोडी अजीब सी है। मेरे पास छोटे छोटे टुकडों मे बहुत वक़्त है लेकिन एक साथ इतना वक्त नही कि कोई महत्वपूर्ण काम कर सकूं। इसलिए कभी कवितायें पढता हूँ, कभी ब्लोग, कभी कुछ रेकॉर्ड करता हूँ, तो कभी कुछ पोस्ट। इसी तरह फुरसत मे वक्त गुजारते हुए धर्मवीर भारती की यह कविता, जो कि मुझे बहुत प्रिय है, रेकॉर्ड कर ली।

थोडा सुनकर देखा जाये।


...क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
...क्योंकि सपना है अभी भी!


तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जब कि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा?)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
....क्योंकि सपना है अभी भी!


तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
वह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो


और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर तड़प कर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है - दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी


इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धुमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
... क्योंकि सपना है अभी भी!

चिर सुख

यह कविता मैंने दसवी कक्षा में लिखी थी.

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

आरती उतारूँ पत्थर की, मुल्ले सी बांग लगाऊं मैं
करूं प्रार्थना जीसस से पर सुख को ढूंढ ना पाऊँ मैं.
मंदिर मस्जिद और गिरजे मे जा जा कर तो हार चुका
वर्षों से तो ढूँढता आया, कब तक ढूँढता जाऊं मैं?

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

उलझन के इस विषम जाल से, चाहूँ पर बच नही पाऊँ मैं
सुलझाने में इस उलझन को, उलझ-उलझ खुद जाऊं मैं.
कहाँ मिले सुख? कहाँ मिले ? भटकूँ इस संसार में
बड़ा प्रश्न है, छोटी दुनिया, उत्तर कहाँ से लाऊं मैं?

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

दुःख का फैला भवसागर है, उस तट कैसे जाऊं मैं?
डूब मरूँ सागर मे या फिर तरणी कहीं से लाऊं मैं.
सभी लोग तो डूबे ही हैं, सभी ढूंढते तरणी को ही
इन सब दुखियों से ही कैसे अपना दुखडा गाऊँ मैं?

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

दुःख की अग्नि शांत हो ऐसी युक्ति कौन लगाऊं मैं?
या मूक हो औरों जैसा दुःख मे तिल-तिल जलाता जाऊं मैं?
्निःसहाय सा अपने हाथों कर दूं खुद को चिता हवाले?
या की अपने पुरुषार्थ से दुःख की चिता जलाऊँ मैं?

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

मेरा फ़ेवरेटेस्ट फोटू


कल समीर जी के आने पर जो मीटिंग हुई, उसमें प्रमोद जी बड़ी देर तक अपना कैमरा लेके कुछ अजीबो-गरीब हरकतें करते रहे. आधे घंटे बाद जब प्रमोद जी कैमरा-सेटिंग से निकले तो अनीता जी ने उन्हें एक अच्छे फोटोग्राफर होने का खिताब दे दिया. मुझे लग रहा था कि जैसे संगीत वाले ५ मिनट बजाने के पह्ले दो घंटे नाटक करते हैं, ट्युनिंग की - प्रमोद जी वैसा ही कुछ कर रहे हैं. लेकिन तस्वीरें देख के दिल गद्गद हो गया. :)

संगीत की चोरी का एक नमूना

मुझे 'क्या कहना' फिल्म का टाइटल गीत बहुत पसंद था। आज एक अंग्रेजी गाने को सुनते वक़्त झटका लगा। कारण तो आप गाने का प्रारंभ सुन के ही समझ जायेंगे।

1959 में आए ’नेइल सेदाका’ के इस गाने का टाइटल है ’ओह कैरोल’!

गेस्ताल्ट'स प्रेयर

Gestalt's prayer के नाम से विख्यात ५६ शब्दों का एक वाक्य मुझे पसंद आया। मैंने कोशिश की है कि उसका अनुवाद कर सकूं। परन्तु मुझे नहीं लगता कि मैं शब्दों एवं भावनाओं के साथ न्याय कर पाने की क्षमता रखता हूँ। सो, कोशिश की है और साथ ही साथ मूल शब्द भी दिए हैं।

मैं अपना कर्म करता हूँ और तुम अपना
मैं विश्व में तुम्हारी उम्मीदों पर खरा उतरने नहीं आया
और ना ही तुम मेरी उम्मीदें पूरी करने आये हो
तुम 'तुम' हो, और मैं 'मैं'
यदि संयोग से हम एक दुसरे को ढूंढ लें - सुन्दर
ना ढूंढ पाए - नियति।

मूल शब्द :
I do my thing and you do your thing.
I am not in this world to live up to your expectations,
And you are not in this world to live up to mine.
You are you, and I am I, and if by chance we find each other, it's beautiful.
If not, it can't be helped.

प्रार्थना

हे प्रभु!
मैं नहीं कहता कि मुझे असफलता मत देना।

परन्तु कभी भी
कीमत के रुप में
विश्वास, धैर्य और हिम्मत मत ले लेना।

हो सकता है
मैं घबराकर आंसू के अर्घ्य चधाऊँ।
हो सकता है
मैं भूल से तुम्हारा नाम भूल जाऊं।

आहिस्ते से कभी -
दूर से ही सही, रौशनी की एक झलक दिखाना।
विश्वास के दीप में
धैर्य का ईंधन जला सकूं,
इतनी हिम्मत बचाना।

प्रेम किया था तब कब सोचा....?



मेरी आवाज में सुनने के लिए प्लेयर पर क्लिक करें


प्रेम किया था तब कब सोचा, यूँ मुझको दुत्कार मिलेगी?
ये चाहा था प्यार मिलेगा, कब सोचा इनकार मिलेगी.

पर आशा का दीप बुझ गया, सुन कर तेरी बातें प्रीतम
अब रातों में, उन बातों की, निर्मम सी झंकार मिलेगी.

कभी कभी बिस्तर के ऊपर, अरमानों का खून दिखेगा
और कभी तकिये के नीचे, आँसू की बौछार मिलेगी.

जरा संभल के चलना साथी, दिल के टुकड़े चुभ ना जायें
और ना काटें - धूल में जो, दिलकश बातें दो चार मिलेंगी.

बस खुशी तेरी माँगूं, चाहूँ हर ओर सफलता तुझे मिले
मैं तो अपना सर रख दूँ जिस राह तुझे जयकार मिलेगी

मनुष्य हूँ

हाँ! मैं प्रेम करता हूँ - मनुष्य हूँ।
हाँ! मैं उम्मीदें रखता हूँ - मनुष्य हूँ।
हाँ! मैं गलतियाँ करता हूँ - मनुष्य हूँ।

नही! मेरा प्रेम अनश्वर नहीं - मनुष्य हूँ।
नही! मेरी हर उम्मीद पूरी नही होती - मनुष्य हूँ।
नहीं! फिर भी मैं नही रुकता - मनुष्य हूँ।

  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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