हर्जाना माँग सकते हैं का....?

रवि रतलामी जी का यह ब्लोग पढ़ते हुए मन मे एक पुरानी बात ताजा हो गयी। एक दिन सुबह सुबह जब मैंने हर रोज की भाँती अपने मेल की पिटारी खोली, तो अन्य मेलों के बीच कुछ ऐसे मेल भी थे जिनमे कल रात लिखे मेरे एक ब्लोग पोस्ट को टेप दिया गया था और नीचे लिखा था: टाइम्स ऑफ़ इंडिया। फिर मेरे कुछ मित्रों के भी मेल थे ( मेरा ब्लोग पढा था) जिसमे कुछ इस तरह के वाक्य थे, "भैया! आज तो लेखक 'महान लेखक' बन गया।" "तुम्हे इस तरह की बातें खुलेआम नही लिखनी चाहिऐ" "क्यों बे! आज तो ट्रीट होगी।"
सत्य कहूं तो मेरी समझ मे तो कुछ ना आया। मैंने अपने मित्र गणों से इस बारे मे पूछा तो पता चला की मेरा वो ब्लोग तो उन्हें भी मेल मे आया है, वही टाइम्स ऑफ़ इंडिया के उद्धरण के साथ। डरते डरते न्यूज़ पेपर उठाया, तो पाया कि पृष्ट संख्या ८ पर मेरा ब्लोग किसी 'रुक्मिणी श्रीनिवासन जी' ने सीधे सीधे टीप दिया है। ना पहले पूछा, ना बाद मे बताया। क्या बताऊं....क्या हालत हुई थी उस दिन? जवाब देते देते परेशान हो गया था। बात है २२ नवंबर २००५ की।
उस वक़्त क्रोध तो बहुत आया था परंतु अज्ञानी क्या kare? आज रवि जी से थोडा ज्ञान मिला है। फिर भी एक बार कन्फर्मियाना चाहता हूँ। का बोलते हैं? हर्जाना मिल सकता है का? ई तो लिंकियाने से भी ज्यादा बड़का जुर्म होना चाहिऐ ना...?

IIT-JEE का रिजल्ट बनाम अरमानों का दाह संस्कार

आज सवेरे सवेरे चाय पीते वक़्त मैंने जब टेलीविजन देखा तो 'ब्रेकिंग न्यूज़' मे था 'IIT JEE का परिणाम घोषित'। अब अपने कालेज का नाम देख के टीवी देखने की इच्छा अधिक बलवती तो हो ही उठती है। सो, मैं टीवी से मुह चिपकाये बैठ के न्यूज़ सुनने लगा। न्यूज़ सुनते सुनते थोडा 'नोस्टालजिक' भी हो गया। ३ साल पहले का वो दिन याद आया जब मेरे JEE का रिजल्ट आया था।

एक दिन पहले से ही आंखों की नींद उड़ी हुई थी। सोने की बहुत कोशिश करने के बावजूद भी निद्रा देवी का आगमन असंभव जान पड़ रह था। ‘पिछले एक साल मे मात-पिता ने जिस बहादुरी से पैसे खर्च किये उसका फल अगर ना मिल पाया तो ना जाने उनके मन मे कितनी पीड़ा हो। ‘अगर मेरा ना हुआ और मेरे दोस्तो का हो गया तो ना जाने कौन सा मुह लेकर उनके सामने जाऊँगा। ‘पडोसिओं के सामने मेरी इज्जत का फलूदा बन जाएगा। ‘अब तक तो सब लोग कहते थे की कितना तेज बच्चा है लेकिन कल अगर....!’ लाखों सवाल मन मे लिए बैठा था, नींद के लिए जगह ही कहॉ थी। अब सोचता हूँ तो यह सब बिल्कुल अजीब लगता है कि भला एक परीक्षा के परिणाम को इतना महत्व क्यों दे देते हैं? परंतु उस वक़्त तो यही मेरा जीवन था...और लगता था मानो कल की घोषणा मेरा पुरा भविष्य निर्धारित करेगी। कई मायनों मे यह बात सही भी थी परंतु साथ साथ यह ख़याल भी आता कि अगर कल का परिणाम प्रतिकूल हुआ तो मेरी पुरी जिंदगी बरबाद हो जायेगी, जो कि बिल्कुल गलत अवधारणा थी। परंतु मेरे मन मे इस क़दर यह ख़याल बैठा था की क्या बताऊं...???

सुबह सुबह उठते ही साइबर कैफे की दौड़ लगा दी। (सोया ही कहॉ था) अब साईट है कि खुलने का नाम ही ना ले। ना जाने इतने गंदे सर्वर क्यों रखते हैं लोग? इस साइबर कैफे वाले की स्पीड ही गन्दी है। गलती हो गयी जो यहाँ आ गए। शायद दुसरे कैफे मे जाना चाहिऐ था। मतलब इंतज़ार का एक एक लम्हा एक एक युग लग रहा था।

मैं भाग्यशाली था, मेरा परिणाम अनुकूल रहा। आज IIT के जिस कमरे मे बैठ कर उसके छोटे होने पर शिक़ायत किया करता हूँ, उस वक़्त उसी कमरे मे जगह पाने का ख़याल मन को रोमांचित कर देता था। परिणाम अनुकूल होते ही मैं मानो हीरो हो गया। लोग बधायी देने लगे मानो मैंने अपना जीवन संवार लिया, मानो मेरे लिए मोक्ष का मार्ग खुल गया।

लेकिन आज सोचता हूँ कि वही परिणाम अगर उल्टा हुआ होता तो? 'शायद ये उतना ज्यादा तेज नही था।' 'मन लगा के पढता ही नही होगा।' 'माँ-बाप ने इतने पैसे पानी की तरह बहाए, उसका ये फल दिया है इसने।' इस तरह के फिकरे मिलते। आप मे से जितने लोग किसी JEE देने वाले इन्सान की जानते हैं, वो बतायें। ऐसे फिकरे मिलते कि नही? हाँ! जरूर मिलते। क्यूंकि मेरे बहुत सारे दोस्तो को ये फिकरे सुनने को मिले हैं। ऐसा नही था की उन्होने मेहनत नही की, ऐसा भी नही था कि उन्हें IIT जाने मे कोई आपत्ति थी परंतु अनहोनी को कौन टाले? उन्हें भी फेल होने का दुःख था लेकिन अभिभावक, दोस्त, संबंधी और पडोसी तक, जिन्हे फेल होने के 'शोक' से उबरने मे मदद करनी चाहिऐ वो खुद इस तरह से व्यवहार करने लगते हैं मानो उनके अरमानों की चिता जल गयी। ऐसे मे असफल विद्यार्थी पर क्या क्या गुजरता है इसकी कल्पना क्या आप कर सकते है? बड़ा सरल है किसी की असफलता पर उलाहना देना। ऐसे परिणाम के बाद आत्म हत्याओं के कितने खबर आते हैं? वो आत्महंता कमजोर थे, बेवक़ूफ़ थे - यह कहना भी बड़ा सरल है। परंतु एक बार क्या अपके सिमाग मे ख़याल आता है कि कहीँ ना कहीँ आप भी उसका कारण हैं?

लेकिन मैं तो अभी चुपचाप टीवी देख रहा हूँ। सामने विजेताओं के मुखड़े हैं। लेकिन उन लोगों का क्या जो इस ‘कट थ्रोट कम्पटीशन’ मे पीछे रह गए? अब दौड़ है तो कोई ना कोई तो पीछे रहेगा ही। पर एक याचना करना चाहूगा, किसी की असफलता को अपनी इज्जत से ना जोडें। और अपनी कटु भावनाएं (यदि हैं भी) तो उन्हें छुपा जाएँ। उनके दुःख को अपने अरमानों का दाह संस्कार ना कहें।
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एक अन्य ब्लोग जो शायद आप पढना चाहें : http://latentspace.blogspot.com/2007/05/days.html

चुपचाप मेरी कविता मुझे लौटा दो

चुपचाप मेरी कविता मुझे लौटा दो

सब कुछ ले कर चले गए हो, शब्द तो रहने देते
संवादहीन संवाद को कुछ बोल तो कहने देते

आज मेरी जिंदगी को जिंदगी की जरूरत है
मेरी जिंदगी के कुछ पल मेरे तो रहने देते

मेरे आँसुओं से कोई सवाल ना पूछो
जो सपना टूट गया, उनका हाल ना पूछो

और चुपचाप मेरी कविता मुझे लौटा दो

आईये sudoku खेलें




कोई बचाओ मुझे इस टिप्पणीओफोबिया से

लोग भूत-पिशाच, राजनीति, झूठ, बंदूक, जंगली जानवर, अँधेरे और ना जाने किस किस चीज से डरते हैं। कुत्ते के काटे लोग तो पानी से भी डरने लगते हैं और उसके लिए एक सुंदर नाम भी है 'हाइड्रोफोबिया'। 'अब्लुटोफोबिया' से लेकर 'जूफोबिया' तक की लिस्ट तो यहीं देखने को मिल जायेगी। अब चुंकि हम हिंदी को बढावा देने की चेष्टा कर रहे हैं तो 'अन्ग्रेजोफोबिया', 'झूठोफोबिया', 'अन्धेरोफोबिया' जैसे शब्द भी प्रयोग मे ला ही सकते हैं। परंतु मेरे मन का दर इन सारे फोबियाओं से बिल्कुल अलग है। कम से कम आंग्ल भाषा में और डाक्टरों के शब्दकोष में तो इसके लिए कोई शब्द नही है।

हंसना मना नहीं है, सो जी आये तो दिल खोल के हँस लीजिये। पर मेरी समस्या सचमुच अजीब है, जिसे मैं टिप्पणीओफोबिया कहूँगा। समझ तो आप गए ही हैं कि मेरी समस्या क्या है? कहीँ भी टिप्पणी करने से डरता हूँ मैं। कारण- अधिकांश ब्लागरों से उम्र मे छोटा हूँ। अब बडों पर टिप्पणी करना तो अशिष्टता होगी ना? और अगर ना करूं तो उन लोगों के साथ तो अन्याय होगा जो निरंतर आकर मेरा मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्धन करते हैं। आगे कुँआ पीछे खाई वाली स्थिति है। बिल्कुल त्रिशंकु बन गया हूँ। साहस करके कहीँ कहीँ टिपियाने कि चेष्टा करता भी हूँ तो शब्द चयन कि समस्या विकट हो जाती है। कभी कभी 'छोटा मुँह बड़ी बात' करने का डर तो कभी 'सूरज को दिया दिखाने' का भय हमेशा मन मे समाया रहता है। अब महान लेखकों को मेरे जैसा अनाड़ी 'अच्छा है, बधाई या लिखते रहें' भी तो नही लिख सकता। कल्लू को कालिदास की कृति भा भी गयी तो उसे टिप्पणी करने का अधिकार तो नही मिल जाता ना???

बडे संशय मे हूँ। कोई मुझे इस टिप्पणीओफोबिया से बचने का मार्ग दिखाएँ तो जान बचे।

क्यों हो इतनी दूर?

जब बारिश के मौसम मे
अकेले भीगते भीगते
उसे मेरी याद आ जाती है
तो पुनः,
मेरी सखी
मुझसे अपनी शिक़ायत दुहराती है।

कहती है -
बारिश की बूँदें
छीन लेतीं हैं मेरा हक,
उसके चेहरे को छू कर।
कहती है -
एक बारिश
शुरू हो जाती है उसके भी अन्दर।

दिल की सारी वेदना
समेटने को
जब शब्द कम पड़ जाते हैं,
और मेघ दूत के सहारे भेजे संदेशे
जब मुझ तक पहूँचने के पहले ही
दम तोड़ जाते हैं -

तो चिल्लाती है
अकेले में कि
क्यों? आख़िर क्यों हो इतनी दूर?

और मैं -
बस इतना कह पाता हूँ -
मनुष्य हूँ,
असहाय,
मजबूर।

एक गीत

कुछ दिनों पहले मजाक मजाक मे एक गीत लिखा था। जिसे मैंने पुराने गीतों के आवाज एवं अंदाज मे दोस्तो को सुनाकर ख़ूब तालियाँ बटोरी। अब यहाँ सुना तो सकता नही....तो शब्द बताये देता हूँ। (के एल सहगल साहब अगर ये गाते, तो मजा आ जाता। मेरा इरादा स्वस्थ मनोरंजन का था और है।)

जो तू पास ना आए प्रीतम, जो तू पास ना आये
मन मेरा घबराए प्रीतम , मन मेरा घबराए
जो तू पास ना आये -2

आंखों मे तस्वीर है तेरी, आंखों मे तस्वीर
मैं रांझा तू हीर है मेरी, मैं राँझा तू हीर
पर जाने कब मिल पायें हम....२
फूटी है तकदीर रे प्रीतम, फूटी है तकदीर

अंखियों के आंसू तड़प तड़प के तुझको पास बुलाये
जो तू पास ना आए - २

तू आए तो आ जायेगी बिन बदल बरसात
तू आए तो चांदनी बरसेगी फिर सारी रात
बिन तेरे दुनिया सुनी है.....२
मान ले मेरी बात रे प्रीतम मान ले मेरी बात।

बिन तेरे मेरे दिल की ये बगिया सूखी जाये
जो तू पास ना आए -
दिल की धड़कन धड़क धड़क के तुझको पास बुलाये
जो तू पास ना आए -

जो तू पास ना आए प्रीतम, जो तू पास ना आये
मन मेरा घबराए प्रीतम , मन मेरा घबराए


बुद्धिजीवी

जाओ
तुम भी चले जाओ।
मत छुओ मुझे
और ना ही मेरे नजदीक आओ।

कहीं मेरे अन्दर का अन्धकार
तुम्हे काला ना कर दे।
कहीं मेरे मन की तपिश
तुम्हारे ह्रदय मे भी
धधकती हुई ज्वाला ना भर दे।

मत उठाओ अपनी निगाहें
मत देखो मेरी ओर।
मेरी वेदना,
कहीं गीले ना कर डाले
तुम्हारे नयनों के सूखे कोर।

बंद कर लो अपने कान
मेरे मौन की चीख
कहीं तुम्हारे परदे ना फाड़ दे।
कहीं मेरी चिल्लाती हुई दृष्टि
तुम्हारे नयनों को
शर्म से ना गाड़ दे।

बुद्धिमान थे वे
जो मुझे अकेला छोड़ गए हैं।
प्रेम और अधिकार के सारे प्रतिबंध
बेझिझक तोड़ गए हैं।

मेरे अभिमान के किरचों पर
व्यर्थ आंसू ना बहाओ।
जाओ, जाकर तुम भी
बुद्धिजीवी बन जाओ.

प्रीत के नाम

यदि कभी
जाने अनजाने
तुमसे
या तुम्हारी बातों से
या तुम्हारी चाहो एवं इच्छाओं से
मैं
या मेरी बातें
या मेरी चाहत और इच्छाएं
अलग अलग प्रतीत होने लगें,

या कभी
तुम्हारे सपने
मेरे सपनों की
विशालता के तले दबकर
या
संकीर्णता के कारण पिसकर
तड़पने लगें
रोने लगें,

या फिर
वक्त बेवक्त
तुम्हारे बुरे वक्त में भी
मेरे वक्त की कमी
तुम्हें
हर वक्त
मेरी अनुपस्थिति का
या मेरी ग़ैर-जिम्मेदाराना
हरकतों का
अहसास कराए
और यह अहसास
तुम्हारे प्रेम की सीमा
पर हावी होने लगे,

तो प्रिय,
यह मत समझना
की मुझे
तुम्हारी दरकार नही,
या मुझे अब तुमसे
उस क़दर प्यार नही,
चाहो तो मुझे छोड़ चली जाना
पर आज की यह बात याद रहे,
कि मेरा हाल जितना बरबाद रहे
मुझे उस वक्त
तुम्हारी उतनी ज्यादा जरूरत है
रुकना
रूक जाना,
कम से कम
जब तक तुम्हारे
मन का विश्वास ना खोने लगे।

तुम

तुम मेरी रहो ना रहो,
मेरी प्रेरणा जरूर रहोगी।
कभी मेरी गीतों में गाओगी,
कभी छन्द बन मेरी कविता में बहोगी।

कभी स्वप्न बन के मुझे सताने के लिए
कभी गीत बन गुनगुनाने के लिए
कभी आंसुओं से चेहरा धुलाने के लिए
दूर ही सही, पर रहोगी।
कभी मेरी गीतों में गाओगी,
कभी छन्द बन मेरी कविता में बहोगी।

तुम भले ही ना कर सको मुझे स्वीकृत
पर मैंने तुम्हारे हर रुप को स्वीकार किया है।
तुम्हारे साथ बीते हर एक पल मे
कोटि कोटि जीवन का मर्म जिया है।

मेरे प्रेम को भले ही तुम मूर्खता,
दीवानगी या पागलपन कहोगी
फिर भी मेरी गीतों मे बसोगी
मेरी कविता मे बहोगी।

...बनो

प्रेम है क्या? ये प्रीत है कैसी?
तुम इन सबका ज्ञान बनो।
मैं बन जाऊं जीवन तेरा
और तुम मेरी जान बनो।

मन की हर भटकन मे प्रीतम
संकेन्द्रित सा ध्यान बनो।
मैं तेरा सम्मान बन सकूं
तुम मेरा अभिमान बनो।

मत छूना,पास ना जाना इसके...

यदि बात ना मेरी मानी तो फिर
तुम पीछे पछताओगे...!
मत छूना,पास ना जाना इसके
आग है ये जल जाओगे।

कभी नींद भी दूर भगायेगी
कभी सपनों मे आ जायेगी
कभी संग बुनेगी सपने तो
कभी तोड़ उन्हें इठलायेगी.

हर हिचक कभी झूठलाएगी
बेहिचक कभी शर्मायेगी!
जो पास बुलाओ, भागेगी
कभी सीने से लग जायेगी।

बचना इस काले जादू से
सम्मोहन मे पड़ जाओगे
मत छूना,पास ना जाना इसके
आग है ये जल जाओगे।

कभी बच्चों सी बन जाती है
बचपन की याद दिलाती है
पर अगले क्षण,बनकर धड़कन
दिल के जज्बात सिखाती है

पग डगमग से जो हो जाएँ
बुढिया नानी बन जाती है
अल्हड बचपन,दिल की धड़कन
बिजली बन राख बनाती है।

बेबाक वक्त के जैसी है
तुम जिसे पकड़ ना पाओगे!
मत छूना,पास ना जाना इसके
आग है ये जल जाओगे।

कभी कभी यूं ही बैठे बैठे

कभी कभी यूं ही बैठे बैठे
तुम्हारे ख्यालों मे डूब जाता हूं

तुम्हारे बाजुओं में
अपना बचपन जीता हूं
लंबे केशों के साथ
अपनी जवानी सुलझाता हूं
और तुम्हारा हाथ थामे
अपना बुढ़ापा संवारता हूं।

खन्न!
एक आवाज!
और मेरे सपनों का शीश महल
फर्श पर बिखरा नजर आता है।

कभी कभी यूं ही बैठे बैठे
वो टूटे शीशे चुनता हूं।

इनके लाल रंगों में
केवल मेरी आंखों से टपकते रक्त नही,
कुछ बूँदें तुम्हारे वादों की भी हैं।
और इन टुकड़ों के बीच
तुम्हारी मासूमियत के किरचे भी पडे हैं।

पुणे का पहला सप्ताहांत

पुणे आये हुए मुझे ४ दिन हो गए। और मैंने TCS के ऑफिस के अलावा और कोई भी जगह नही देखी। सौभाग्य से मेरे गाइड बहुत ही नेक इन्सान हैं और उनकी मदद एवं उत्साहवर्धन से मेरे प्रोजेक्ट का काम तो काफी सरल लग रहा है। पर रहने की परेशानी अपनी जगह से हटने का नाम ही नही लेती। फिलहाल तो मैं एक दूर के संबंधी कि अनुपस्थिति के चलते उनके घर पर आराम से विराजमान हूँ। पर १० दिनों के बाद वापस मेरी हालत फुटपाथ कि हो जायेगी। :( यद्यपि मुझे यह ज्ञात था कि पुणे मे इस तरह कि समस्याएँ आती हैं पर इनकी विभीषिका इस भाँती होगी इस मामले मे मैं पूर्णतया अज्ञानी था।

यहाँ आना मुझे कई नयी बातें सिखा रहा है। अभी तो मेरे सारे मित्र यहाँ से दूर हैं, उनके आने के बाद शायद स्थिति मे कुछ बदलाव आये। नितांत अकेलापन किसे कहते हैं यह कोई मुझसे पूछे। आई आई टी के होस्टल मे भी कई कई दिनों तक अकेले रहा हूँ। परंतु वहाँ मेरा कंप्यूटर होता था, इन्टरनेट होता था, फ़िल्में होती थी....गेम, गाने बहुत सारी चीजें थी। यहाँ कुछ भी नही। शाम मे चुपचाप बैठना, चांद को देखना, रात मे किताब लेके पढने कि कोशिश करना, बोर हो जाओ तो साइकिल चलाना, और थक जाने पर सो जाना - ये मेरी दिनचर्या के कुछ पहलू हैं। आज जबकि सप्ताहांत है मैं तनिक विचारमग्न हूँ कि क्या किया जाये। कुछ भी करने को नही।साइबर कैफे मे कब तक बैठूं? यहाँ नही बैठूं तो कहॉ जाऊं? कुछ भी ज्ञात नही। अत्यधिक गरमी के कारण कहीँ खुले मे घूम भी नही सकता। अज्ञान की पराकाष्ठा और क्या है?

मायने

जब साहस का द्रव्य बह जाये
तो शब्द हंसी मे घोलने पड़ते हैं
और सीधी सादी बातें
राजनीतिज्ञों कि तरह बोलने पड़ते हैं।

मुझे विश्वास है,
तुम्हारी अनुभूति पर।
पर अपनी अभिव्यक्ति पर
संदेह करता हूँ।
सो,
मत सुनना मेरे शब्दों को
और मत ढूंढ़ना
मेरी संवेदनाओं मे अर्थ।

पर ठहरी हुई दृष्टि से
देखती रहना समय की उड़ान को।

क्यूंकि बदलते समय के साथ साथ
बदल जाते हैं मायने
ढाई अक्षर के भी।

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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