हाल फिलहाल की कुछ देशी फिल्में
लागा चुनरी में दाग: कुछ लोग ये कह रहे थे कि फ़िल्म में कुछ भी नया नहीं है. और सब कुछ बिल्कुल प्रत्याशित है. बात शायद सही भी है. लेकिन आजकल जितनी भी देशज फ़िल्में हैं, उनकी तुलना में तो यह दर्शनीय है ही. रानी मुखर्जी और कोंकणा सेन अच्छी अदाकारी तो करती ही हैं. सारे अभिनेता मंजे हुए थे. हेमामालिनी को देखना सुखद था. :). इस फ़िल्म का एक गीत क्लिष्ट हिन्दी शब्दों से भरा पड़ा है, लगता है जैसे कविता सुन रहा हूँ. हिन्दी से जुड़े होने के कारण यह गीत मुझे पसंद आया.
सांवरिया: हर बंसाली-फिल्म की तरह इस फ़िल्म में भी सेट तो काफ़ी सुन्दर बनाया है. लेकिन सिर्फ़ सेट से फ़िल्म नहीं चलती. कुछ गाने भी अच्छे हैं. नये चेहरे वला अभिनेता को भी मैं बुरा नहीं कहूँगा. लेकिन फ़िल्म में कुछ मजा नहीं आया. बोर बहुत हुआ. कसावट की कमी कह सकते हैं. यद्यपि मैं बंसाली का प्रशंसक हूँ तथापि मैं किसी को भी यह फ़िल्म देखने की सलाह नहीं दूँगा. बंसाली एकलौते ऐसे निर्देशक हैं जो 'अपनी' फ़िल्म बनाते हैं. परंतु उनकी कल्पना हर किसी को पसंद आये, ये हमेशा तो हो नहीं सकता ना?
ओम शांति ओम: ये फ़िल्म नहीं है, एक स्पूफ़ है. स्पूफ़ की तरह देखिये, मजा आएगा. दोस्तों के संग मजाक उड़ाने के लिये सबसे अच्छी है. फिल्म की तरह देखिये - बकवास.
जब वी मेट: हाल फ़िलहाल की सारी फ़िल्मों में यही एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें कुछ बात है. रोमांटिक सी फ़िल्म. गर्लफ़्रेंड के साथ देखना काफ़ी फ़ायदेमंद हो सकता है. :) करीना के चुलबुले अभिनय की प्रशंसा करनी होगी. वो सारे लोग जिन्हें करीना अच्छी नहीं लगती थी - उनके लिये यह फ़िल्म एक शॉक हो सकती है. अपने नाम में जुड़े 'कपूर' की इज्जत रख ली है करीना ने.
भूल भूलैया: अक्षय सदा की तरह ठीक ठाक हैं. थ्रिलर के नाम पर एकलौती फ़िल्म आयी है. सो, देख लिया. टाइम बहुत है तो देखी जा सकती है. (किसी तरह की महानता की उम्मीद निरर्थक ही होगी)
दिल दोस्ती ETC: मुझे नहीं पता कैसी लगी. सच में. बस इतना पता है कि देखते वक्त बुरी नहीं लगी और ऐसा तो बिल्कुल नहीं लगा कि वक्त बर्बाद किया. क्या अच्छा था? नहीं पता. क्या बुरा? ये भी नहीं पता.
सांवरिया: हर बंसाली-फिल्म की तरह इस फ़िल्म में भी सेट तो काफ़ी सुन्दर बनाया है. लेकिन सिर्फ़ सेट से फ़िल्म नहीं चलती. कुछ गाने भी अच्छे हैं. नये चेहरे वला अभिनेता को भी मैं बुरा नहीं कहूँगा. लेकिन फ़िल्म में कुछ मजा नहीं आया. बोर बहुत हुआ. कसावट की कमी कह सकते हैं. यद्यपि मैं बंसाली का प्रशंसक हूँ तथापि मैं किसी को भी यह फ़िल्म देखने की सलाह नहीं दूँगा. बंसाली एकलौते ऐसे निर्देशक हैं जो 'अपनी' फ़िल्म बनाते हैं. परंतु उनकी कल्पना हर किसी को पसंद आये, ये हमेशा तो हो नहीं सकता ना?
ओम शांति ओम: ये फ़िल्म नहीं है, एक स्पूफ़ है. स्पूफ़ की तरह देखिये, मजा आएगा. दोस्तों के संग मजाक उड़ाने के लिये सबसे अच्छी है. फिल्म की तरह देखिये - बकवास.
जब वी मेट: हाल फ़िलहाल की सारी फ़िल्मों में यही एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें कुछ बात है. रोमांटिक सी फ़िल्म. गर्लफ़्रेंड के साथ देखना काफ़ी फ़ायदेमंद हो सकता है. :) करीना के चुलबुले अभिनय की प्रशंसा करनी होगी. वो सारे लोग जिन्हें करीना अच्छी नहीं लगती थी - उनके लिये यह फ़िल्म एक शॉक हो सकती है. अपने नाम में जुड़े 'कपूर' की इज्जत रख ली है करीना ने.
भूल भूलैया: अक्षय सदा की तरह ठीक ठाक हैं. थ्रिलर के नाम पर एकलौती फ़िल्म आयी है. सो, देख लिया. टाइम बहुत है तो देखी जा सकती है. (किसी तरह की महानता की उम्मीद निरर्थक ही होगी)
दिल दोस्ती ETC: मुझे नहीं पता कैसी लगी. सच में. बस इतना पता है कि देखते वक्त बुरी नहीं लगी और ऐसा तो बिल्कुल नहीं लगा कि वक्त बर्बाद किया. क्या अच्छा था? नहीं पता. क्या बुरा? ये भी नहीं पता.

वाह.. तुम ने तो पूरे सीज़न की समीक्षा एक पोस्ट में कर डाली..
मन तो होता नहीं फिल्में देखने का .... चलो हिम्मत करते हैं कुछ नई बंबइया फिल्मे देखने की।
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