29 June, 2007
पुणे का अन्तिम दिन
आज मेरा इन्टर्नशिप समाप्त हुआ और इसी के साथ साथ पुणे प्रवास भी। कल मैं वापस मुम्बई चला जाऊँगा। ना जाने क्यों मैं आई.आई.टी मे रहने को प्रवास क्यों नही कह पाता। शायद उस जगह का अपनत्व मेरे घर से बहुत ज्यादा है। ११-१२ साल हो गए मुझे घर से बाहर रहते हुए। शुरुवाती कुछ दिनों को छोड़ दें, तो मैंने अपने घर को कभी मिस नही किया। लेकिन जहाँ पढता रहा हूँ, उस जगह को तो...:)
कुल मिलाकर कहें तो यहां आना मेरे लिए काफी हद्द तक सफल रहा है। जिंदगी मे एक नया आयाम भी जुडा। यहां आने के पहले मैंने कभी सपने मे भी नहीं सोचा था कि मैं कभी अनुसंधान की तरफ आकर्षित हो सकता हूँ। लेकिन पिछले दो महीनों मे इतना ज्यादा बदलाव आया कि क्या कहूं। इसका श्रेय तो निःसंदेह मेरे गाइड को ही जाता है। किशलय सर से मिलने के पहले, मेरे मन में ना जाने कितने तरह के डर थे। अब वो समूचा डर सम्मान की एक अनोखी अनुभूति मे परिवर्तित हो गया है, जिसका श्रेय स्वयम उनको जाता है।
उनके अलावा धनंजय सर, राहुल सर, रागिनी मैम, क्षमा मैम - सबके साथ कितनी सुखद स्मृतियां संजोयी, ये वर्णनातीत है। सो, उसका वर्णन करने की व्यर्थ चेष्टा ना करूंगा।
अरे रुको! ऊब गया हूँ तुमसे
अरे रुको!
ऊब गया हूँ तुमसे
रोज रोज चले आते हो
मेरी कविताओं मे
रुदन, विरह और प्रेम ढूँढने
क्या सारे जहाँ में
इन सबका ठेका मैंने ही ले रखा है?
इस तरह तो तुम
मेरी अन्य भावनाओं को मार डालोगे।
हाँ!
अभी सही शब्द मिला
'हत्यारे' हो तुम लोग।
मुझे भी शौक़ है
कुछ विचारोत्तेजक लिखने का
मेरी लेखनी भी
तुम्हारे अनेकानेक वादों पर
अभिव्यक्त होना चाहती है।
(अब 'वादों' में प्रीत के वादे मत ढूँढो!
मैं छायावाद जैसे अपवादों की बात कह रहा हूँ।)
मेरी लेखनी भी भिक्षुक की टीस
और पत्थर तोड़ती नारी की वेदना
लिखने को मचलती है।
मेरी कल्पना की उड़ान भी
हिमालय को बांधना चाहती है.
कर्ण एवं उर्मिला जैसे
अपेक्षाकृत उपेक्षित पात्रों पर
महाकाव्य उडेलना चाहती है।
कब तक?
आख़िर कब तक
मैं विरहाग्नि को शब्द देता फिरूंगा...?
प्रेम की जमीन से उठकर
गन्दी बस्तियों मे जाना है मुझे।
(वैसे आजकल तो प्रेम की जमीन पर भी
गन्दी बस्तियां बसने लगी हैं)
सो रुको!
तनिक रुको!
और मेरे संग गन्दी बस्तियों मे चलो।
जो बारिश की बूँदें
मेरे शब्दों मे प्रीतम की प्यास बनकर आती थी
अब वो छतों से टपकती मुफलिसी मे समाती है।
अब देखो
मेघदूत केवल प्रीत के संदेशे नही
नालीयों की सड़ांध भी लाते हैं।
ना ना!
नाक पर रुमाल रखने की जरूरत नही
जहाँ पहनने के लिए कपडे नही
वहाँ रुमाल भी एक विलास है.
(इतनी सी बात तुम्हारी समझ क्यों नही आती?)
क्यों?
अब बोलो?
प्रेम का नीर नही
आलोचना का सागर दूंगा तुम्हे।
क्या अब भी साहस है मेरे पास आने का...?
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आज मन को...
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आज भी

आज भी
किसी झरोखे से
तुम्हारे नाम की हवा
तुम्हारी खुशबु लिए
मेरे कमरे में चली आती है।
तुम्हारी दी हुई चादर
कितनी भी लपेटूं
मेरी हड्डियों में सिहरन
फिर भी समाती है।
टूटी यादों मे
मेरा विश्वास
(ना जाने क्यों)
आज तक
अक्षुण्ण है
बिस्तर की सिलवटें
मेरे सुलझाए नहीं सुलझती
तकिये की 'जगह' पर भी
मेरा नियंत्रण सुन्न है
उन्हें भी
तुम्हारे ही हाथ चाहिऐ
उन्हें भी
तुम्हारा ही साथ चाहिऐ
अभी आज ही तो,
मेरे कमरे मे आने वाला कबूतर
तुम्हारा नाम ले कर रो रहा था।
अभी आज ही तो,
खिड़की का कांच
अपनी आँखें खोलें सो रहा था।
इस कमरे की दीवाल
की चीख
मेरे परदे फाड़ रही है
मेरे आलमारी के
एक कोने मे दबी
फोटुओं की अल्बम
मेरी ओर
हिकारत से देखती
मेरी निगाह शर्म से गाड़ रही है।
उन्हें भी
तुम्हारी एक निगाह चाहिऐ
उन्हें भी
तुम्हारी ही चाह चाहिऐ
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26 June, 2007
दो! आज मैं माँग रहा हूँ।
दो! आज मैं माँग रहा हूँ।
आज खड़ा है भिक्षुक दर पे
मन का थोडा विश्वास तो दे दो
नीर मिले या दुर्गम मरुथल
पर प्रीतम, वो प्यास तो दे दो।
तेरे हिय से लिपट लिपट कर
काँधे से तेरे चिपट चिपट कर
रो लूँगा दो आंसू मैं भी
पर प्रीतम, अहसास तो दे दो।
स्वाद कौन हो, ये कब बोला?
लालच का कोई पात्र ना खोला
जो भी बोला, दिल से बोला
इस दिल में कोई आस तो दे दो!
आज कहा है अब ना कहूँगा
तेरे बिन ना स्वप्न बुनूंगा
प्रेम थोडा फीका तेरे बिन
तुम थोड़ी सी मिठास तो दे दो.
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अनुत्तरित प्रश्न
नोट: ये पंक्तियां मैंने पिछले साल एक नाटक 'अस्तित्त्व' के लिए लिखी थी। कविता बहुत बड़ी है इसलिये केवल पहला पारा दे रहा हूँ ताकि यहां आने वाले लोग ऊबें नही। :D
एक प्रश्न
अनुत्तरित!
कोशिश की है सबने
मैंने, तुमने, हमने
कि ढूँढ ले उत्तर
अपने अस्तित्त्व का.
पर साक्षी है इतिहास.
प्रश्न - प्रश्न ही रहा.
कस्तूरी-मृग की तरह
हम ढूंढते रहे
अपनी ही नाभि मे छुपे उत्तर को.
दौड़ते रहे
अनवरत
युगों तक.
इसी प्रश्न के उत्तर की आकांक्षा मे.
और फिर हमने
वो प्रश्न ही खो दिया.
अब प्रश्न यह है…
कि प्रश्न क्या है?
अब प्रश्न यह है…
कि प्रश्न कि जरूरत क्या है?
अब प्रश्न यह है…
कि क्या हमे किसी प्रश्न का उत्तर चाहिऐ?
अब प्रश्न यह है…
कि महत्वपूर्ण क्या है…??
प्रश्न या उत्तर.
प्रश्न यह है कि वास्तविक क्या है…???
प्रश्न का अस्तित्त्व
या अस्तित्त्व का प्रश्न…???
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25 June, 2007
दो मिनट में कविता, उपन्यास, समीक्षा एवं व्यंग्य लिखना सीखें
कविता, उपन्यास, समीक्षा एवं व्यंग्य निम्नानुसार लिखें:
- कविता
- उपन्यास
- समीक्षा
- व्यंग्य
जितनी बार दुहारायेंगे, हस्तलिपि उतनी ही सुंदर बन पडेगी। वैसे सुन्दर हस्तलिपि 'बेकार' लोगों की पहचान है। बडे बडे लोग अत्यधिक व्यस्त होने के कारण 'मच्छरों' जैसा ही लिखते हैं। सो अगर हस्तलिपि अच्छी ना बन पडे तो कोई दिक्कत नही, लोग समझ लेंगे कि आप बडे 'बीजी' इन्सान है। वैसे भी आपकी व्यस्तता का इससे अच्छा प्रमाण क्या दूं कि आप दो मिनट मे इतना कुछ सीखने आये हैं। :)
कल्पना का आकाश
तुमने कहा -
".... अपरिचित फिर भी चिर परिचित से तुम
बिल्कुल मेरी कल्पना के आकाश की तरह...."
और मैं सकुचा गया
अपनी क्षुद्रता से।
मेरा 'अपरिचित' होना
मुझे भी सालता है।
और 'चिर-परिचित' की संज्ञा
मेरे ह्रदय को भी गुदगुदाती है।
तुम्हारा,
मुझे 'कल्पना' समझना
एक टीस सा पहूँचाता है ह्रदय को।
और मैं सकुचा जाता हूँ
अपनी क्षुद्रता से,
जिसका अहसास तुम दिलाती हो
मुझे 'आकाश' कह कर।
पर एक बात का गर्व है
कि अगर बिंधा भी तो
मेरे जैसा तुच्छ पुष्प
तुम्हारी कविताओं की माला मे बिंधा है।
लेबल: मेरी कविताएँ ♦टिप्पणियाँ (4)
23 June, 2007
मेरी आवाज सुनो
आज कुछ लिखने की इच्छा नही थी और इत्तेफाक से साइबर कैफे मे माइक था। तो बहुत दिनों के बाद मैंने अपनी आवाज रेकॉर्ड की है। :)
यहाँ सुनें: http://vikash.mypodcast.com/2007/06/post-24457.html
यहाँ भी : http://vikash.mypodcast.com/2007/06/post-24459.html
22 June, 2007
बदलाव : एक पुरानी क्षणिका
वो कहती थी कि वो
मेरा मौन भी समझ जाती है
और मैं कहता था कि मुझे
उसकी बातें भी समझ नही आती हैं।
आज वक़्त के बदलने की गति पर अचरज कर रहा हूँ।
वह शब्द भी नही समझती, मैं मौन भी समझ रहा हूँ।
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झील
मैं आजतक खड़ा हूँ,
उसी झील के किनारे
जिसके प्रतिबिम्ब में
हमारी छवियाँ साथ दिखती थी।
अच्छा है - झील सूखी है।
कम से कम झील को
इस बात का अहसास तो ना हुआ
कि प्रतिबिम्ब अब टुकड़ों मे बँटा है।
डरता हूँ -
बरसात आ गयी है।
झील मे फिर पानी आ ही जाएगा।
खुद को तो अब तक समझा ना पाया
फिर झील के आंसुओं को कौन रोकेगा?
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21 June, 2007
नैराश्य की पराकाष्ठा
जब जब मैं कोशिश करता हूं
किसी बदलाव के क्रियान्वयन की,
मुझे अपनी क्षुद्रता का अहसास होता है।
अहसास होता है कि मनुष्य,
चाहे कितना भी बड़ा हो जाये,
नियति के लेख को नही मिटा सकता।
अहसास होता है कि मानव
प्रारब्ध के हाथों की कठपुतली मात्र है।
कृष्ण ने गीता मे कहा,
"कर्म किये जा फल की चिंता मत कर"।
वो वस्तुतः हमें कर्म की महानता नही
मनुष्य की असमर्थता सिखा रहे थे।
' तू आमरण कर्म किये जा!
फिर भी फल की आशा मत कर।'
नैराश्य की पराकाष्ठा और क्या है?
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20 June, 2007
री प्रियतम!
री प्रियतम!
तेरे ख्यालों ने मेरी नींद छीनी है
तेरी खामोशी ने बींधा है मुझे
तेरी दुरी मुझे मार रही है
तेरे विचारों से मेरी चेतना हार रही है।
री प्रियतम!
मेरे मनुष्य होने की इतनी बड़ी सजा ना दो।
मेरी मजबूरियों पर बसे महल
क्या तुम्हे शोभा देंगे?
अपनी भारी पृष्ठभूमि का बोझ
कब तक ढोवोगी?
क्या कभी तुम्हारे कंधे
इस बोझ से थक ना जायेंगे?
री प्रियतम!
कब तक प्रेम को हराती रहोगी
चमक-दमक के हाथों।
कब तक प्रेम को
सोने के चप्पलों से कुचला जाएगा?
कब तक धर्म का भाव
'भावों' पर हावी होगा?
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19 June, 2007
एक घोषणा मेरी भी
जी नही! मुझे और भी काम हैं! परंतु कभी कभी खाली बैठने के बदले ये कर लिया करता हूँ। और आप यदि मेरे इस पृष्ठ पर हैं तो इसका तात्पर्य है कि आपके पासभी तनिक खाली समय तो है ही। ('समय तो कभी खाली हो ही नही सकता'-दर्शन शास्त्री दूर रहें।)
आजकल घोषणाओं का बाजार बड़ा गर्म है। (कृप्या 'बाजार' शब्द मे राजनीति ना ढूंढें) तो मैंने सोचा कि लगे हाथों मैं भी एक घोषणा कर ही डालूँ। तो घोषणा निम्नानुसार है:
एतद द्वारा मैं विकास, आज १९ जून २००७ को, स्वयम को चिटठा जगत का प्रथम ई-उपन्यासकार घोषित करता हूँ। और उन सभी लोगों कि घोषणाओं का समर्थन करता हूँ जो मेरी घोषणा का समर्थन करते हैं और उन सभी का विरोध करता हूँ जो इस बात का विरोध करते हैं।
आप अपनी सहमती या असहमति 'टिपण्णी' के तौर पर दर्ज कर सकते हैं। और खबरदार! टिपण्णी लिखना ना भूलें...क्यूंकि,
समर शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध।
और हाँ! मैंने अपने उपन्यास मे नया पृष्ट जोडा है। चटका निम्न जगहों पर लगाएँ :
18 June, 2007
अनुभव
आज अचानक बैठे बैठे सोचने लगा-
कि अनुभवी कौन है?
वे लोग,
जो मीलों अपनी लक्ष्य की तरफ दौड़ते हैं?
या वो रास्ता
जो चुपचाप थिर होके सबकी दौड़ देखता है?
कि किसका अनुभव गहरा है?
अनंत जल वाले उस सागर का
जिसमे अनगिन नदियों के पसीने हैं?
या उस बिलखती नदी का
जो पहाड़, पठार और मैदानों को नापती
शून्य से उभरकर अनंत मे विलीन हो जाती है?
कि किसके अनुभव से सीखूं?
गर्वोन्नत ग्रीवा वाले अलंघ्य हिमालय से
जहाँ शिव जैसे देवता ही वास कर सकते हैं।
या फिर उस बंजर धरती से
जो अपनी छाती पर
बेबस किसान के नुकीले हल का घाव सहलाती है
और फिर भी लहलहाती है।
कि किसका अनुगामी बनूँ?
उस वृद्ध का जिसने जीवन के सौ साल जिए हैं
या उन युवकों का
जिन्होंने बीस सालों मे
चालीस घाटों के पानी पिए हैं?
लेबल: मेरी कविताएँ ♦टिप्पणियाँ (5)
17 June, 2007
आज फिर
आज फिर ये दिल खिला है
आज फिर जो तू मिला है
आज फिर मुस्कान बिखरी
आज फिर वही सिलसिला है।
आज फिर तेरे साथ हूँ मैं
आज फिर जुड़ गए वो धागे
आज फिर अरमा हैं महके
आज फिर जज्बात जागें
लेबल: मेरी कविताएँ ♦टिप्पणियाँ (3)
16 June, 2007
मेरे उपन्यास का नया पृष्ठ
धन्यवाद सहित,
विकास
15 June, 2007
आधुनिक कबीर के दोहे
कबीरा खड़ा बाजार में, लिए ताश का जोकर!
जा सब में मिल जात है, परिचय अपना खोकर!!
हुकुम, पान या ईंट है, जो सब कुछ बिसराये!
जाके संग मिल जाये है, ता का ही होई जाये!!
रे दंगो में लड़ने वालों, कहत कबीरा सुन लो..!
फ़ेंक के सब हथियार हाथ के, ताश के पत्ते चुन लो!!
कबीरा संगति ताश की, ह्त्या और घृणा घटाये!
क्रिकेट हटाओ, पाक संग एक ताश मैच हो जाये!!
लेबल: मेरी कविताएँ ♦टिप्पणियाँ (8)
मेरा ई-उपन्यास
जी हाँ! मैं अब साधारण इन्सान नही रहा। बेकार हो गया हूँ। बहुत दिनों से सोचते सोचते अंततः लिखना प्रारम्भ कर ही दिया।
वैसे यह मेरी पहली कोशिश नही है। ४थी या ५वी कक्षा मे खत्री साहब की 'चंद्रकांता संतति' पढने के उपरांत मैंने अपने एक उपन्यास का प्रारम्भ किया था। परंतु गलती से वह घर मे किसी के हाथ आ गया। और मेरे अन्दर का उभरता साहित्यकार हास्य का एक विषय मात्र बन कर रह गया। बाद मे भी कई बार कोशिश करने की कोशिश की परंतु वक़्त कि कमी, दुसरे अन्य कार्यों की महत्ता के कारण कुछ ना कर सका। और फिर कहीँ ना कहीँ अपने बचपन के साहित्य की दुर्दशा का भय भी था।
लेकिन कहते हैं ना कि 'एभेरी डौग हैज हिज डे', तो मेरा भी दिन आ ही गया। जी नही! ऐसा नही है कि मेरा साहित्य परिष्कृत हो गया है। वरन मेरी खाल मोटी हों गयी है। कहो, कहते रहो! अब कोई फर्क नही पड़ता। हँसो, जी खोल के हँसो! मैं बाज थोड़े ही ना आऊंगा।
कुछ पन्ने लिख चुका हूँ। जल्दी से पढ़ लीजिये! कहीँ बाद मे बुक स्टौल से खरीदने की नौबत ना आ जाये। और फिर पता नही स्टॉक हो भी या नही।
आगे लिख रहा हूँ। नए पन्ने कि खबर अपने ब्लोग पे तो डालूँगा ही। अगर आपसे इंतज़ार नही होता तो अपना ई-पता उन पन्नो के दांये हाशिये पर डाल दें। (जाईये तो जगह दिख जाएगा) जैसे ही लिखूंगा आपको ई-मेल चला जाएगा। और हाँ! वहाँ सबसे ज्यादा टिपियाने वाले को मेरी पुस्तक मुफ़्त इनाम दी जायेगी।
14 June, 2007
ईंट
कल रात
एक डरावना सपना देखा।
देखा
कि मैं ईंट हो गया हूँ।
और मन मे एक डर
निरंतर मकान बना रहा है
कि पता नही मेरा उपयोग
किसी के घर मे हो
या किसी के सर पे
कि पता नहीं मैं
कंगूरे पर चमकूंगा
या फिर नींव के अन्धकार मे
दफ़न हो जाऊँगा।
डर से पसीने पसीने हो गया
तब जाके नींद खुली।
एक सपने ने दृष्टिकोण बदल डाला।
अब सोचता हूँ तो लगता है
कि ईंट होना कितना मुश्किल है।
कि ईंट के माथे भी
कितनी जिम्मेदारियों का बोझ है।
कि हर चमकती ईंट को चमकाने मे
ना जाने कितनी ईंटों ने
समर्पण किया है।
ना जाने कितनी ईंटों ने
नींव का सतत अन्धकार स्वीकार किया है।
फिर सोचता हूँ
कि शायद वह सपना सच्चा ही था।
ईंट ही तो हूँ मैं।
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राजनीति मे हिंदी कही खो ना जाये
जिस दिन गूगल ने हिंदी मे ब्लोगिन्ग की शुरुआत की उस दिन मैं बहुत खुश हुआ। पहले यदा-कदा हिंदी लिखा करता था, सोचा अब अक्सर लिखा करूंगा। और धीरे धीरे ज्ञात हुआ कि बहुत सारे लोग हिंदी ब्लोगिन्ग से जुडे हैं। धीरे धीरे कुछ मित्र भी बने। फिर एक दिन नारद से भी जुडना हुआ।
मैं ठहरा अज्ञानी। मुझे लगता था कि हिंदी ब्लोगिन्ग का उद्देश्य हिंदी को बढावा देना है। हिंदी साहित्य के प्रति मेरी अगाध श्रध्दा, कुछ प्रतिष्ठित कुछ नवोदित लेखकों, कवियों की रचनायें पढने का लालच; मुझे उकसाता गया, उकसाता गया। परंतु अब निगाह फेरता हूँ तो पाता हूँ कि कई सम्माननीय लेखकों के बीच दुराव आ रहा है। हिंदी साहित्य केवल पत्रकारिता तो नही है ना? फिर हर कोई पत्रकार क्यों बनना चाहता है? कई जगहों पर धर्मनिरपेक्ष, साम्यवाद, लोकतंत्र और हिटलर का वर्णन सुन रहा हूँ। माना कि यह भी एक अहम हिस्सा है परंतु क्या साहित्य केवल राजनीति के बूते उंचा उठ सकता है?
अभी अभी कई ऐसे पोस्ट पढे जिससे ज्ञात हुआ कि नारद से अशिष्ट भाषा के इस्तेमाल के चलते एक ब्लोग हटा दिया गया। इस बात के पक्ष और विपक्ष मे कई लोग गरमा गरम बहस कर रहे हैं। अच्छा कर रहे हैं - तर्क तो होना ही चाहिऐ। लेकिन क्या इससे आपसी मनमुटाव नही बढ रहा???
अब यदि किसी की भाषा निंदनीय है तो उसकी निंदा कीजिये ना? उसका सिर कलम थोड़े ही कर दीजियेगा? अब कुछ लोग कुछ भी लिखने से पहले डरेंगे कि नही? अपनी बात करूं, तो मैं कभी कभी किसी ब्लोग पर जाके टिपण्णी कर दिया करता था। अब अगर मेरी कोई बात आपको अखरे और आप मेरी निंदा करें तब तक तो ठीक, लेकिन मुझे मारें पर उतारू हो जाये तो क्यों कहूँगा कुछ? कमजोर तो चुप हो ही जायेगा ना?
सारांश यह कि भाषा का सही प्रयोग हर इन्सान की नैतिक जिम्मेदारी है और जो भी नैतिकता भंग करेगा, मैं उसका विरोध तो करूंगा ही। परंतु साथ ही साथ ऎसी हर कोशिश का विरोध करना भी अनिवार्य है जो किसी की आवाज दबा दे। होना यह चाहिऐ था कि हर इन्सान जो अभद्र भाषा पढे, उसकी भर्त्सना कर दे। खुद ब खुद लेखक को सबके दिल की बात पता चल जाती। परंतु किसी की आवाज को एक मंच से हटा देने से क्या अनैतिकता की आवाज दब जायेगी? अरे! यह तो जिम्मेदारियों से भागने वाली बात हुई। रहने दीजिए उस आवाज को भी और उन्हें शिष्टता सिखायिये। अपने कान बंद कर लेने से गालियाँ खतम नही होती।
आदमी शर्म से तो शायद बदल भी जाये परंतु इस तरह के बहिष्कार से विरोध और मुखर हो उठता है यह जानने के लिए विद्वान् होने की आवश्यकता तो है नहीं। क्या होगा किसी ब्लोग को हटाने से? कुछ और लोग ब्लोग हटा लेंगे और फिर गाली गलौज के नए कीर्तिमान बनेंगे। यह सब क्या किसी भी तरह से हिंदी-सेवा होगी?
सो हे महानुभावों! इस बालक की इस 'छोटा मुह, बड़ी बात' वाली चेतावनी सुनें। मुझे डर है कि इस तरह की राजनीति मे हमारी हिंदी कहीँ खो ना जाये।
13 June, 2007
आईना
खुद को पहचाना...
तो जाना
कि आजकल
आईने ने भी
झूठ बोलना सीख लिया है.
खुद को जाना...
तो पहचाना
कि आईना
हर पल
अपने प्रतिबिम्ब मे क्यों झांकता है.
लेबल: मेरी कविताएँ ♦टिप्पणियाँ (6)
06 June, 2007
कल का लंच, वो रेस्टोरेंट और वो लडकी...!
भूख नही थी, पर मित्र का साथ निभाने गया था।
२ का कोई टेबल नही, ४ का भी कोई खाली ना था
तो ठाठ से ६ वाले टेबल पर बैठे, कोई सवाली ना था
थोड़ी देर मे, दो और लोग उसी टेबल पर आ गए
क्षण भर के उपरांत एक महाशय और पसरा गए
मेरे दोस्त की भृकुटी चढ़ी, मेरा भी भेजा गरमाया
जगह बदलने की सोची, अन्य जगहों पर नजर फिराया
बहुत भीड़ थी, पर एक कोने मे लडकी अकेली थी
ना कोई सखा था साथ मे, ना कोई सहेली थी।
हमने सोचा कि ये तो घोर अपराध व अन्याय है,
चार के टेबल पर अकेली लडकी और एक कप चाय है
मैं गया, विनम्रता से पूछा 'मे आई सिट हियर?'
वो बोली, 'या सिओर'। नो हेजिटेशन, नो फियर।
बैठते ही मैंने धीरे धीरे बातें आगे बधायी
इस रेस्टोरेंट मे इतनी भीड़ क्यों है आई?
उसने कहा, "पहली बार आये हैं? हमेशा ऐसा ही रहता है।
सस्ता और स्वादिष्ट खाना इस इलाके मे सिर्फ यहीं मिलता है।
मैं खुद पिछले तीन दिन मे तीन अलग अलग 'दोसे' खा चुकी हूँ।
अपनी कम्पनी के कैंटीन से ऊब कर इसे अपना चुकी हूँ. "
फिर मेरा दोस्त तन्दूरी नान और मैं बातें खाने लगा
पूरनमासी के चांद पर बादल बन बन छाने लगा
फिर क्या खाया और क्या पीया, यह तो कुछ भी याद नहीं
पर इश्क मे उस कन्या के यारों, हो गए हम बरबाद वहीं
यूं कहिये की कल मेरे लंच मे सबकुछ अनुकूल गया
लेकिन एक गड़बड़ हो गई, उसका नंबर लेना भूल गया
आज हम पुनः उसी रेस्टोरेंट मे जाने वाले हैं
और तंदूरी नान की जगह 'दोसा' खाने वाले हैं।
लेबल: मेरी कविताएँ ♦टिप्पणियाँ (8)
05 June, 2007
सुपर ३० बंद - इतना विवाद क्यों?
closure of Super 30 -II
हर इन्सान अपनी जिम्मेवारी स्वयम ही निर्धारित करता है, इसमे कोई संदेह नही। और फिर मैं यह भी नहीं मानता कि नैतिकता का कोई भी पाठयक्रम हमारे विवेक व अंतःकरण को संशोधित कर सकता है। सुपर ३० निःसंदेह अपने आप मे एक उदाहरण है। परंतु जब तक 'नेकी कर और दरिया मे डाल' वाला दर्शन ना अपनाएँगे तब तक किसी ना किसी तरह उनके इस पावन प्रयास को कोई ना कोई अपवित्र करता ही रहेगा।
आग्रह पत्र : अभ्यानंद जी और अनंद कुमार जी के लिए.
सिंगल होने का सबसे बड़ा घाटा
यदि आप सिंगल हैं तो यदा कदा दोस्त लोग आपके वेतन के पैसे उधार ले लेंगे- ये कहके कि यार तू तो सिंगल है, तेरा कोई खर्च नही। और ये कहके वापस नही देंगे कि - 'यार! समझा कर। डब्ल हूँ। खर्चा ज्यादा है। बाद मे ले लियो। (और मन मे बोलेंगे कि 'तू कैसे समझेगा, तू तो सिंगल है')। लेकिन धन तो धूल है। मैं किसी भौतिक घाटे को घाटा कदापि ना कहूँगा। यहाँ मैं जिस घाटे की बात कर रहा हूँ, वो मानसिक है। अब आप भी सोचेंगे कि लड़का सठिया गया है। घाटा मानसिक कैसे? तो वो ऐसे कि अगर गलती से आपने प्रेम कविता लिखी, तो कोई आपको उसका क्रेडिट नहीं देगा। बल्कि किसी 'प्रेरणा' को उसका क्रेडिट दिया जाएगा। विश्वास नही होता तो मेरी पिछली पोस्ट देख लें। ;) ये तो अन्याय हुआ ना जी? आख़िर भेजा हम खत्काएं, शब्द-कोशों के पन्ने पलट पलट के क्लिष्ट शब्द हम जोडें, अन्य (थोड़े कम फेमस) कवियों कि पंक्तियों से 'प्रेरणा' हम लें और क्रेडिट मिल जाये किसी काल्पनिक प्रेरणा को? घोर कलियुग है भाई!
04 June, 2007
कल तुमसे बातें करके
कल तुमसे बातें करके
ऐसा लगा मानो
जिंदगी एक पल के लिए ठहर गयी है।
मेरा अस्तित्व
कहीं खो गया है।
शायद किसी शून्य मे
विलीन हो गया है।
और तुम्हारा अस्तित्व
मेरी भावनाओं
एवं
अनंत प्रार्थनाओं का
प्रत्युत्तर बन के
निरंतर आवाज दिए जा रहा है।
प्रतिध्वनित होकर
बारम्बार मेरे ही पास आ रहा है.
कल तुमसे बातें करके ऐसा लगा -
मानो प्रारब्ध ने तुम्हें
मुझे सौंपा है
और मुझे तुम्हें।
मानो मेरी अपूर्णता को
सिर्फ तुम्हारी ही भूख है।
तुम्हारी आवाज,
मेरी घावों का मलहम बन जाये-
इसलिये बनायीं गयी है।
और तुम्हारे गीत गा सकूँ
इसलिये मेरी अनुभूति
शब्दों से सजायी गयी है.
मानो तुम्हारी खूबसूरत

