29 November, 2007

हाल फिलहाल की कुछ देशी फिल्में

लागा चुनरी में दाग: कुछ लोग ये कह रहे थे कि फ़िल्म में कुछ भी नया नहीं है. और सब कुछ बिल्कुल प्रत्याशित है. बात शायद सही भी है. लेकिन आजकल जितनी भी देशज फ़िल्में हैं, उनकी तुलना में तो यह दर्शनीय है ही. रानी मुखर्जी और कोंकणा सेन अच्छी अदाकारी तो करती ही हैं. सारे अभिनेता मंजे हुए थे. हेमामालिनी को देखना सुखद था. :). इस फ़िल्म का एक गीत क्लिष्ट हिन्दी शब्दों से भरा पड़ा है, लगता है जैसे कविता सुन रहा हूँ. हिन्दी से जुड़े होने के कारण यह गीत मुझे पसंद आया.

सांवरिया:
हर बंसाली-फिल्म की तरह इस फ़िल्म में भी सेट तो काफ़ी सुन्दर बनाया है. लेकिन सिर्फ़ सेट से फ़िल्म नहीं चलती. कुछ गाने भी अच्छे हैं. नये चेहरे वला अभिनेता को भी मैं बुरा नहीं कहूँगा. लेकिन फ़िल्म में कुछ मजा नहीं आया. बोर बहुत हुआ. कसावट की कमी कह सकते हैं. यद्यपि मैं बंसाली का प्रशंसक हूँ तथापि मैं किसी को भी यह फ़िल्म देखने की सलाह नहीं दूँगा. बंसाली एकलौते ऐसे निर्देशक हैं जो 'अपनी' फ़िल्म बनाते हैं. परंतु उनकी कल्पना हर किसी को पसंद आये, ये हमेशा तो हो नहीं सकता ना?

ओम शांति ओम:
ये फ़िल्म नहीं है, एक स्पूफ़ है. स्पूफ़ की तरह देखिये, मजा आएगा. दोस्तों के संग मजाक उड़ाने के लिये सबसे अच्छी है. फिल्म की तरह देखिये - बकवास.

जब वी मेट: हाल फ़िलहाल की सारी फ़िल्मों में यही एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें कुछ बात है. रोमांटिक सी फ़िल्म. गर्लफ़्रेंड के साथ देखना काफ़ी फ़ायदेमंद हो सकता है. :) करीना के चुलबुले अभिनय की प्रशंसा करनी होगी. वो सारे लोग जिन्हें करीना अच्छी नहीं लगती थी - उनके लिये यह फ़िल्म एक शॉक हो सकती है. अपने नाम में जुड़े 'कपूर' की इज्जत रख ली है करीना ने.

भूल भूलैया:
अक्षय सदा की तरह ठीक ठाक हैं. थ्रिलर के नाम पर एकलौती फ़िल्म आयी है. सो, देख लिया. टाइम बहुत है तो देखी जा सकती है. (किसी तरह की महानता की उम्मीद निरर्थक ही होगी)

दिल दोस्ती ETC:
मुझे नहीं पता कैसी लगी. सच में. बस इतना पता है कि देखते वक्त बुरी नहीं लगी और ऐसा तो बिल्कुल नहीं लगा कि वक्त बर्बाद किया. क्या अच्छा था? नहीं पता. क्या बुरा? ये भी नहीं पता.

28 November, 2007

प्रयास: क, निष्ठा: क, सफलता: ?

मेरे विद्यालय में जो स्कोर कार्ड मिलता था उसपे हर विषय के आगे तीन कॉलम होते थे। प्रयास, निष्ठा और सफलता। और इन तीनों में हमें क से घ तक का ग्रेड दिया जाता था। कोई कोई प्रयास घ होने पर भी सफलता में क पाता था और कोई सफलता और निष्ठा दोनो मे क के बावजूद सफलता मे घ पाता था।

मेरे नेतरहाट विद्यालय की अनेकानेक खूबियों मे से एक खूबी यह भी थी कि केवल परीक्षा के अंक (सफलता कॉलम) ही मत्वपूर्ण नही थे वरन शिक्षक एवं विषय के प्रति निष्ठा और प्रयास भी अनिवार्य एवं स्तुत्य थे।

वस्तुतः मैं बात किसी और चीज की करना चाहता था और दिमाग मे ये सारी चीजें आ गयी। अब मूल विषय पर आता हूँ। कल मुझे बहुत बडे बडे ब्लोगरों से मिलाने का सौभाग्य मिला। (विस्तृत रिपोर्ट बाद मे)। उन लोगों ने मुझे प्रेरणा दी कि मैं अपने तकनीकी ज्ञान का उपयोग लोगों (खासकर ब्लोगरों) की समस्याओं का समाधान निकालने मे करूं। अब मुझमे इतना ज्ञान है या नही, यह बात दीगर है - पर बात मुझे रास आई। सो, ऐसी कोशिश करने की आकांक्षा जाग गयी।

पर मेरे मन मे एक डर पैर पसार रहा था कि ना जाने मैं इस पुनीत कार्य के प्रति कितना न्याय बरत पाऊँगा, कितना समर्पित रह पाऊँगा। (वैसे ही भाँती भाँती के मेरे कई ब्लोग निष्क्रिय हैं)। फिर मेरे दिमाग मे मेरे स्कूल वाली बात याद आई। (आह! पुरानी बातें कितनी प्रेरणादायक होती हैं)

अब सफलता के आगे भले ही प्रश्न चिन्ह लगा रहे, लेकिन प्रयास और निष्ठा - इन दो कॉलमों पर तो अपना अधिकार है ही। सो भगवान् का नाम लेके कार्य कि शुरुआत कर दी है।

आप भी पधारें। लिंक यह रहा:


अपनी समस्या मुझे इस लिंक द्वारा भेज सकते हैं: (ब्लोग की पहली पोस्ट) http://blogbuddhi.blogspot.com/2007/11/blog-post_28.html

मैंने साज सज्जा पर बिल्कुल भी ध्यान नही दिया है। टेम्पलेट बिल्कुल सादा है क्यूंकि उपयोगी चीजों में सादगी का होना अनिवार्य समझता हूँ.

अंग्रेजी का एक गाना

कल मेरी बात मनीष जी से हो रही थी। उन्होने कहा कि किसी को अंग्रेजी के भी कुछ अच्छे गानों का ब्लोग करना चाहिऐ। अब ना तो मुझे अंग्रेजी की कुछ ज्यादा समझ है और ना ही संगीत की। फिर भी गाने तो हर कोई सुनता है, मैं भी सुनता हूँ। सो, जो पाश्चात्य संगीत मुझे कर्णप्रिय लगता है, मैं उसे पोस्ट करने की एक कोशिश करना चाहता हूँ। इसी कड़ी मे प्रस्तुत है यह गीत -"Mad world"।



गाने के बोल कुछ ऐसे हैं:
All around me are familiar faces
Worn out places, worn out faces
Bright and early for their daily races
Going nowhere, going nowhere
Their tears are filling up their glasses
No expression, no expression
Hide my head I want to drown my sorrow
No tomorrow, no tomorrow
And I find it kind of funny
I find it kind of sad
The dreams in which I'm dying
Are the best I've ever had
I find it hard to tell you
I find it hard to take
When people run in circles
It's a very, very
Mad World
Mad world


Children waiting for the day they feel good
Happy Birthday, Happy Birthday
And I feel the way that every child should
Sit and listen, sit and listen
Went to school and I was very nervous
No one knew me, no one knew me
Hello teacher tell me what's my lesson
Look right through me, look right through me
And I find it kind of funny
I find it kind of sad
The dreams in which I'm dying
Are the best I've ever had
I find it hard to tell you
I find it hard to take
When people run in circles
It's a very, very
Mad World
Mad World
Enlarging your world
Mad World.

27 November, 2007

पता है......!

पता है,
कभी कभी इच्छा होती है
कि तुम्हें अनगिनत गालियाँ दूँ.
श्राप देने की ताकत होती
तो शायद अब तक तुम्हें जला चुका होता.

ना चाहते हुए भी
तुम्हारा नाम हर जगह ढूँढ़ लेना
मेरी - एक ऐसी खासियत है
जिसकी सजा सैकड़ो बार पाता हूँ.
और कभी कभी इच्छा होती है
कि कम से कम एक बार
तुम्हें वही दर्द दे सकूँ.

पता है,
तुम्हारी दुनिया अलग बसते देख
मेरी दुनिया ने मुझसे विद्रोह कर दिया है.
मेरे अंदर बम फोड़े जाते हैं
नारों की आवाज - डराती हैं
धरना और घेराव तो रोज का हिस्सा बन गयी हैं.
सो, कभी कभी लगता है
कि उस दुर्गम नगर में
यादों को अकेला कैसे रहने दूँ?
क्रोध में सोचता हूँ
कि तुम्हें भी
किसी ऐसी ही जगह का भाग बना दूँ.

पता है,
लोग कहते हैं
कि क्रोध उसी पर आता है जिससे प्रेम होता है.
तो क्या मेरा खुद से झूठ बोलना
तुम्हारी तस्वीरों को दफ़न करना
यादों को जलाना -
सब बेकार चला गया?

मुझे अब तक तुम पर इतना क्रोध क्युँ आता है?

21 November, 2007

हम भी देखेंगे तमाशा, गर मिली फुरसत

कभी करता हूँ तुमको याद, अश्कों के बूँदों से
कभी शबनम से वो हिस्सा साफ कर देता.
तेरी मुहब्बत के फ़साने, ना आते जो मुझ तक
इस जनम में ही मैं तुझको माफ कर देता.

सुनता हूँ अब हर ओर तेरी रुसवाई के चरचे
जुल्फ़ों का जिक्र, सूरत-ए-आशनाई के चरचे
दिल तोड़कर सौपा है अपना दिल जिसे तुमने
होते हैं हर ओर उसकी बे-वफ़ाई के चरचे

जाने होगा क्या अब ये अंजाम-ए-मुहब्बत
दो बेवफ़ाओं की वफ़ा, अरे वाह रे कुदरत!
किरचे मेर दिल के दिखाया दुनिया को तूने
हम भी देखेंगे तमाशा, गर मिली फुरसत

18 November, 2007

स्याह

वश चलता तो तुझे अपने दिल के अरमान दिखाता
तेरे हिस्से का सागर और अपना आसमान दिखाता
पर तेरी बेवफ़ाई का सूरज, इस रुसवाई से चमक गया
कि सागर गया सूख और नीला रंग स्याह से ढँक गया.


16 November, 2007

तमाशा


जी तो करता कुछ ना बोलूँ, जी तो करता कुछ ना गाऊँ
जी तो करता कभी ना रोऊँ और कभी ना नीर बहाऊँ

पर बीच बजरिया, मैं बेचारा
सबसे लड़ के, सबसे हारा
मैं काली किस्मत का मारा

रोज रोज यहाँ आता
कुछ झूठे नीर बहाता
खुद रोता, जग बहलाता

पर दुनिया बड़ी सयानी
करती अपनी मनमानी

इस पागल खेल में डूब डूब
इस मनमानी से ऊब ऊब

छोड़ के खेल तमाशा, सपनॊं में अपने डूब तो जाऊँ
पर ये खाली पेट जो माँगे, उसको कुछ कैसे दे पाऊँ
जी तो करता कुछ ना बोलूँ, जी तो करता कुछ ना गाऊँ
जी तो करता कभी ना रोऊँ और कभी ना नीर बहाऊँ

पर इस पेट की खातिर भैय्या
झूठा सच्चा
बुरा या अच्छा
सही गलत
या बस गफ़्लत
अजब गजब
या बेमतलब
जैस चाहो वैसा
तमाशा दिखलाऊँ

जी तो करता कुछ ना बोलूँ, जी तो करता कुछ ना गाऊँ
जी तो करता कभी ना रोऊँ और कभी ना नीर बहाऊँ



14 November, 2007

चेहरा बदल लिया

तेरी याद ना फेंक सका दिल से तो चेहरा बदल लिया

तू आये मेरे सामने, और फिर उड़ जाये रंग तेरा
ये ढंग ना मुझे पसंद प्रिय, सो चेहरा बदल लिया

तेरे गम में दिल रोया होगा, अब तो पता नहीं चलता
भींगी पलकें तुझे ना भायी, तो चेहरा बदल लिया

शक्ल से मेरी नफ़रत तुमको, पर मेरे दिल में बेताबी है
अब शायद तुझे देख सकूँ, अब चेहरा बदल लिया

भीड़ में गुम होना आसां अब, कोई नहीं पहचानेगा
तुम भी भूल मुझे जाओगी, जो चेहरा बदल लिया.

10 November, 2007

मेरी दीपावली

दीप और पतंगे का प्रेम
कौन नही जानता?

कहीं पढ़ा था,
"दीप और पतंगे मे फर्क सिर्फ इतना है
एक जल के बुझता है, एक बुझ के जलता है।"

आजतक मतलब नही समझ पाया हूँ।

आज फिर दीपावली पर
दीपो की पंक्ति देखी।
और हर दीप के किनारे
जले सैकड़ों पतंगों को दम तोड़ते देखा.

कहीं ये पर्व प्रेम का मरघट तो नही?

07 November, 2007

मेरे प्रिय मुन्शी जी

अब इतने सारे लेखकों में मुझे मुंशी जी अधिक प्रिय क्यों हैं इसका कारण संभवतः आप जानते ही होंगे। मेरे एक मित्र ने कुछ दिनों पहले मुझसे कहा कि अगर तुम ब्लोगिंग करते हो और पॉडकास्टिंग के बारे मे भी जानकारी है तो कहानियो का पोडकास्ट क्यों नही शुरू करते? अब क्यों नही करता - जैसे प्रश्न का कोई जवाब है क्या? सो उल्टे मैंने सवाल दाग दिया कि इसे सुनेगा कौन? व्यर्थ की मेहनत क्यों करनी?
वो भड़क उठा। 'कहने को हिन्दी की सेवा करते हो? और सुनेगा कौन की चिंता करते हो? ये सब बहाने हैं। कोई सुने ना सुने मैं सुनूंगा।' इतना कहके वो बेचारा बचपन मे खो गया। और वो सारी बातें बताने लगा की रात मे अपने भाई के साथ किस तरह रेडियो पर कहानियाँ सुना करता था। अब दादी नानी की कहानियाँ थोडी कम सी हो गयी हैं - पर अपनी चिता भी लगे हाथों जाता दी। और फिर धीरे से कह गया कि 'प्रेमचंद' की कहानियाँ पढ़नी शुरू करो। (पढी हुई तो मेरी सारी हैं, उसका तात्पर्य रेकॉर्ड करने से था)। अब रात को सोते वक़्त मैं तो कहानियाँ सुन नही सकता लेकिन ऐसे बौड़म लोग जिन्हें शायद ये पसंद आये, उनके लिए एक कोशिश करने मे कोई हर्ज नही लगा। सो अपने मित्र के आदेश का पालन करते हुए, मैंने ये कोशिश प्रारंभ की है। अब इतनी लंबी लंबी कहानियाँ लगातार १०-१५ मिनट तक रेकॉर्ड करने मे गलतियां तो वाजिब हैं, सो क्षमा की पोटली साथ ले के आना। एक इंसान भी इसे सुनता है, तो मेरा अहोभाग्य। नहीं तो बाद मे बुढापे मे जब आँखें काम ना करेंगी, तब ये कहानियाँ मेरे काम आएगी - ये सोचकर काम प्रारंभ कर रहा हूँ।
नियमितता कितनी कायम रहेगी, नही जानता। लेकिन सप्ताह मे एक की दर कायम रहे, इसकी कोशिश करूंगा। चट्कार्थ लिंक यह रहा: http://sunokahani.blogspot.com

प्रेत

मेरे अन्दर का प्रेत
एक दिन छटपटाने लगा
मेरी इच्छाओं को नोचने लगा
मेरी कविताओं को खाने लगा।

घबराहट में मैंने तेजी से
अपने ह्रदय के झोले मे हाथ डालकर
उसकी शक्ल देखनी चाही।
कुछ भी हाथ न आया
एक दर्पण के सिवा।

फिर अचानक ऐसा लगा
कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण
अनंत गुना बढ़ने लगा है
और मैं अपने ही बोझ से
पाँव के नीचे वाली जमीन मे दबा जा रहा हूँ।
कब्र मे आधा पड़ा हाथ पाँव चला रहा था।

गलती से, मेरा हाथ सर पर गया;
ओह! वहाँ तो प्रेत बैठा
बेवजह ही मेरा वजन बढ़ा रहा था.

01 November, 2007

निर्माण

सूरज से रोशनी, चंदा से चाँदनी, फूलों से खुशबू चुराया
सपनों के सागर में, गीतों को गूंधा; प्यार में उसको मिलाया

तब जाके मेरे खुदा ने सनम, फुरसत से तुझको बनाया

अल्हड़ घटाओं से उसने, जुल्फें तेरी हैं सजायी
सागर से गहराई मांगी फिर आँखें तेरी है बनायी
सम्मोहन का काला जादू, भौहों को तेरे सिखाया
तब जाके मेरे......

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