कल रात हमारे मेस के सामने कुछ लोग आईसीआईसीआई के क्रेडिट कार्ड का फॉर्म भरने को कह रहे थे। आजीवन क्रेडिट कार्ड - आई कार्ड का क्सेरोक्स दीजिए और क्रेडिट कार्ड बन कर आ जाएगा। आई आई टी में रहने का ये फायदा तो होता ही है। खैर, मेरे मन में बहुत दिनों से एक क्रेडिट कार्ड की इच्छा थी, ऑनलाइन पैसों का ट्रान्सफर सुगम जो हो जाता है।
सो मैंने उस इंसान से बात करनी शुरू की, कि और क्या क्या चाहिऐ? उसने कहा कि और किसी चीज की जरूरत नही। वैसे आप कहाँ के हैं? मैंने बता दिया की मैं बिहार का हूँ। वो सज्जन थोडा सकपकाए। अब उन्हें हर फॉर्म में कमीशन मिलता है, सो मुझे भगाना शायद उन्होने उचित नही समझा। सो, विनम्रतापूर्वक बोले की क्या यह संभव नही की आप कहीं और का एड्रेस लिखा दें? 'अजी एड्रेस तो आप हॉस्टल का ले लीजिये' - मैंने कहा।
"नही, नही...परमानेंट एड्रेस में कहीं और का एड्रेस लिख दीजियेगा, नहीं तो कार्ड नही मिलेगा।"
"क्यों भला? मेरे बगल में जो फॉर्म भर रह है, उसे तो झूठ लिखने की जरूरत नही। फिर मैं क्यों?"
"अजी आप समझ नही रहे हैं। वो बिहार से नही हैं ना! मैं जानता हूँ की आपकी 'गलती' नही है। लेकिन अब बिहार है ही इतना बदनाम, इसमे मैं क्या करूं?"
गुस्सा तो बहुत आया। लेकिन मैं क्या करूं? कोई उपाय नही सूझ रहा था। और अपने पते में बिहार नही लिखना, स्वाभिमान का प्रश्न लगा, सो मैंने क्रेडिट कार्ड का विचार त्याग दिया। लेकिन ह्रदय पर जो आघात पहुंचा, उसे भूल नही पा रहा। यदि भारत के सर्वश्रेष्ठ संस्थान मी पहुंच जाने के बावजूद भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया जा सकता है, तो मुझे अपने अन्य बिहारी भाईयों के लिए तो अतीव चिंता सता रही है।
"बिहारी भाईयों...?" छी विकास ! क्षेत्रवाद फैलाते लज्जा नही आती?
आती है ना? लेकिन क्या करूं? कभी कभी डरता हूँ की क्षेत्रवाद की लज्जा को लोग बिहारी होने का शर्म ना समझ लें। इसलिए सर उठा के गर्व से कहता हूँ कि हाँ मैं बिहारी हूँ। क्षेत्रवाद का दोष मेरे माथे भले ही मढ़ दो, लेकिन ऐसी हर घटना पर मैं चिल्लाऊंगा।
और आप सब मिल के कहना - "एक ठो बिहारी था। स्साला हर जगह क्षेत्रवाद! करता भी क्यों नही? बिहारी था ना"।