अग्निपरीक्षा

राम गए वनवास तो सीता छाया बनकर साथ गयी
दुर्गम वन मे नंगे पांवों हाथों मे डाले हाथ गयी

उस सीता की पावन निष्ठा अग्नि से अब आंकों तुम
ओ न्यायी ओ रघुराई ज़रा अपने अन्दर झांको तुम

जिस अग्नि के फेरों से तुमने सीता को पाया है
उस अग्नि की ज्वाला मे सारा विश्वास जलाया है

धर्म की डींगे भरते हो, पत्नी संग मगर अधर्म करो
मर्यादा पुरुषोत्तम हो, अपने पौरुष पर शर्म करो

आग लगा दो सीता में, कर्म नही अपकर्म करो
मर्यादा पुरुषोत्तम हो, अपने पौरुष पर शर्म करो

सात जनम की पत्नी प्यारी पल मे हुई पराई
जय जय जय रघुराई, जय जय जय जय रघुराई.

2 टिप्पणियाँ

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दिनेशराय द्विवेदी said...

सटीक टिप्पणी है सीता की अग्निपरीक्षा पर। सीता की परीक्षा तो फिर भी पूरी नहीं हुई थी।


mehek said...

bahut sahi likha hai,sita ka aadar karna har ram ne sikh lena chahiye ab.

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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