10 December, 2007

चिर सुख

यह कविता मैंने दसवी कक्षा में लिखी थी.

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

आरती उतारूँ पत्थर की, मुल्ले सी बांग लगाऊं मैं
करूं प्रार्थना जीसस से पर सुख को ढूंढ ना पाऊँ मैं.
मंदिर मस्जिद और गिरजे मे जा जा कर तो हार चुका
वर्षों से तो ढूँढता आया, कब तक ढूँढता जाऊं मैं?

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

उलझन के इस विषम जाल से, चाहूँ पर बच नही पाऊँ मैं
सुलझाने में इस उलझन को, उलझ-उलझ खुद जाऊं मैं.
कहाँ मिले सुख? कहाँ मिले ? भटकूँ इस संसार में
बड़ा प्रश्न है, छोटी दुनिया, उत्तर कहाँ से लाऊं मैं?

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

दुःख का फैला भवसागर है, उस तट कैसे जाऊं मैं?
डूब मरूँ सागर मे या फिर तरणी कहीं से लाऊं मैं.
सभी लोग तो डूबे ही हैं, सभी ढूंढते तरणी को ही
इन सब दुखियों से ही कैसे अपना दुखडा गाऊँ मैं?

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

दुःख की अग्नि शांत हो ऐसी युक्ति कौन लगाऊं मैं?
या मूक हो औरों जैसा दुःख मे तिल-तिल जलाता जाऊं मैं?
्निःसहाय सा अपने हाथों कर दूं खुद को चिता हवाले?
या की अपने पुरुषार्थ से दुःख की चिता जलाऊँ मैं?

क्या करूं कि चिर सुख पाऊँ मैं?

2 टिप्पणियाँ:

मीत said...

मिथ्या है विकास जी, मिथ्या है. "चिर सुख" ऐसे दो शब्द हैं जिनका काग़ज़ से बाहर कोई अस्तित्व नहीं. हम फिर भी जाने क्यों ..........

mehek said...

itni choti umar mein likhi kavita,shandar gehra bahv hai is mein.

"Magical Template" designed by Blogger Buster