29 August, 2007

पंकज कपूर की दो उम्दा फ़िल्में

एक रुका हुआ फैसला : १९८६ मे निर्मित यह फिल्म एक अंग्रेजी फिल्म का रीमेक है। नाम - 12 angry men। मैंने सोचा था की फिल्म उतनी अच्छी नही होगी और सच कहूं तो थी भी नही। फिल्म से ज्यादा एक नाटक लग रह था। परंतु पंकज कपूर के बेहतरीन अभिनय ने बांधे रखा. सो, यदि आप एक कमरे मे ही फिल्मायी गयी पुरी फिल्म झेल सकते हैं, तो जरूर देखियेगा।

blue umbrella : यह इस साल की फिल्म है। कहने को तो ये बच्चों वाली फिल्म है मगर जिस तरह से पंकज कपूर ने अपने चरित्र को उकेरा है, वह फिल्म के मध्य के बाद इतना मनोवैज्ञानिक और फिर भी साधारण दिखता है, वह वर्णनातीत है। बच्चों को तो यह फिल्म पसंद आएगी ही, बच्चों के लायक ही गाने हैं और कहानी कुछ इतनी भोली और मासूम है की उनके आव कोई इसे समझ ही नही सकता। सो, अगर आप कुछ घंटों के लिए बच्चे बने रह सकते हैं तो यह फिल्म अवश्य देखिए।

28 August, 2007

Nodame Cantabile


जापान मे कॉमिक्स का प्रचलन कितना अधिक है, यह कौन नहीं जानता। 'manga' कहे जाने वाले ये कॉमिक्स कभी कभी एनीमेशन फिल्मों के रुप में दिखाए जाते हैं तो कभी कभी इनपे आधारित टीवी सीरियल बनाया जाता है। नोदमे कान्ताबिले एक ऐसा ही उदाहरण है।

संगीत का उपयोग कितनी सुन्दरता से किया जा सकता है, यह उसका शानदार नमूना है। पाश्चात्य जगत के संगीत प्रेमियों के लिए यह सीरीज एक वरदान स्वरूप है। beethoven, mozart, chopin जैसे कई महान संगीतकारों के संगीत को बजा कर दिखाया गया है। पार्श्व संगीत का इतना अद्भूत उपयोग भी कदाचित कम ही देखने को मिलता है।

अगर आप संगीत प्रेमी हैं, तो इस सीरीज को देखना अनिवार्य हो जाता है। कुल जमा २३ एपिसोड हैं। यह सीरीज मुझे शायद ज्यादा ही प्रभावित कर गयी। क्यूंकि इसे देखने के बाद मेरा संगीत प्रेम और भी ज्यादा बढ़ गया और मैं कई महीनों की दबी इच्छा को कार्यरूप मे परिणत करने का साहस कर पाया। जी हाँ! मैंने विधिवत ढंग से पियानो सीखना प्रारम्भ किया है। :)

इस सीरीज के बारे मे अधिक जानकारी के लिए यहां देखें: http://en.wikipedia.org/wiki/Nodame_Cantabile

25 August, 2007

ग़ुस्सा

कभी कभी यूं ही मुझसे ग़ुस्सा आ जाता है

सवेरे सवेरे पंछी गाते हैं
और मुझे ग़ुस्सा जाता है
सुरज की किरणें मेरी आंखों मे समाती है
और मुझे ग़ुस्सा जाता है

किसी ने मेरे दिल की शांति भंग नही की
किसी ने मेरे कान मे आकर अपना दुखडा नही रोया
किसी राजनीतिज्ञ से भी नही मिला
ना ही किसी भिक्षुक की दयनीय हालत देखी।
यूं ही, बस यूं ही मुझे कभी कभी ग़ुस्सा आ जाता है।


कहते हैं ग़ुस्सा इन्सान को खा जाता है
परंतु मेरी चेतना कभी ख़त्म नही हो पायी
क्या अब ग़ुस्सा भी बेईमान हो गया है?
क्या अब ग़ुस्सा भी इन्सान हो गया है?

हद्द है! मुझे इस बात का भी ग़ुस्सा है
कि मुझे ग़ुस्सा क्यों आता है?
मूझे इस बात का भी ग़ुस्सा है
कि मैं जिंदा ही क्यों हूँ?

तुम उदास होते हो, मुझे ग़ुस्सा आता है।
तुम हँसते-गाते हो, मुझे ग़ुस्सा आता है।
तुम बक बक करते हो, मुझे ग़ुस्सा आता है।
तुम चुप चुप रहते हो, मुझे ग़ुस्सा आता है।

हे ग़ुस्से!
निकल लो, नहीं तो बहुत पछताओगे
मेरे ग़ुस्से की आग मे भस्म हो जाओगे।

22 August, 2007

वक्त : मेरे एक मित्र की कविता

यह कविता मेरे एक मित्र विपिन के द्वारा लिखी गयी है. आशा है कि आपसब उनका उत्साहवर्धन करेंगे. वह अभी अंग्रेजी में ही ब्लोगिंग करते हैं. लिंक यह रहा : http://halfcigarette.blogspot.com

सुना था
कि वक्त हर मर्ज की दवा है
हर घाव को भर देता है
हर चेहरे को मिटा देता है

फिर क्यूँ - क्यूँ अभी तक
मेरी स्लेट पर तुम्हारा नाम बाकी है.

हर नया नाम
'रेत' से लिख पाता हूँ.
हर नया चेहरा
पानी में उंगलियों से बनाता हूँ.

बस इक नाम
ना जाने कब कुरेद लिया मैंने
कि चाहकर, चाहकर भी उसे मिटा नहीं पाता.

21 August, 2007

एक गाना मैं भी सुनाऊँगा

07. Bhool Na Jana ...

मेरे मनपसंद गानों में से एक है. गाने की डिटेल तो युनुस जी ही बता सकते हैं. मुझे तो बस इतना पता है कि यह 'भूल ना जाना'(१९७२)फिल्म का गीत है जिसे गुलज़ार जी ने लिखा है.

16 August, 2007

एक तस्वीर

कहते हैं की एक तस्वीर हज़ारों शब्दों से बढकर होती है। आज का दिन मेरे लिए कुछ विशेष है। सो आज एक तस्वीर, कुछ शब्दों के साथ।

15 August, 2007

मेरा अंग्रेजी ब्लोग

पहले मैं अपने इस ब्लोग पर अंग्रेजी लिखा करता था। परंतु जिस दिन से गूगल ने हिंदी टायपिंग की सुविधा दी, मेरे हिंदी प्रेमी ह्रदय ने तुरत ही पलटा खाया और इससे पहले की मुझे कुछ पता चलता, मैं सिर्फ और सिर्फ हिंदी में लिख रहा था। पर आभियांत्रिकी का छात्र हूँ, आंग्ल भाषा से ना तो भाग सकता हूँ और ना ही भागना चाहता हूँ।

सो, एक मित्र के सहयोग एवं उत्साहवर्धन से मैंने एक अंग्रेजी ब्लोग पर भी लिखना प्रारम्भ कर दिया है। यद्यपि मेरी अंग्रेजी इतनी अच्छी तो नही, फिर भी आशा करता हूँ कि यहां आने वाले मनीषी मेरी गलतियों कि ओर इशारा करने और मार्दर्शन करने वहाँ भी आएंगे।

मेरे द्वारा आज लिखा गया पोस्ट 'My Salad Days' यहां पढ़ें

13 August, 2007

एक नाम सुझाएँ

मैं और मेरे कुछ मित्र मिलकर IIT Bombay मे एक हिंदी क्लब की स्थापना करना चाहते हैं।

इसके लिए एक नाम की आवश्यकता है। कोई सुझाव.....???

यही जिंदगी है, यही जिंदगी है

कोई बता दे ये क्या जिंदगी है?
दुआ है या कोई सजा जिंदगी है?
आंखों से देखा
ये किस्मत का लेखा
नियति की काली बही जिंदगी है।
यही जिंदगी है, यही जिंदगी है।

दिल की जो बातें हैं, दिल मे ही रखना
जो दिल टूट जाये तो दिल मे सिमटना
दिल की तड़प से, कलपना बिलखना
फिर भी इबादत, मे दिल की मुहब्बत
की खातिर सौ सौ सजदे मे गिरना

सजदे मे गिरना, यही दिल्लगी है
यही दिल्लगी है, यही जिंदगी है।

वो तेरा आना, नजरें चुराना
बन अजनबी सा, मुँह फेर जाना
मेरी धड़कनों को ना आये भरोसा
लगता है जैसे ये नज़रों का धोखा
यादों के आँचल मे चेहरा छुपाना
नैनों की धारा से सागर बनाना

सागर बनाना, यही आशिकी है
यही आशिकी है, यही जिंदगी है।

कोई बता दे ये क्या जिंदगी है?
दुआ है या कोई सजा जिंदगी है?

-----------------------------

मेरी आवाज मे यह गीत यहां सुनें। शब्द तो मेरे अपने हैं ही, इसमे हल्का फुल्का जो भी संगीत है, मेरा अपना है। और आवाज भी मेरी ही है। पसंद आये तो आशीर्वाद दीजिए, नही तो बालक की चंचलता जान कर क्षमा करें। टिप्पनिओं द्वारा अपने विचारो से अवश्य अवगत कराएँ।

12 August, 2007

२००७ की कुछ फ़िल्में

मैंने इस सप्ताहांत पर २००७ की कुछ फ़िल्में देखीं। उनके बारे मे बता रहा हूँ।

  • Bombay to goa: सुनील पाल और राजू श्रीवास्तव जैसे लोग टी.वी पर तो अच्छे लगते हैं पर फिल्मों मे...? मुझे तो कुछ खास मजा नही आया। सोचा था कि कम से कम हँसी आएगी, वो भी नही। पता नही कोई इतने पैसे खर्च करके ऐसी फिल्म क्यों बनाता है।

  • 88 minutes: किसी ने आपको जीने के लिए ८८ मिनट का वक्त दिया है और आप लगे हुए हैं उस अपराधी को पकड़ने मे। थ्रिलर अच्छा है लेकिन नयापन कुछ नहीं। वही घिसा पिटा स्टाइल। इसे देखा जा सकता है लेकिन जायदा उम्मीद लेकर नही।

  • Evan Almighty: Bruce almighty अगर आपको याद है तो यह फिल्म जरूर देखें। सामान्यतया सीरीज मे बनने वाली फिल्मों की पहली फिल्म बहुत ही अच्छी होती है और बाक़ी धीरे धीरे खराब होने लगती हैं। Spiderman इसका एक अच्छा उदहारण है। लेकिन मैं इस फिल्म को अपवादों की श्रेणी मे रखना चाहूँगा। कल्पनाशीलता मे इसे १०० मे १०० अंक मिलने चाहिऐ. जरूर देखें! इस फिल्म के एक संवाद ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैं वाक्य को अनुवादित करके इसकी सुन्दरता नही बिगाड़ना चाहता। सो, अंग्रेजी मे प्रस्तुत कर रहा हूँ।
    Let me ask you something। If someone prays for patience, you think God gives them patience? Or does he give them the opportunity to be patient? If he prayed for courage, does God give him courage, or does he give him opportunities to be courageous? If someone prayed for the family to be closer, do you think God zaps them with warm fuzzy feelings, or does he give them opportunities to love each other?

  • The zodiac: एक और थ्रिलर। आजकल अपेक्ष्क्रित थ्रिलर ज्यादा बन रहे हैं शायद। यह फिल्म एक वास्तविक हत्यारे के जीवन पर बनी है। कुछ बताऊंगा नही, मजा ख़त्म हो जाएगा। असाधारण नही पर हाँ! यह देखने योग्य जरूर है।

  • Sunshine : एक साइंस फिक्शन फिल्म। 'The core' याद है? अच्छी लगी तो यह भी देखें। यद्यपि मुझे देखते देखते कई जगह यह प्रतीत हुआ की फिल्म लेखक ने विज्ञान के सीधा नियमों की भी अनदेखी कर दी है। इस तरह की फिल्मों मे जो हक़ीकत का पुट लिए कल्पना होती है, वह मजेदार होती है। बहुत सारी चीजें और बेहतर हो सकती थी।
शेष फिर कभी....:)

मैं दुःखी हूँ!

IIT मे आत्महत्या होती है तो मिडिया को तो पता नही क्या हो जाता है। पिछली घटना के बाद, बहुत सारे लोगों ने बहुत शोर मचाया और संस्थान ने इन्टरनेट को इसका कारण घोषित करके हमारे इन्टरनेट के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया। शोर शराबा थम गया। छात्र चिल्लाते रहे कि इन्टरनेट इसका कारण नही है, हो भी नही सकता। लेकिन नक्कारखाने मे तूती की आवाज कौन सुने?

अभी कल फिर एक ऐसी ही दुखद घटना हो ही गयी। समाचार यहां देखें

अब सवाल ये उठता है कि क्या इससे यह साबित नहीं होता कि IIT के छात्र भी इन्सान हैं। और यह आवश्यक नही कि उनके हर कदम के पीछे संस्थान की नीतियाँ या संस्थान ही जिम्मेदार है. आख़िर निजी जिंदगी भी एक चीज है. फिर मीडिया ऐसी हर घटना को तूल क्यों देता है? संस्थान ऐसी घटनाओं के बाद छात्रों पे नयी नयी नीतियों का बोझ क्यों डालता है?

मैं दुःखी हूँ!
क्यों?
ये नही जानता!

09 August, 2007

विकास की कहानी

मेरी एक कविता की टिपण्णी पर अनिल जी ने एक बहुत ही बढ़िया लेख का लिंक दिया है। उसे पढ़कर मुझे अपने गाँव मे हुई एक बातचीत याद आ गयी। वह मैं आप सबों के साथ बाँटना चाहता हूँ।

मेरे गाँव के कुछ लोग अमरीका मे रहते हैं। किसी परिवार वाले की शादी के समय जब वो यहां भारत अपने गाँव लौटे तो पाया कि अभी भी हालत जस की तस है। वे बहुत अमीर लोग नही थे, जो मिलियन डालर डोनेट कर दें। परंतु उन्होने अपने सामर्थ्य के अनुसार मदद करने की ठानी। गाँव के कुछ लोगों को बुलाया और बातों का सिलसिला चल निकला। उन्होने कहा कि गाँव मे बहुत गंदगी है, नाली का पानी जमा हो जाता है, पीने के पानी की समस्याएं हैं तो मैं अपने पास से कुछ पैसे खर्च कर के गाँव की नालियाँ ठीक करवाना चाहता हूँ और एक दो चापाकल लगवा देता हूँ। उनका यह प्रस्ताव गाँव के बडे बुजुर्गो ने सुना। बडे ही ध्यान से सुना। और थोड़े से विचार विमर्श के बाद सब लोग एकमत हो गए।

जी हाँ! एकमत से सबने इस प्रस्ताव से इनकार कर दिया। बोले, "देखिए! अब आपको तो यहां रहना है नही, तो काहे बेकार मे ई नाली वाली के पीछे पडे हैं? हमलोगों का ऐसा ही आदत है। आउ इससे जादे फरको नहीं पड़ता है। तनी सा गोरे ना गन्दा होता है। उससे कोई दिक्कत नही है। हमारे पास इससे बड़ा समस्या है। आपको अगर कुछ करना है त वही प्रोबलेमवा सुल्झायिये!"

बिचारे विदेश से आये महानुभाव तनिक सपके। उन्हें लगा कि अमरीका मे रहते रहते उनकी बुद्धि कुंद हो गयी है है जो बड़ी समस्याओं को नही देख पा रही। सो थोड़ी उत्सुकता मे भर कर बोले, 'अजी कहिये ना! अगर मेरे वश मे होगा तो मैं जरूर मदद करूंगा।"

"देखिए! हमारे गाँव का जो मंदिर है ना...उसका बड़ा नाम है। अगल बगल के गांवों से भी लोग मंगलवार को कीर्तन के लिए आते हैं। आउ हूआं का ढोलक तनी सा खराब है। और हरमोनियमओं पुरान हो गया है। त उसी के लिए जरी मनी पैसा दे दीजिए।"

बेचारे टू-बी-सुधारक चुपचाप अपने पर्स से पैसे निकालने लगे। मगर उनके चहरे का असंतोष मुझसे नही छिप पाया। इस तरह की दो तीन और घटनाएं हैं, कभी वक्त मिला तो बताऊंगा। अभी चलता हूँ, कीर्तन करने। ;)

08 August, 2007

कार्टून फ़िल्में

एक बात मेरी समझ नही आती कि भारत मे कार्टून फ़िल्में क्यों नहीं बनती? ले दे कर एक 'हनुमान' को ही याद कर पा रहा हूँ।'Finding nemo' और 'monster Inc' जैसे उत्कृष्ट फिल्मों के बारे मे तो बात ही करना बेकार है। कोई भी ऐसी फिल्म देखने को नहीं मिलती जिसे देखकर इस बात का गर्व हो कि भारत भी इस श्रेणी मे पीछे नही।

पिछले कुछ दिनों में मैंने बहुत ही सुंदर सुंदर कार्टून फ़िल्में देखी हैं। उनके बारे मे बताना चाहूँगा।

  • Antz: चीटियों की जिंदगी, उनका दृष्टिकोण - बहुत ही मनोरंजक एवं सुन्दर परिकल्पना है। ग्राफिक्स भी उत्तम श्रेणी का है।
  • Hercules: वही पुरानी ग्रीक कहानी। ग्राफिक्स ठीक थक है पर कहानी मे ज्यादा मजा नही आया।
  • Sindbaad - legend of seven sea : अरेबियन नाइट्स :) कहानी जानते हो या फिर कहानी से अनजान हो - आनंद तो आएगा ही।
(पर हाँ! मेरी नजर मे ये तीनो औसत दर्जे की फ़िल्में थीं। इसलिये अगर आपको कार्टून फ़िल्में ज्यादापसंद नही हैं तो शुरुआत इनसे ना कीजियेगा। प्रारम्भ करने हेतु 'Finding nemo' ही देखें। )

अब कुछ बातें करते हैं कार्टून सीरीज की। 'Tom and jerry' से तो सभी परिचित होंगे। बच्चों की तो पसंदीदा सीरीज है। पर अभी भी अंग्रेजी कार्टून जापानी अनिमे की तुलना मे हल्का पड़ जाता है। जापान मे अनिमे सिर्फ बच्चों तक सीमित नही है। बडे बूढ़े भी बडे चाव से देखते हैं। अगर आपको कोशिश करनी हो तो मैं कुछ सीरीज सुझा रहा हूँ।
  • Naruto
  • One piece
  • Full metal alchemist
  • Monster
  • Death note
  • Hunter X Hunter
  • Hajimo no Ippo
  • Bleach

किसने कहा कि विकास नही?

उस दिन मैं जब रेलवे प्लेटफार्म पर
अपने पिताजी के साथ बैठा था
तो देखा -
जैसे ही एक ट्रेन रुकी,
बहुत सारे बच्चे उसमे घुस पडे
खाने के उन बचे हुए टुकड़ों को उठाने
जो यात्रिगण छोड़ गए थे -
चार लड़कों ने मिलकर
हमारे सामने ही एक पूरी पुड़ी खायी।

पिताजी ने मेरी ओर देखा
और आंखों मे तनिक वेदना भरकर बोले,
'देख विकास! इस देश का विकास ऐसे हो रहा है'

थोड़ी देर मे
दो कुत्ते आये
और जो थोड़े टुकड़े बच्चों ने
फर्श पर बिखेर दिए थे -
उनपर अपना मुहँ मारने लगे।

दूर से एक 'पागल' औरत ने यह देखा
(पागल ही तो थी!
अधनंगी होकर और कौन चल सकती है?
गरीबी भी तो पागलपन की ही एक किस्म है)
आते ही उसने कुत्तों को भगाया
और वह पौलिथिन उठा ली
एक पुड़ी का शतांश तो अब भी शेष था।
चुन चुन के उसे खाने लगी
और फिर दौड़ चली वहाँ -
जहाँ दो-तीन कुत्ते लड़ रहे थे।

इस बार मैंने पिताजी की ओर देखा
संवाद को शब्दों की आवश्यकता ना हुई।

जब मैं सोचने बैठता हूँ
तो भूत पर अचरज होता है
विकास के बाद भी ऐसा...?

अखबारों के पन्ने तो रुपये की मजबूती दिखाते हैं
और कहीँ अखबार कि रद्दी बेचकर लोग रुपये कमाते हैं।

जो मैंने देखा,
मुझे उसपर कोई विश्वास नही।
किसने कहा कि विकास नही?

थोडा ही सही,
लेकिन गरीब पूड़ी तो खाता है।
कुत्ते मारने के बाद ही सही
लेकिन मेहनत का फल तो मिल जाता है।
कचरे चुनने वाले
अब हाय क्लास पोलिमर चुनते हैं.
कीचड मे सोने वाले लोग
पक्के प्लेटफार्म पर सोते हैं.

आम जनता की ऐसी उन्नति पर किसे विश्वास नही?
किसने कहा कि विकास नही?

मेरे जैसे पागल तो
व्यर्थ ही बात का बतंगड़ बनाते हैं।
नही तो, किस देश के बच्चे
१० साल की उम्र मे पैसे कमाते हैं?

03 August, 2007

ये तेरा मुस्काना, मेरी जान ना ले ले !

ये तेरा मुस्काना,
मेरी जान ना ले ले
युगों se जिसे बचाया
वो ईमान ना ले ले
ये तेरा मुस्काना,
मेरी जान ना ले ले

दिल खोल के जो हँसती हो
क्या जाने क्या करती हो
आंखो के रस्ते सीधे
दिल मे ही जा धंसती हो

दिल मे यूं बस जाना
मेरी जान ना ले ले।
ये तेरा मुस्काना,
मेरी जान ना ले ले।


रोज सुबह जब सूरज,
तुझसे नैन मिलाये
आग तेरे अन्दर की
उसको भी झुल्साये!

कातिल ये तेरे नैन
मेरे सारे सुख चैन
अब छीनते हैं दिन रैन।
हुआ परेशान ! ओ मेरी जान!
जरा दे मुझपे थोडा ध्यान।

ये तेरा नैन उठाना,
मेरी जान ना ले ले।
ये तेरा मुस्काना,
मेरी जान ना ले ले।

सोचता हूँ कह दूं
जो मेरे दिल का है अब हाल।
मगर ये इतना कठिन सवाल...

कि तेरा ना कर जाना,
मेरी जान ना ले ले।


--
इस कविता को मेरी आवाज मे यहां सुनें

01 August, 2007

नयी फिल्म पार्टनर

एक सलाह देना चाहूँगा।

मत देखना।

और अगर ज्यादा इच्छा हो तो 'Hitch' देख लो।

क्यूंकि इस फिल्म मे कुछ भी ओरिजनल नही हैं।

"Magical Template" designed by Blogger Buster