पता है......!
पता है,
कभी कभी इच्छा होती है
कि तुम्हें अनगिनत गालियाँ दूँ.
श्राप देने की ताकत होती
तो शायद अब तक तुम्हें जला चुका होता.
ना चाहते हुए भी
तुम्हारा नाम हर जगह ढूँढ़ लेना
मेरी - एक ऐसी खासियत है
जिसकी सजा सैकड़ो बार पाता हूँ.
और कभी कभी इच्छा होती है
कि कम से कम एक बार
तुम्हें वही दर्द दे सकूँ.
पता है,
तुम्हारी दुनिया अलग बसते देख
मेरी दुनिया ने मुझसे विद्रोह कर दिया है.
मेरे अंदर बम फोड़े जाते हैं
नारों की आवाज - डराती हैं
धरना और घेराव तो रोज का हिस्सा बन गयी हैं.
सो, कभी कभी लगता है
कि उस दुर्गम नगर में
यादों को अकेला कैसे रहने दूँ?
क्रोध में सोचता हूँ
कि तुम्हें भी
किसी ऐसी ही जगह का भाग बना दूँ.
पता है,
लोग कहते हैं
कि क्रोध उसी पर आता है जिससे प्रेम होता है.
तो क्या मेरा खुद से झूठ बोलना
तुम्हारी तस्वीरों को दफ़न करना
यादों को जलाना -
सब बेकार चला गया?
मुझे अब तक तुम पर इतना क्रोध क्युँ आता है?
कभी कभी इच्छा होती है
कि तुम्हें अनगिनत गालियाँ दूँ.
श्राप देने की ताकत होती
तो शायद अब तक तुम्हें जला चुका होता.
ना चाहते हुए भी
तुम्हारा नाम हर जगह ढूँढ़ लेना
मेरी - एक ऐसी खासियत है
जिसकी सजा सैकड़ो बार पाता हूँ.
और कभी कभी इच्छा होती है
कि कम से कम एक बार
तुम्हें वही दर्द दे सकूँ.
पता है,
तुम्हारी दुनिया अलग बसते देख
मेरी दुनिया ने मुझसे विद्रोह कर दिया है.
मेरे अंदर बम फोड़े जाते हैं
नारों की आवाज - डराती हैं
धरना और घेराव तो रोज का हिस्सा बन गयी हैं.
सो, कभी कभी लगता है
कि उस दुर्गम नगर में
यादों को अकेला कैसे रहने दूँ?
क्रोध में सोचता हूँ
कि तुम्हें भी
किसी ऐसी ही जगह का भाग बना दूँ.
पता है,
लोग कहते हैं
कि क्रोध उसी पर आता है जिससे प्रेम होता है.
तो क्या मेरा खुद से झूठ बोलना
तुम्हारी तस्वीरों को दफ़न करना
यादों को जलाना -
सब बेकार चला गया?
मुझे अब तक तुम पर इतना क्रोध क्युँ आता है?

keep it up vikas!
कविता आपकी बहुत अच्छी है पर इतना क्रोध अच्छी बात नही है विकास जी.
आक्रोश है, क्योंकि प्यार है और यहीं प्यार शब्दों में ढल कर कविता बना है।
जितना सहज प्रेम हो जाना है उतना ही सहज प्रिय व्यक्ति पर क्रोध आना है और उस क्रोध पर नियंत्रण न होने पर खीझना भी सहज ही है, अतः आपकी कविता सहज भावनाओं की सहज किंतु सशक्त अभिव्यक्ति लगी। बधाई स्वीकार करें।
मुझे अब तक तुम पर इतना क्रोध क्युँ आता है?
kitni vivashtaa hai....khuubsurat panktiyaan
last paragraph to godly hai..sale itna accha likhta hai..maza aa jaata hai
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