पता है......!

पता है,
कभी कभी इच्छा होती है
कि तुम्हें अनगिनत गालियाँ दूँ.
श्राप देने की ताकत होती
तो शायद अब तक तुम्हें जला चुका होता.

ना चाहते हुए भी
तुम्हारा नाम हर जगह ढूँढ़ लेना
मेरी - एक ऐसी खासियत है
जिसकी सजा सैकड़ो बार पाता हूँ.
और कभी कभी इच्छा होती है
कि कम से कम एक बार
तुम्हें वही दर्द दे सकूँ.

पता है,
तुम्हारी दुनिया अलग बसते देख
मेरी दुनिया ने मुझसे विद्रोह कर दिया है.
मेरे अंदर बम फोड़े जाते हैं
नारों की आवाज - डराती हैं
धरना और घेराव तो रोज का हिस्सा बन गयी हैं.
सो, कभी कभी लगता है
कि उस दुर्गम नगर में
यादों को अकेला कैसे रहने दूँ?
क्रोध में सोचता हूँ
कि तुम्हें भी
किसी ऐसी ही जगह का भाग बना दूँ.

पता है,
लोग कहते हैं
कि क्रोध उसी पर आता है जिससे प्रेम होता है.
तो क्या मेरा खुद से झूठ बोलना
तुम्हारी तस्वीरों को दफ़न करना
यादों को जलाना -
सब बेकार चला गया?

मुझे अब तक तुम पर इतना क्रोध क्युँ आता है?

6 टिप्पणियाँ

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bhupen said...

keep it up vikas!


बाल किशन said...

कविता आपकी बहुत अच्छी है पर इतना क्रोध अच्छी बात नही है विकास जी.


anuradha srivastav said...

आक्रोश है, क्योंकि प्यार है और यहीं प्यार शब्दों में ढल कर कविता बना है।


कंचन सिंह चौहान said...

जितना सहज प्रेम हो जाना है उतना ही सहज प्रिय व्यक्ति पर क्रोध आना है और उस क्रोध पर नियंत्रण न होने पर खीझना भी सहज ही है, अतः आपकी कविता सहज भावनाओं की सहज किंतु सशक्त अभिव्यक्ति लगी। बधाई स्वीकार करें।


parul k said...

मुझे अब तक तुम पर इतना क्रोध क्युँ आता है?
kitni vivashtaa hai....khuubsurat panktiyaan


crazy devil said...

last paragraph to godly hai..sale itna accha likhta hai..maza aa jaata hai

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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