मेरा मन : एक शाश्वत नाला

जी हाँ.
मेरा मन एक नाले की तरह है,
शाश्वत नाला
जिसका ओर छोर किसी को पता नहीं चलता
बस सड़ाँध महसूस होती है.

जिसके समीप
प्रेमी युगल अठ्खेलियाँ नहीं करते.
और ना ही कोई कोमल हृदयी
अपनी भावनाएँ बाँचता है.
बस गाहे-बगाहे
कोई कूड़ा फेंकने आ जाता है.
सान्निध्य का अर्थ तो
यही है मेरे लिए.

जी हाँ.
मेरा मन एक नाले की तरह है,
शाश्वत नाला.
जहाँ सुंदरता फटकती ही नहीं.
बसती है
सिर्फ़ लिजलिजाती कवितायें
और गिजबिजाते व्यंग्य.
कोने में कुछ रूठे हुए गीत भी होंगे
अपनी कुरुपता से मुँह छिपाए.

आई आई टी बी की वाणी

बहुत प्रयास, मित्रों के साथ एवं उत्साही कवियों के सानिद्ध्या के कारण, मैंने एक क्लब तो बना लिया लेकिन उसका भविष्य कैसा होगा - यह संशय मन मे सदैव बना रहता था। यद्यपि आलोक का उत्साह एवं समय समय पर उसकी क्रियाशीलता देख मन को थोड़ी शांति मिला करती थी तथापि मन का भय कभी कम ना हुआ।

वाणी - हिंदी अभिव्यक्ति का मंच। जब हम अपने हिंदी के इस समूह के लिए पहली बार मिले थे तो ५-६ लोग ही थे। आई आई टी जैसे संस्थान मे इससे अधिक संख्या की मुझे उम्मीद ना थी। बस कुछ ही दिनों पहले की बात है। १५ अगस्त को हमने यह निश्चित किया कि संस्थान मे हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए एक ऐसे मंच की आवश्यकता है जो लेखन, श्रवण एवं वाचन तीनों को प्रश्रय दे। यहां साहित्य के कुछ समूह क्रियाशील थे। वाद विवाद, कवितायेँ, वाचन शैली - सबके समूह हैं, परंतु सब कुछ अंग्रेजी। यह बात मुझे सदा खलती थी। प्रथम वर्ष से ही मैंने कोशिश की कि हिंदी को भी अपनी प्रतिभागिता मिले। परंतु ऐसा हो ना सका। शायद समान भावों के साथ आवाज नाम के समूह की रचना की गयी थी। परंतु आज वह साहित्य सेवी ना बनकर, एक अखबार मात्रा हो गया लगता था। मेरे इस विचार के समर्थन के लिए कुछ लोग मिले। फिर क्या था, हो गयी शुरुवात।

आनन फानन मे हमने वो सब कुछ कर दिया जो एक तकनीक का छात्र कर सकता है। गूगल पर समूह की रचना की, (आज समूह में १२० सदस्य हो चुके हैं) ईमेल द्वारा लोगों को आमंत्रित किया, एक ब्लोग भी बनाया गया, कुछ को हिंदी टायपिंग सिखाई और हिंदी मे पोस्टर बना कर सारे संस्थान मे लगा दिए गए। संख्या बढने लगी। कभी कभी मिलना होने लगा। फिर पता चला कि प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए एक सांस्कृतिक सप्ताहंत का आयोजन किया जा रहा है जिसमे प्रतियोगिताएं होगी। फिर क्या था...? वाणी के सौजन्य से एक हिंदी कविता प्रस्तुतीकरण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतिभागियों की संख्या अनुमान से अधिक थी। करीब ३५-४० लोग रहे होंगे। कौन कहता है कि उच्च शिक्षा मे हिंदी प्रेमी नहीं होते...? तब मुझे अनुमान हुआ कि इतने लोग जो हिंदी का प्रेम लिए आते हैं, उनका प्रेम धीरे धीरे क्षीण क्यों होता जाता है। जब अवसर ही नही होंगे, तो प्रेम उमडेगा कैसे?

हमारा उद्देश्य बस अवसर प्रदान करना है। इस कार्यक्रम की सफलता से उत्साहित होकर हमने एक और इसी तरह की प्रतियोगिता का आयोजन किया जो सभी वर्ष के छात्रों के लिए था। आलोक, मोंटी, आशीष, वैभव - कितनों ने कोशिश की कि कार्यक्रम सफल हो। यद्यपि प्रारम्भ मे केवल १० लोग उपस्थित थे और धीरे धीरे संख्या ३०-३५ तक ही पहुंची, लेकिन एक खास बात रही। वो यह कि अधिकांश लोगों ने अपनी स्वरचित कवितायेँ सुनायी। यहां भी ३० कवि हो सकते हैं, इसकी कल्पना मैंने ना की थी। हमारी उम्मीद से कम लोग आये, परंतु हम हतोत्साहित नही हैं। हमे गर्व है कि इतने कम समय मे हमने इतना कुछ कर लिया है। वो लोग जो आजतक मंच पर नही आये थे, उन्होने भी अपनी कवितायेँ सुनायी। कुछ वरीय छात्र भी आये, संख्या कम थी - लेकिन आये. (यहां यह कितना दुर्लभ है, कौन नही जानता?) और प्रथम वर्ष के छात्रों का जो उत्साह देख रहा हूँ, जो प्रतिभाएं सामने आ रही हैं- उससे भविष्य उज्जवल दिख रहा है. अतः हमारी यह कोशिश उस दम तक जारी रहेगी, जबतक हिंदी को यथोचित सम्मान नही मिलता।

और अन्त मे सबसे महत्वपूर्ण बात! कल की काव्य संध्या मे अनिता कुमार जी ने, जो कि एक हिंदी ब्लॉगर एवं कवियित्री हैं - स्वेच्छा से अपने पति समेत पधारी थीं। निर्णायक होने का गुरुतर भार भी उन्होने अपने कंधे पर लिया। कुछ मनुहारी कवितायेँ भी सुनायी. ना जाने कहॉ से मेरा नम्बर ढूँढ कर, स्वयम आगे आकर इस समूह से जुड़ने की बात की थी इन्होने - ५२ वर्षीया, युवा हृदयी अब मिलते ही कहॉ है? धन्यवाद किस मुख से करूंगा? नमन करता हूँ। आप जैसे लोग हम बच्चों का मार्गदर्शन करते रहें और उत्साह बढाते रहें - हमारा प्रयास स्वमेव सफल हो जाएगा। हिंदी को आप जैसे लोगों की अत्यंत आवश्यकता है।

बस इतना ही। जो लोग जुडे हैं, वो जुडे रहें। अन्य उत्साहियों को जुड़ने की प्रेरणा दें। अंत मे भारतेंदु की पंक्ति कहना चाहूँगा:
"अंग्रेजी पढ़ के जदपि सब गुन होत प्रवीण
पर निज भासा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।"

गुलज़ार की कुछ त्रिवेणियाँ

कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे

ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।

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वह मेरे साथ ही था दूर तक मगर इक दिन
जो मुड़ के देखा तो वह दोस्त मेरे साथ न था

फटी हो जेब तो कुछ सिक्के खो भी जाते हैं।

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सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर

कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।

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शोला सा गुज़रता है मेरे जिस्म से होकर
किस लौ से उतारा है खुदावंद ने तुम को

तिनकों का मेरा घर है,कभी आओ तो क्या हो?

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आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!

चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा

एक अत्यंत सुंदर फ़िल्म: Bom yeoreum gaeul gyeoul geurigo bom


अगर आपको ऐसा लगता है कि फिल्म मे संवाद बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, तो यह फिल्म देख लीजिये। कोरिया की यह फिल्म 'Spring, Summer, Fall, Winter... and Spring' के नाम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयी। इस फिल्म के आगे-पीछे बहुत ही ज्यादा अध्यात्मिक चिन्तन की आवश्यकता है। अतः हलकी फुलकी फ़िल्में पसंद करने वाले लोग, इसे भूलकर भी ना छूएँ।

पिछले साल यह फिल्म मैंने देखी थी। और तब से सोचे बैठा था कि इस फिल्म के बारे मे अवश्य लिखूंगा। परंतु आज तक हिम्मत नही कर पाया। आज भी मैं इस फिल्म के बारे मे नही लिख रहा। शायद एक बार और देखूं, फिर साहस कर पाऊँ। वस्तुतः इस फिल्म की आतंरिक सुन्दरता को मैं समझ पाया या नही, इस चिंतन मे ही वक्त सरकता रहा है। कुल मिला के २० संवाद २ मुख्य चरित्र और ३-४ अन्य चरित्र - बस हो गयी १०३ मिनट की फिल्म। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि ऐसी फिल्म का ऐसा प्रभाव पड़ सकता है?

फिल्म के दृश्यों मे कविता बहती है। और इस काव्य की गूँज इतनी तीव्र है कि संवादों की आवश्यकता ही नही होती। हम सुनते नही, देखते हैं और धीरे धीरे हम देखना भी बंद कर देते हैं, हम बहने लगते हैं और बहते बहते किस कदर मौसम बदलते जाते हैं, पता ही नहीं चलता.

कोई भी सिनेमा प्रेमी इस फ़िल्म को देखना ना भूलें. फ़िल्म २००३ की है.

नोट: फ़िल्म को नग्नता एवं सेक्स के दृश्यों के कारण R रेटिंग मिली है. सो, इसका ध्यान रखें.

सही राह


किसी भी रास्ते पर कदम रखूँ
हज़ारों लोगों के अरमानों के किरचे
चुभने आ जाते हैं
और मन मे एक भय पनपने लगता है
और मेरे अन्दर बैठा मैं
पूछ बैठता है
'क्या कोई ऐसी राह है
जहाँ किसी के सपने ना टूटे हों?
क्या कोई भी रास्ता है
जो सीधा सफलता की ही ओर जाता हो?
तो फिर ये दार्शनिक और विद्वान
किस रास्ते की बात करते हैं?
क्या 'सही राह' जैसी चीज
भी सापेक्ष है?

प्रश्न


जब अपनी ही निगाह
अपने ही निगाह को ताकने लगे,
और रुका हुआ वक्त भी रूककर
आंखों मे झाँकने लगे,
और माजी के पन्ने पलट
सवालों को कब्र से खोद निकाले,
उस वक़्त विश्वास किसे सौपूं?
और नाराजगी करूं किसके हवाले?
किसके कंधे पर वादों का शव रखूँ?
और किसके शानों पर अपने अरमान?
किसे अपनी आत्मा का अंत दिखाऊँ
और किसे अपने श्राद्ध का सामान?

काव्य प्रेमियों के लिए

मेरे विद्यालय में एक परंपरा थी, कविताओं के अंत्याक्ष्री की। हम सारे बच्चे सैकड़ो कवितायें याद किया करते थे। मुझे आज भी रश्मिरथी और मधुशाला जैसी पुस्तकें ५०% तो याद हैं ही। तमाम कवियों की अनगिनत रचनायें पढ़ते थे हम। हमारे विद्यालय के कुछ वरिष्ठ लोगों ने मिलकर सबसे ज्यादा उपयोग में आने वाली कविताओं का एक संकलन तैयार किया था। आज वो संकलन अपने कंप्यूटर पर देखा, तो मन हर्ष से भर उठा। अगर आपको कविता मे तनिक भी दिलचस्पी है तो तुरत इन फाइलों को डाउनलोड करें।
अगर इस लिंक मे परेशानी हो तो http://groups.google.com/group/iitbkivaani/files पर जाकर फ़ाइल डाउनलोड करें। मेरे काव्य के प्रति अनन्य प्रेम का स्रोत आपको दिख जाएगा। इसे देखने के बाद टिपण्णी जरूर करें। :) और हाँ! एक बात बता दूं कि ये सारी कवितायेँ 6th से 10th के बालकों द्वारा प्रयोग मे लाई जाती थी। काव्य शिक्षण की ऐसी मिसाल नेतरहाट विद्यालय के अलावा कहीँ मिल ही नही सकती, मुझे इस बात का सदैव गर्व रहेगा।

और हाँ! मैं उन सबो का धन्यवाद ज्ञापित करना चाहता हूँ जिन्होंने मेरे पूछने पर हमारे हिंदी ग्रुप का नाम सुझाया था। आप सबो की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से IIT Bombay मे हिंदी के प्रचार के लिए 'वाणी' नाम का एक क्लब बनाया है। आशा है हमारा प्रयास सफल होगा।

...ना आया



निशब्द प्रतिरोध
बिलबिलाता क्रोध
कातर अनुरोध
कुछ भी तो उसके काम ना आया

नैनों का शस्त्र
वाणी निरस्त्र
तार तार वस्त्र
फिर भी वहां कोई राम ना आया

कौन बोले आज?
आंखों मे ना लाज
निर्लज्ज समाज
खुदा का भी देखो पैगाम ना आया


थोड़ा उदास हूँ

थोड़ा उदास हूँ क्यूंकि बहुत दिनों से कुछ लिख नही पाया। ऐसा नही है कि भावों की नदी सूखी है या फिर मेरी लेखनी की स्याही का रंग धूमिल है। शब्द मुझसे खासे प्रसन्न भले ना हों, परंतु मेरे प्रति उनके मन मे कोई विकार हो - इसका कारण भी नही समझ आता। छन्द मन में आ आ कर मल्हार गा रहे हैं परंतु बारिश की बूँदें मुझे गीली नही कर पा रही है, मानो मेरे ऊपर एक झिल्ली सी है जो मेरा आवरण बन मुझे समेटे है।

थोड़ा उदास हूँ क्यूंकि गलती से मैं जीवन मे होने वाले हर परिवर्तन का कारण ढूंढ़ना चाहता हूँ। परिवर्तन संसार का नियम है, ये किसे नही पता? परंतु इस नियम के पीछे का दर्शन क्या किसी की समझ मे आया है? क्या किसी ने परिवर्तन की नग्नता महसूस की है? इसे मेरे मन का विकार समझा जाये की मैं बदलाव को अनावृत करना चाहता हूँ, शायद उसके सारे रहस्यों को जाने का यही मार्ग हो। रहस्यों के साथ किसी को नियंत्रित करना आसान जो होता है।

थोड़ा उदास हूँ क्यूंकि अपनी सतत उदासी से ऊब चुका हूँ। अगर मैं अपनी इस ऊब का गुणात्मक विवेचन करने बैठूं तो शायद एक उबाऊ महाकाव्य लिख मारूं। इतिहास के पन्नों मे अपना नाम लिखाने की जो इच्छा जीवन के कटु संघर्षों के कारण ठंढे बस्ते मे चली गयी गयी है, उसे पूरा करने का यह स्वर्णिम अवसर भी मेरे मन की तरंगों को विदोलित नही कर पा रहा। शायद मन ही मन मेरा मन भी यह जानता है कि ऐसी ऊब भरी समय रेखाओं से मेरा भविष्य भरा पड़ा है।

थोड़ा उदास हूँ क्यूंकि मेरे मन मे कवि बनने की अपार इच्छा है। और उदासी कविता के कितने नजदीक है, इससे सुधीजन अनजान नही होंगे।
'वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा ज्ञान
उमड़ कर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।'
परंतु मेरी उदासी की तस्वीर इतनी सुन्दर तूलिका द्वारा नही बनायीं जा सकती। वैसे भी कोई चित्रकार, मेरी उदासी की तस्वीर बनाकर अपनी दुर्गति कराना पसंद नही करेगा। सो मैंने खुद ही कूची उठा ली है। चित्र पर थोड़ा गौर करें

नही अब होंठ की लाली मेरे दिल को लुभाती है
किसी का तप्त चुम्बन भी, नहीं उष्मा जगाती है
नैनो के निमंत्रण से मन का उल्लास मर जाता
शोख सी तितलियों का रंग, दिल को बदरंग कर जाता

हाय बद्रंगी का आलम! घटाए घट नही पाता
दिल पे जो बोझ है भारी, हटाये हट नहीं पाता

फूल की खुशबू भी जाने कहाँ गुम हो गयी देखो
जो कल तक गीत गाती थी, वो बुलबुल खो गयी देखो
सबको करती थी जो निर्मल, उसके अब घाट सुने हैं
जिसने गन्दा किया सबको, वो गंगा हो गयी देखो

चलो सनम तुम्हे चांद तारों की सैर कराऊँ

हाँ जी! बिलकुल गलत नही कह रहा। चांद तारों की सैर करना अब कोई बड़ी बात थोड़े ही है। मेरी बात का भरोसा ना हो तो गूगल देवता से पूछ लो। ये उनका ही कमाल है। गूगल स्काई नाम से नयी सेवा शुरू की है। नही नही, नयी सेवा कहना भी गलत ही होगा। वस्तुतः गूगल अर्थ मे ही नया संस्करण आया है जिसके जरिये आप घर बैठे बैठे सारी सृष्टी घूम सकते हैं। :)

तो क्या कहते हैं? चलिए थोड़ी देर ब्रम्हांड मे विचरण करने के उपरांत मिलता हूँ।

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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