30 October, 2007

जीवन

कुछ इस तरह जीवन मुझे बाँध के बैठा है
कि छटपटाता हूँ, चिल्लाता हूँ, गालियाँ सुनाता हूँ
और रस्सियों को सुलझाने की कोशिश में
और भी उलझता जाता हूँ।

मेरे बदन पर जकडन के नीले निशान बन गए हैं।
और उसके नीलेपन में मेरी कल्पनाओं का आकाश
अपनी नीलिमा से लज्जित हो रहा है।

साँसें अचानक से बंद सी होने लगती हैं
मानों ये रस्सियाँ साँप बनकर
मेरे अन्दर एक ऐसा विष वमन कर चुकी हैं
जो वायु के ऑक्सीजन के साथ समझौता कर
मुझे अन्दर ही अन्दर जला रही है।

मानों मैं अपनी ही चिता का आवरण मात्र हूँ।

25 October, 2007

नैन लड़ जयिहें त मनवा मा खटक होइबे करी

आज मुझे मेरी एक मित्र ने कहा कि उसे किसी लड़के ने प्रोपोज किया। अब बेचारा लड़का जितनी हिम्मत और प्लानिंग के साथ आया होगा, ये तो हर लड़का समझ सकता है। खैर, मेरी इस मित्र ने उसकी बात पूरी तरह सुने बिना ही चलता कर दिया। और आज लंच के दौरान जब उसने यह कहानी हमे सुनाई, तो हमने तो बहुत मजे लिए। कुछ उस लड़के का मजाक उड़ाया और कुछ अपनी इस लड़की-मित्र का। (अब female friend का ठीक ठीक अनुवाद मुझसे तो ना होने पायेगा).

बात आई गयी हो गयी। लेकिन सवाल सोचने वाला है। समस्या गंभीर है। अब ऐसी जगह में जहाँ लड़के-लड़कियों का अनुपात वैसा हो जैसे तारे और चाँद का, वहाँ लड़के करें भी तो क्या? और लडकियां बेचारी? एक एक को २०-२० लोग प्रोपोज करने आ जाते हैं, तो उनकी मनोदशा क्या होती होगी? और ध्यान देने योग्य बात ये है कि इनमे से अधिकांश लोग ऐसे भी होते हैं जो पहली बार अपने घर से बाहर निकल रहे होते हैं। ऐसे में इतना मनोवैज्ञानिक दबाव झेलने का सामर्थ्य हर किसी में होता है - ये मैं नही मान सकता.

अब जानता हूँ कि ऐसी बातों का कोई समाधान शायद असंभव है लेकिन अब इस बावरे मन को कौन समझाये जो दुनिया को परफेक्ट देखना चाहता है.

सोच रहा हूँ कि अब मेरी उस मित्र ने तो बात को हँसी मे उड़ा दिया. (कुछ हाथ हमारा भी था :D ) लेकिन वो लड़का अभी बैठा बैठा क्या सोच रहा होगा? अब मजाक तो उसके मित्र भी उड़ा रहे होंगे. तो उसके दिल पर क्या गुजर रही होगी? एक तो ना सुनने का गम और दूसरा दोस्तों के ताने. मुहब्बत को मुश्किल यूं ही थोडे कहते हैं....?

और फिर ये भावनाएं मुहबत हैं, इनपर भी मुझे भरोसा नही. फिल्में देख देख कर प्रेम कि जो मूर्ति हम अपने दिमाग मे बना लेते हैं, जो मैनिफेस्टेशन है प्यार शब्द का, कहीं जिम्मेवार वो तो नही? कितने सारे विचार मन मे उठ रहे हैं कि पूरा का पूरा पोस्ट एक कोलाज बन के रह गया है. सो, अब बस करूंगा. एक गाना याद आ रहा है सो पोस्ट का शीर्षक वही रहेगा. "नैन लड़ जयिहें त मनवा मा खटक होइबे करी "

23 October, 2007

एक ठो बिहारी था

कल रात हमारे मेस के सामने कुछ लोग आईसीआईसीआई के क्रेडिट कार्ड का फॉर्म भरने को कह रहे थे। आजीवन क्रेडिट कार्ड - आई कार्ड का क्सेरोक्स दीजिए और क्रेडिट कार्ड बन कर आ जाएगा। आई आई टी में रहने का ये फायदा तो होता ही है। खैर, मेरे मन में बहुत दिनों से एक क्रेडिट कार्ड की इच्छा थी, ऑनलाइन पैसों का ट्रान्सफर सुगम जो हो जाता है।

सो मैंने उस इंसान से बात करनी शुरू की, कि और क्या क्या चाहिऐ? उसने कहा कि और किसी चीज की जरूरत नही। वैसे आप कहाँ के हैं? मैंने बता दिया की मैं बिहार का हूँ। वो सज्जन थोडा सकपकाए। अब उन्हें हर फॉर्म में कमीशन मिलता है, सो मुझे भगाना शायद उन्होने उचित नही समझा। सो, विनम्रतापूर्वक बोले की क्या यह संभव नही की आप कहीं और का एड्रेस लिखा दें? 'अजी एड्रेस तो आप हॉस्टल का ले लीजिये' - मैंने कहा।

"नही, नही...परमानेंट एड्रेस में कहीं और का एड्रेस लिख दीजियेगा, नहीं तो कार्ड नही मिलेगा।"
"क्यों भला? मेरे बगल में जो फॉर्म भर रह है, उसे तो झूठ लिखने की जरूरत नही। फिर मैं क्यों?"
"अजी आप समझ नही रहे हैं। वो बिहार से नही हैं ना! मैं जानता हूँ की आपकी 'गलती' नही है। लेकिन अब बिहार है ही इतना बदनाम, इसमे मैं क्या करूं?"

गुस्सा तो बहुत आया। लेकिन मैं क्या करूं? कोई उपाय नही सूझ रहा था। और अपने पते में बिहार नही लिखना, स्वाभिमान का प्रश्न लगा, सो मैंने क्रेडिट कार्ड का विचार त्याग दिया। लेकिन ह्रदय पर जो आघात पहुंचा, उसे भूल नही पा रहा। यदि भारत के सर्वश्रेष्ठ संस्थान मी पहुंच जाने के बावजूद भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया जा सकता है, तो मुझे अपने अन्य बिहारी भाईयों के लिए तो अतीव चिंता सता रही है।

"बिहारी भाईयों...?" छी विकास ! क्षेत्रवाद फैलाते लज्जा नही आती?
आती है ना? लेकिन क्या करूं? कभी कभी डरता हूँ की क्षेत्रवाद की लज्जा को लोग बिहारी होने का शर्म ना समझ लें। इसलिए सर उठा के गर्व से कहता हूँ कि हाँ मैं बिहारी हूँ। क्षेत्रवाद का दोष मेरे माथे भले ही मढ़ दो, लेकिन ऐसी हर घटना पर मैं चिल्लाऊंगा।

और आप सब मिल के कहना - "एक ठो बिहारी था। स्साला हर जगह क्षेत्रवाद! करता भी क्यों नही? बिहारी था ना"।

19 October, 2007

तुम्हें देखते देखते...

तुम्हें देखते देखते ऐसा खयाल आता है

जैसे बारिश की बूँदें
धरती पर आने के ठीक पहले
जम सी गयी हैं
और आसमान में कई बर्फ़ीले तारे अटक गये हैं.

जैसे सागर की लहरें
अचानक से थम सी गयी हैं
और उनका उतार चढ़ाव
तुम्हारी लम्बी जुल्फ़ों का प्रतिबिम्ब बन कर
मेरी चेतना को झकझोर रही हैं

जैसे इन्द्रधनुष
तुम्हारे चेहरे के अनेकानेक भावों
को अपने रंगों से दिखाने की
कोशिश कर रहा है
और अपनी असफ़लता से शर्माकर
पिघलता हुआ सा
आसमान से बूँद-बूँद चू रहा है.

जैसे आकाश ने
तुम्हारी कजरारी आँखों के कोरों से
अमावस्या का अंधकार
चुराया है.
और तुम्हारी मुस्कान की लड़ी
से ही चाँदनी पर चमकता रंग आया है.

तुम्हे देखते देखते ऐसा खयाल आता है

16 October, 2007

अकेले में कभी

नोट: यह कविता दिसंबर २००५ को लिखी गयी थी. उस समय मैं रोमन लिपि में लिखा करता था. आजदेवनागरी में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.



उस जीवन से इस जीवन तक
खाये हैं फल मैंने बहुतेरे!
पर घर के छोटे आंगन के
पहले अमरूद को कैसे भूलूँ?
ओ ऊँचे अमरूद की फुनगी
आ झुक जा! तुझको मैं छू लूँ.

वो पापा का फोन पे हँसना
पर अंदर अंदर ही घुटना
'पढ़ना है तो मत आओ तुम'
ये भी हँसते हँसते कहना.
दुर कहीं से फिर मम्मी का
ये चिल्लाना, 'बाबू आना..!'

प्यार की उस आवाज को सुनकर
मैं कठोर कैसे रह पाऊँ?
हाय रे ये आशा की कीमत!
चाहूँ, फिर भी जा ना पाऊँ.

माँ मेरी! तेरे बेटे ने,
जाने कैसा पाप किया है
जो नियति ने इस बालक को
ये निर्मम अभिशाप दिया है.

वो हँसता है, हँसी में पर
आह्लाद नहीं, कोई साथ नहीं है.
रोता है, पर रुदन में भी
वो बात नहीं, जज्बात नहीं है.
आँसू जो उसके पोंछ सके
वो हाथ नहीं है.

अनजान

मैं इंसान हूँ
कुछ लोग मुझे अनजान भी कहते हैं.

जब अविश्वास के ताप से
रिश्तों की मोम पिघल रही होती है -
मैं अपने ही चिता की रोशनी में बैठा
कविताएँ गूँधा करता हूँ.

चाय में बसी,
एक प्याली प्रीत की मिठास
चीनी, जाने कब चुरा लेती है.
और मैं,
तीन चौथाई पानी
और एक चौथाई दूध में घुली
भावनाओं को उबालकर
उनकी चाशनी बना रहा होता हूँ.

फिर एक दिन अचानक प्रेम नमक बन जाता है
और मैं खीर खाने लगता हूँ.

मैं इंसान हूँ
कुछ लोग मुझे अनजान भी कहते हैं.

08 October, 2007

एक कंप्यूटर जोक

07 October, 2007

पुतले

मैं इंसान हूँ
कुछ लोग मुझे पुतले भी कहते हैं.

पुतलों में एक खास बात होती है -
वे स्वतंत्र होते हैं.

सर, पाँव से स्वतंत्र
हाथ, धड़ से स्वतंत्र
मानों हर अंग
अलग अलग एक पुतला हो.

मैं छोटे पुतलों से बना
एक बड़ा पुतला हूँ.

पर मेरे पुतले छटपटाते हैं
कभी कभी नोंच खाते हैं

धागे की धार से
मेरी उंगलियाँ कट जाती हैं
और खून की तरह सफ़ेद जीवन
बहने लगता है.

हवाओं में
मौत की मात्रा बढ़ जाती है.
धीमे चलने वाली साँस भी
तेजी से मेरा उम्र पीने लगती है.

धीरे धीरे मैं रीत जाता हूँ
खाली हो जाता हूँ.

तुम मेरी मौत का मातम मनाते हो
और मैं अपनी आजादी का गीत गाता हूँ.

मैं इंसान हूँ
कुछ लोग मुझे पुतले भी कहते हैं.

सुनो सुनो!

वाणी के ब्लोग को ले कर जितना विवाद खड़ा हुआ, मुझे उसकी उम्मीद नहीं थी. कई तरह के खयाल मन में आये और गये. तटस्थ रहने से तो डरता ही रहा हूँ कि कहीं फिर समय मेरे अपराध ना लिख डाले. :) (समर शेष है! तो याद है ना?) पहले सोचा कि मैं भी एक लम्बा सा पोस्ट लिख डालूँ. लेकिन यह तो आग में तेल डालने वाली बात भी हो सकती है, यही विचार कर चुप रह गया. आखिर ना ही मैंने कोई जिम्मेवारी स्वीकार की है और ना ही मैं किसी के प्रति उत्तरदायी हूँ. सो मौन रहना ही उचित जान पड़ा. वैसे भी जब काम बोल सके तब जीभ को मिथ्या कष्ट देने की आवश्यकता नहीं. परंतु हाय रे मानव योनि! जिस संदर्भ में जितना विलगाव का भाव रखो, मन उस ओर उतना ही अधिक खिंचता जाता है. सो मुझे किसी अन्य व्यस्तता की आवश्यकता हुई. बहुत दिनों से मेरा पोडकास्ट उपेक्षित पड़ा था, सो सोचा कि उसका उद्धार किया जाये. अंतिम कविता जो लिखी थी उसे झटपट रेकार्ड किया और वही आपके सामने मूल्यांकन हेतु रखने जा रहा हूँ. पार्श्व में जो संगीत है उसका श्रेय जाता है अनिता जी को - जिन्होंने अपने ब्लोग पर इतना रुचिकर संगीत डाल रखा है जिसे किसी भी मूड में सुनो, अच्छा ही लगता है. और बकवास नहीं करूँगा. लिंक यह रहा: http://vikash.mypodcast.com/2007/10/post-46732.html

अपने विचारों से अवगत करायें, अग्रिम आभार.

04 October, 2007

वाणी का ब्लोग

जैसा कि मैंने पहले बताया था, कुछ लोगों ने मिलकर IIT मुम्बई मे हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसारार्थ एक नया समूह बनाया है - 'वाणी'। इस समूह की गतिविधियों को थोडा और आगे बढाते हुए हमने एक नए ब्लोग का निर्माण किया है जिसमे सिर्फ और सिर्फ छात्रों की रचनायें प्रकाशित की जाएँगी। चुंकि ये सारे आभियांत्रिकी के छात्र हैं और इनमे से कई अहिन्दीभाषी क्षेत्रों के भी हैं तो संभव है कि रचनायें सुधिजनों को परिष्कृत ना लगें। परंतु इन्हें उत्साह की अत्यंत आवश्यकता है। सो आप इस ब्लोग पर अवश्य पधारें एवं इन नव-कुसुमों को पल्लवित होने का आशीर्वाद दें। ब्लोग का लिंक यह रहा : http://iitbkivaani.wordpress.com/

02 October, 2007

सर्दियों का मौसम

ठंड हो गयी है.
फिर से सर्दियों का मौसम आ गया.
गर्म कमरे से बाहर निकलते ही
तुम्हारी यादें नश्तर की तरह
हड्डियों में समाने लगती हैं.
थोड़ा असर शायद हवाओं में भी होगा.

लेकिन यह मौसम वैसा नहीं है
मेरी ठंडी उंगलियाँ -
तुम्हारे होठों की गरमी के बिना
सूज गयी हैं.

देखो ना!
अब कवितायें कहाँ लिख पाता हूँ?
लिखने की कोशिश करते ही,
उँगलियों की ठंड
बाजुओं से होती हुई
दिल में समा जाती है.
मानों, इनका आपस में समझौता हो
ठंड बाँटने का.
और एक अनकहा सा वादा हो
दर्द साथ सहने का.

वादे से याद आया -
वो वादा, जिसकी लाश बची है सिर्फ़
जिसका एक हिस्सा तो तुमने जला दिया था
गर्मियों के आते ही.
(आखिर लाश देर सवेर बदबू जो देती है)
लेकिन दुसरे को मैंने सहेज कर रखा था.

मैं थोड़ा डरा भी.
सच!
कहीं वादे की सड़ाँध मेरी जान ना ले ले.
और फिर मैं ऊबकर उसे जला ना दूँ.
लेकिन शुक्र है.
फिर से सर्दियों का मौसम आ गया.
अब वो हिस्सा सुरक्षित है.
मैं चैन से तुम्हारी यादों में
बेचैन हो सकूँगा.

लेकिन यही ठंड तो तुम्हारे यहाँ भी होगी?
सो अपना खयाल रखना.
अगर प्रेम का अवशेष बचा हो
तो जलाना, आग सेंकना
थोड़ी सी गरमी देकर खत्म हो -
बेबस पातंगिक प्रेम और क्या चाहेगा?

कलम! आज कुछ कहना होगा

कब तक मैं एकाकी बैठूँ ?
कब तक तुम यूँ मौन रहोगे ?
अनगिन निर्मम छल जगती के
कब तक यूँ ही सहते रहोगे ?

करनी होगी भंग ये निद्रा
होश में आके चलना होगा
कलम! आज कुछ कहना होगा.

भाव उमड़ते हैं इस मन में
कह दो जो भी अब कहना है
मूक-बधिर से अब मत बैठो
दो ही पल जग में रहना है

भावों के मंझधार में हूँ मैं
तुमको भी संग बहना होगा
कलम! आज कुछ कहना होगा.

तो भी क्या जो जग दुत्कारे?
वीर कभी क्या हिम्मत हारे?
चाहे राह में बिछे हों काँटे
या घेरे मन को अँधियारे.

अन्धकार है मुझ पर हावी
बन मशाल तुझे जलना होगा
कलम! आज कुछ कहना होगा.

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