एक फिल्म IIT के बारे me
सबसे बड़ी ख़ुशी की बात ये है कि निर्देशक को मैं जानता हूँ और हमने कई नाटकों मे एक साथ काम किया है।
This blog is about my thoughts, about the movies I watch, about the songs I listen, about the poems I write, about the people I care for and about my daily life.........!
सबसे बड़ी ख़ुशी की बात ये है कि निर्देशक को मैं जानता हूँ और हमने कई नाटकों मे एक साथ काम किया है।
आजकल बड़ी बजट की फ़िल्में बनती देख के मुझे १९९८ की फिल्म PI की याद आती है। इस फिल्म ने बहुत सारे अवार्ड्स जीते और यह एक उम्दा फिल्म है, लेकिन मैं इन बातों का जिक्र यहां नही करना चाहता। इस फिल्म की खूबी यह है कि यह मात्र ६००००$ मे बनी। और ये सारे पैसे निर्देशक ने अपने दोस्तो और परिवार के लोगों से १००$ के चंदे के रुप मे इक्कट्ठा की थी, (सबको १५०$ वापस मिले) जो इस बात का प्रमाण है कि एक सफल सिनेमा पैसे का मोहताज नही होता। और इसलिये मैं चाहता हूँ कि आप Darren Aronofsky को जानें।
इसके बाद इन्होने 'मेरे विचार मे सर्वश्रेष्ट drug फिल्म' hollywood को दिया जो कि oscar के लिए नामांकित हुई। फ़िल्मों के शौक़ीन 'requiem for a dream' से जरूर वाकिफ होंगे। अधिकांश फिल्मे ६००-७०० कट लिए होती हैं। और इस फिल्म मे २००० कट्स थे। और Darren Aronofsky ने अभिनेताओं को सेक्स के लिए ३० दिन की मनाही की थी ताकि वो 'क्रेविंग' क्या है- इसे समझ सकें। और शायद इसलिये यह फिल्म '२५ मोस्ट डंजेरस फिल्म' की लिस्ट मे स्थान बना पायी।
तीसरी फिल्म जो इन्होने बनायीं वो २००६ की 'the fountain' है। इसे देखते देखते मैं देखता ही रह गया। इतना सुन्दर ड्रामा हर रोज देखने को थोड़े ही मिलता है। इसके बारे मे मेरे पास ज्यादा कहने को कुछ है ही नही। दृश्यों की सुन्दरता का बखान शब्द कैसे करेंगे?
अगर Aronofsky की शॉर्ट फिल्मों को छोड़ दें, तो उन्होने यही तीन फ़िल्में बनायीं हैं और तीनो की तीनो फिल्म के इतिहास मे जगह पाने योग्य हैं। सो, अगर आप फिल्मों के शौक़ीन हैं और ये तीन फ़िल्में नही देखीं, तो जल्दी कीजिये।
इनके बारे मे अधिक जानकारी यहां से प्राप्त करें: http://www.imdb.com/name/nm0004716/
मैं चातक हुँ, तू बादल है
मैं लोचन हुँ, तू काजल है
मैं आँसू हुँ, तू आँचल है
मैं प्यासा, तू गँगाजल है.
तू चाहे दीवाना कह ले,
या अल्हड मस्ताना कह ले,
तू चाहे रोगी कह ले,
या मतवाला जोगी कह ले,
मैं तुझे याद करते-करते अपना भी होश भुला बैठा.
जिसने मेरा परिचय पूछा, मैं तेरा नाम बता बैठा.
बहुत दिनों के बाद कहीँ जाओ, तो परिवर्तन इस क़दर झलकने लगता है मानो शांत झील की पेंदी मे पड़ा कंकड़। इस बार घर गया तो अनेकानेक परिवर्तनों से दो चार होना पड़ा। उसका एक कारण तो सीधा है : बिहार मे सत्ता परिवर्तन। जो सड़के १८-१९ सालों से नहीं बनी थी वो बन गयीं। गांवों मे कंप्यूटर सिक्षण संस्थान खुल गए। (८ साल पहले मैं १०-१५ किलोमीटर दूर शहर जाता था)। सो, अब कुछ गाँव की लडकियां भी कीबोर्ड और माऊस का मतलब समझने लगी हैं।
परंतु मुझे इन सारी चीजों को लिखने मे कोई रूचि नही है। क्यूंकि मैं यह नही चाहता कि लोग मुझपर वर्तमान सरकार के पिछलग्गू होने का आरोप लगा दें। राजनीति से तटस्थ रहना चाहता हूँ। सो इस बात का भी जिक्र नही करूंगा कि पटना मे भी शोपिंग मॉल्स खुलने लगे हैं। और वैसे भी इन सारे विषयों मे चिन्तन का स्कोप नही है। :)
मेरे पापा पुराने गानों के शौक़ीन हैं। हर रात विविध भारती का छाया गीत घर में छाया रहता था। पर इस बार जब मैंने रेडियो को विविध भारती पर ट्यून किया तो वो भड़क उठे। बोले, 'बोर मत करो यार। मिर्ची लगाओ। क्यूंकि मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश।' अब इस ओल्वेज खुश प्रवृति देखकर मुझे आश्चर्य तो हुआ परंतु मैं तर्क करके उनके मूड को खराब नही करना चाहता था। अतएव मैंने धीरे धीरे उनके इस परिवर्तन का कारण जानना चाहा। यूनुस जी! ध्यान दें!
पापा ने कहा कि पहली बात कि मिर्ची मे घर्र घर्र नही होता। एकदम किलियर आवाज। और फिर अनाउनसर भी एक रीजन है।
'क्या कह रहे हैं? यूनुस जी की आवाज तो...'
'अरे मैं जानता हूँ। उनकी आवाज बहुत अच्छी है। लेकिन वो बंधे हुए लोग हैं। बिंदास नही बोलते। रोबोट की तरह बोले जाते हैं। अभी 'शिप्रा' को देखो। बेटा! बोलने का अंदाज बड़ी चीज है। विविध भारती और मिर्ची मे यही अंतर है कि मिर्ची वाले की आवाज मे गम्भीरता नही एक चुलबुलापन है। जो ज्यादा आनंद देता है। और फिर.......(सस्पेंस बनाते हुए)मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश! '
यह कहके वो हँसने लगे और मैंने मन ही मन सोचा कि जब पापा जैसे फैन मिर्ची अपना रहे हैं तो बाकियों का क्या? जितने दिन घर पर रहा कभी किसी ने मिर्ची के अलावा कुछ और नही सुनने दिया। और मेरे पडोसियों का भी यही हाल था। लोकल ट्रेन के डब्बों मे भी कुछ लोगों को बहस करते सुना। और अंततः ये विचार वहाँ भी सर्वसम्मति से पारित हुआ की मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश।
आह केतना कम्पटीशन है! बजवो सुने के पहिले हेतना नौटंकी। जैसे केबल वालों ने दूरदर्शन भगाया अब ये मिर्ची वाले कहीँ....! राम बचावे!
आजकल मैं थोडा व्यस्त हूँ अतः कहीँ ना तो ब्लोग पढ़ पा रहा हूँ और ना ही लिख पा रहा हूँ। कुछ दिनों की ही बात है, थोडा और वक़्त है जो आप सब हसी ख़ुशी काट लें। कल जाने क्या होगा क्या पता...क्या खबर?
इस बीच मेरी आवाज मे सीमा जी की एक बहुत ही प्यारी रचना सुनें। और हाँ...सदा की तरह टिपियाते रहें।
http://hindyugm.mypodcast.com/2007/07/post-30430.html
गरीबों को टिपियाओ, वो तुम्हारी टिपियायेगा...तुम एक टिपण्णी दोगे वो.....(जो भी देगा आप रख लें, चिल्ला के गाने की जरूरत नही)
दंगा फसाद और हिंदु मुस्लिम के झगडों से अगर कभी फुर्सत मिले तो इस लिंक को जरूर देखियेगा।
http://www।ibnlive.com/news/bihar-girl-passes-iit-entrance-loses-seat-for-money/45529-3.html
और फिर कहिये कि ज्वलंत समस्या क्या है?
आज पहली बार मैंने हिंद-युग्म के पोडकास्ट पर अपना स्वर प्रकाशित किया है। कृप्या सुनें और टिप्पनिओं द्वारा मार्गदर्शन करें।
लिंक: http://hindyugm.mypodcast.com/2007/07/post-29440.html
रे मच्छर!
क्या तुम्हारी बुद्धि भी
तुम्हारे आकार के अनुकूल है?
जिसे तुम अपनी जीविका समझते हो
वो तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है।
तू अमृत के धोखे मे
विषपान कर रहा है।
तू मनुष्य को नही
वरन मनुष्य तुझे नुकसान कर रहा है।
आख़िर मनुष्य का ख़ून है
कभी ना कभी तो असर दिखायेगा।
फिर तुम्हारे दिल से भी
ख़ून के रिश्तों का अर्थ मिट जाएगा।
और शायद एक दिन अपने बेटे,
अपने भाई या अपने बाप का ख़ून
तेरे भी होंठों पर चमकता नजर आएगा।
लेबल: मेरी कविताएँ ♦टिप्पणियाँ (6)
मैं जानता हूँ कि मेरे ब्लोग पर आने वाले अधिकांश जन अ-हसीं हैं परंतु फिर भी मैंने अपने शीर्षक को ऐसा नाम दिया है। सो, सेंसिटिव किसम के लोगों से क्षमायाचना करता हूँ। (वैसे आजकल मांगने से कहॉ कुछ मिलता है? मैं तो बस थोडा सा फोर्मल हो रहा था।)
बहुत दिनों बाद कुछ दिनों के लिए घर गया था। काफी अच्छा लगा और एक बार फिर जमीनी हकीकत से रूबरू होने का मौका मिला, जो कॉलेज मे नहीं मिलता। इस संबंध मे कभी डिटेल में लिखूंगा। अभी अभी आया हूँ, यात्रा कि थकान उतर जाये, फिर क्या...??? आपको बोर करने का तो ठेका हम लिए ही बैठे हैं।
बहुत लोगों के पोस्ट्स नहीं पढ़ पाया, लेकिन अब वो सारी कमी पूरी करूंगा। सो, मेरी अनुपस्थिति का बदला मेरे ब्लोग से ना लें। :)
पुणे से लौटने के बाद मैंने बहुत सारी फ़िल्में देखीं। देशी विदेशी तकरीबन १२-१३ तो देख ही ली होंगी। हाल फिलहाल की सारी फ़िल्में देखने के बाद मुझे ऐसा डर लग रहा है की अपना बौलीवुड मच्योर हो रहा है। हालांकि अभी भी 'आपका शुरूर' जैसी चीजें हैं परंतु एक नयी तरह की फिल्मों का दौर आ चुका है, जिसपे आने वाला समय नाज कर सकता है।
मैं फिल्मों का विशेषज्ञ नहीं, बस अपने मन की बात कह रहा हूँ। 'Being Cyrus' देखने के बाद भी मुझे ऐसी ही कुछ अनुभूति हुई थी। यद्यपि वह फिल्म नही चली लेकिन मुझे पुरा विश्वास हो गया की अब हमारे यहां भी वर्ल्ड क्लास सिनेमा बन सकता है। 'लाइफ इन अ मेट्रो' की बात नही करूंगा! कम बजट वाली bhejaa fry को भी मैं कुछ नही कहता। दोनों फ़िल्में अच्छी थी, थोड़ी चली भी। लेकिन 'Music and Lyrics', 'The Holiday', 'Little miss sunshine', 'Prestige', 'The Illusionist जैसी तो नही थीं।
जिन फ़िल्मों ने मुझे रिझाया, उन्होने खासा बिजनेस किया हो तो मुझे नहीं पता। लेकिन एक बात जरूर है की इन्पे नयापन कूट कूट के भरा था। कुछ बताऊंगा नही। जिन्हे देखना हो देख लें। The Namesake और स्वामी।
नॉट: हलकी फुलकी फ़िल्में पसंद करने वाले इसे ना देखें। बोर हो जायेंगे।
मैंने यह गीत कुछ दिनों पहले लिखा था। मुम्बई वापस आने के बाद आज सोचा की आज इस गीत को गाकर ही सुना दूं। सावधान! मुझे गाना नही आता और ना ही मेरे पास कोई रिकॉर्डिंग स्टूडियो है इसलिये ज्यादा उम्मीद ना करें. यह गाना मजाक मे लिखा गया था. अपने कमेंट्स जरूर दें। अपना टेबल बजा के मैं ही गा रहा हूँ।
बोल यहां हैं : http://vikashkablog.blogspot.com/2007/05/blog-post_26.html
और गीत यहां: http://vikash.mypodcast.com/2007/07/post-25886.html