वो मुझसे रोज जिद करने लगी थी कि तुम मेरे बारे में एक कविता लिखो। जब भी जैसे भी थोडे वक्त के लिए मिलती - इसी बात को पकड़ के बैठ जाती थी। ऐसा नहीं था कि मैं उसे झूठा दिलासा दे कर टालना चाहता था। मेरी भी बहुत इच्छा थी कि उसके बारे मे कुछ लिखूं। परन्तु जैसे ही लिखने बैठता, दिमाग भक्क से हो जाता। मानो किसी ने ऊपर की बत्ती ही बुझा दी हो। शायद मैं उसके ना होने के अहसास तले दब जाता था। यह बात अजीब ना लगते हुए भी अजीब इसलिए थी क्यूंकि वो कभी भी मेरे पास थी ही नही।
उससे मिलना भी मेरे लिए एक इत्तेफाक था। और जिस वक्त मुझे पहली बार मिली, उस वक्त मुझे ऐसा बिल्कुल नही लगा था कि बात इस कदर आगे बढ़ जायेगी कि वो मुझसे एक कविता की माँग कर बैठेगी। अंदेशा होता तो शायद मैं उसके चरित्र मे कविता ढूँढने कि कोशिश भी करता। पर शायद यह ठीक ही था। क्यूंकि मेरी कोशिश उसे मुझसे दूर भगा देती। साधारण तरीके से मिलने का जो आनंद है, उसमे कृत्रिमता की बू आ जाती और मैं एक बहुत ही अलग किस्म की प्रजाति से मिलने से चूक जाता।
एक दिन मैं अपने कमरे के एकांत मे सन्नाटे पी रहा था। बाहर एक दोस्त बडे ही जोर जोर से बातें कर रहा था। अब एक लड़के के बात करने का अंदाज इतना तो बता ही देता है कि दूसरी ओर घर से पापा बोर कर रहे हैं या किसी महिला मित्र की दिलकश बातें सुनने को मिल रही हैं।
'क्या बे! बहुत मीठी मीठी बातें हो रही है।
'नहीं यार। एक फ्रेंड यहां आई हुई है। अब मेरे पास इतना वक्त तो है नही कि मैं उससे मिलता रहूँ। परीक्षाएं सर पर हैं।
'मेरे पास तो बहुत वक्त है। मुझे मिला दे।
मेरे मुख से निकली यह बात मेरे लिए इतनी बड़ी समस्या का कारण बन जायेगी, ये मैंने कभी नही सोचा था। उसने सचमुच मिलवा दिया। उसके दूरगामी परिणाम तो यह हुए कि मुझे जबरदस्ती मगजमारी करके एक कविता लिखनी पड़ रही है। परन्तु कविता कोई साधारण सी चीज तो है नही, जो यूं ही निकलने लगे। खासकर तब जब कि कविता किसी व्यक्ति विशेष की प्रशंसा मे लिखनी हो। वैसे उसने प्रशंसा का तो जिक्र भी नही किया परन्तु मैं तो मनुष्य हूँ ना! थोडी सी इंसानियत तो मुझमे है ही। और फिर वो इतनी बुरी भी नही थी।
वस्तुतः वो बहुत अच्छी थी। जब कविता लिखने के लिए मैंने अपने भेजे को खंगालना प्रारंभ किया तो उसके साथ बिताया हर पल धीरे धीरे आ गया। बिल्कुल शफ्फाक। मानों मैंने उस पर धूल ही नही जमने दी हो कभी। जैसे एक दर्पण पर रोज पानी फिरा दो। रात भर बैठ के गाने गाना, अँधेरे मे पागलो की तरह घूमना, चाँदनी रात में पार्क मे बैठ के शराब की बोतल खाली करना, सड़कों पे इस तेजी से चिल्लाना की अगल बगल के लोग देखने लगें और थक जाने पर आहिस्ते से सो जाना, जैसे तूफ़ान अभी अभी थोडी देर के लिए शांत हुआ हो - सब कुछ कितना अद्भुत था, कितना अनोखा, कितना सुन्दर, कितना प्रिय। सचमुच वो बहुत अच्छी थी।
'डीड यू रोट माई पोएम?
'नो बाबा! आई ऍम स्टिल वर्किंग ऑन इट।
'डू इट फास्ट ना। आई वांट टु रीड इट ए.एस.ए.पी।
'पगली। थोडा तो वक्त दो। अब कविता लिखने के अलावा बहुत काम हैं जीवन मे। मैं व्यस्त हूँ।
लेकिन चाहे जितना भी कह लूं मैं जानता था कि मेरे पास वक्त की कोई कमी नही है। और उसके बारे मे लिखने के लिए तो बिल्कुल नही। शायद मैं लिखना ही नही चाहता था। वो इतनी अच्छी जो थी।
ईमानदारी आसान है। लेकिन जब सच को मुखौटे पहनाने हों, तो वक्त तो लगता ही है। अब दिल मे तो बहुत सारी बातें हैं जो मैंने उससे कभी कही नहीं। गलती से वो सब कुछ कविता मे झलक गया तो? मैंने कोशिश तो बहुत कि मुझे उसकी बुराइयाँ भी दिखें। लेकिन मानो मेरे अन्दर कोई दुश्मन बैठ के मुझे पट्टी पढा रहा था। उसका शराब पीना मुझे बुरा नही लगता था। एक दो मौक़े ऐसे भी आये जब वक्त दे के वो मुझसे नही मिली, मुझे बिल्कुल नही अखडा। एक बार तो वो अपने घर से भाग के सीधे यहां तक आ पहुंची, और मुझे ये उसकी खूबी लगी। उस दिन तो हम रेस्टोरेंट मे लंच करने भी गए।
लोग कहते हैं कि जब किसी की बुराइयाँ भी अच्छाईयां लगने लगे तो समझो की तुम्हे...!
'नही नही! ऐसा नही हो सकता।
'पर मेरे दोस्त तुम खुद ही तो कह रहे हो कि तुम्हे उसकी सारी बातें अच्छी लगती हैं।
'हाँ! लेकिन वो मुझे अच्छी कैसे लग सकती है?
'तुम पगला गए हो? जब उसकी सारी बातें अच्छी लगती हैं तो वो तो अच्छी लगेगी ही ना?
'क्या ये जरूरी है?
'तुम सचमुच पागल हो गए हो। मतलब साफ है! लोग प्यार मे पागल हो ही जाते हैं।
'अरे यार! कुल जमा १०-१२ घंटे का वक्त हमने साथ गुजरा होगा। और तुम कहते हो कि....!
शायद वो सच कह रहा था. उन १०-१२ घंटों का असर इस कदर हो गया था कि मैं उसपे एक कविता लिखते डरने लगा था। जो बात इतने दिनों तक खुद से भी छिपाई, कहीं उसे पता चल गयी तो? वो तो शायद किसी और को पसंद करती है। अगर मैंने कुछ गड़बड़ की तो जो थोडी बहुत दोस्ती है, वो भी समाप्त हो जायेगी; जिसे मैं खोना नही चाहता था।
'शायद' नही, वो सचमुच सच कह रहा था। मैं १०-१२ घंटे की मित्रता नही खोना चाहता। पिछले २२ वर्षों मे इतने मित्र बनाए और खोये हैं जिनका कोई हिसाब नही। और इस एक को खोने का भय...! वो सच कह रहा था। मुझे बहुत सोच समझ कर उसकी कविता लिखनी होगी। या फिर कहानी लिख देता हूँ। कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।
'तुम पर मैं कविता लिख पाऊँ, इतनी प्रतिभा नही है मुझमे।
'वाह! क्या ये कविता का शीर्षक है?
'नही बाबा! मैं सोच रहा था कि मैं एक कहानी लिख दूं तुम्हारे बारे मे।
'कहानी? इट्स बेटर। गूड! डू दैट।
'ओके! जस्ट गिव मी सम मोर टाइम.
’आई वान्ट माई स्टोरी पुट अप. प्लीज! ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट.
'आई विल राइट मेनी थिंग्स. बट, आई वोन्ट मेन्शन योर नेम देयर.
’फ़ाइन. पीपल विल टीज यू. आई कैन अन्डरस्टैन्ड.
जब खुद के अन्दर ही युद्ध मचा हो तो लोगों की हँसी कहाँ सुनाई देगी?
कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।
ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट
कहानी मे खुद को छुपाना अपेक्षाकृत सरल होगा।
ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट
ओनली यू कैन डू जस्टिस टू इट
सोच रहा हूँ कि उसे कहानी ना लिख पाने की क्या वजह बताऊँगा? 'नो बेबी। आई कांट डू जस्टिस टू इट'.
सोने की कोशिश में रेडियो बजा देता हूँ. ’....तस्वीर बनाये क्या कोई, क्या कोई लिखे तुझपे कविता....!