प्रेम किया था तब कब सोचा....?



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प्रेम किया था तब कब सोचा, यूँ मुझको दुत्कार मिलेगी?
ये चाहा था प्यार मिलेगा, कब सोचा इनकार मिलेगी.

पर आशा का दीप बुझ गया, सुन कर तेरी बातें प्रीतम
अब रातों में, उन बातों की, निर्मम सी झंकार मिलेगी.

कभी कभी बिस्तर के ऊपर, अरमानों का खून दिखेगा
और कभी तकिये के नीचे, आँसू की बौछार मिलेगी.

जरा संभल के चलना साथी, दिल के टुकड़े चुभ ना जायें
और ना काटें - धूल में जो, दिलकश बातें दो चार मिलेंगी.

बस खुशी तेरी माँगूं, चाहूँ हर ओर सफलता तुझे मिले
मैं तो अपना सर रख दूँ जिस राह तुझे जयकार मिलेगी

10 टिप्पणियाँ

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Mudrika said...

excellent .. aur teri awaaz mein toh ekdum impact full :)
\keep writting


rachana said...

वाह! कविता बढिया है. और जैसा कि मनीष जी ने बताया आपकी आवाज बुलन्द है, वो भी साबित हुआ!


parul k said...

कभी कभी बिस्तर के ऊपर, अरमानों का खून दिखेगा
और कभी तकिये के नीचे, आँसू की बौछार मिलेगी.

aapko pehley bhi suna hai..bahut badhiyaa..khaas kar ye panktiyaan...badhaayii


Manish said...

bahut sundar maza aaya sunkar...

ek sujhav pehli do panktiyon par
inkaar milegi mujhe ghalat lag raha hai, mere khyaal se milega hona chaiye.. ab baki chhandon mein milegi ka pryog hai isliye inkaar ki jagah koyi doosra shabda istemaal karo.


rajmastermind said...

main,pankaj,prem house,1998-2002(DSE)aapka niyamit pathak ho gaya hoon.kya dard urela hai aapne?Maja aa gaya parhkar.jari rakhiye.


विकास कुमार said...

हाँ मनीष जी! मैं थोड़ा कन्फ़्युज था, लग रहा था कुछ गलत हो रहा है लेकिन फिर सोचा कि चलता है ;)


prabodh said...

bahut badhia lage rahiye,


mehek said...

awesome


Preeti Datar said...

I heard the audio version and believe me, I felt like you were sitting accross me and reciting it!! Love your voice! (did I saw that yesterday?!)


देवेन्द्र कुमार मिश्रा said...

दिल अपना
मन पराया हो जाता है ।
ये कैसा अनुपम नाता
मन में प्रीत जगाता ।।

पहले होती है तकरारे
फिर हो जाता प्यार है ।
फिर होता दीवानापन
जिसकी दोस्ती मिशाल है।।

कहां से आये कहां जाना
किस्मत का ये खेल है यार।
कितना पावन स्थल यह
जहां पनपता अपना प्यार।।

सुख दुख में हम साथ रहे
नाते हुये पुराने।
साथ में रहकर कुछ नही जाने
जुदा हुये तब जाने।।

रात ना देखें दिन ना देखें
यादें आना जाना।
तनहाई में यादें संजोयें
प्रेम में मन बौराना।।

आंखों के आंशु बतलाते
बिछुडने का अफ़साना।
नेत्रों से ओझल होते ही दिल
में आन समाना ।।

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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