मेरे प्रिय मुन्शी जी

अब इतने सारे लेखकों में मुझे मुंशी जी अधिक प्रिय क्यों हैं इसका कारण संभवतः आप जानते ही होंगे। मेरे एक मित्र ने कुछ दिनों पहले मुझसे कहा कि अगर तुम ब्लोगिंग करते हो और पॉडकास्टिंग के बारे मे भी जानकारी है तो कहानियो का पोडकास्ट क्यों नही शुरू करते? अब क्यों नही करता - जैसे प्रश्न का कोई जवाब है क्या? सो उल्टे मैंने सवाल दाग दिया कि इसे सुनेगा कौन? व्यर्थ की मेहनत क्यों करनी?
वो भड़क उठा। 'कहने को हिन्दी की सेवा करते हो? और सुनेगा कौन की चिंता करते हो? ये सब बहाने हैं। कोई सुने ना सुने मैं सुनूंगा।' इतना कहके वो बेचारा बचपन मे खो गया। और वो सारी बातें बताने लगा की रात मे अपने भाई के साथ किस तरह रेडियो पर कहानियाँ सुना करता था। अब दादी नानी की कहानियाँ थोडी कम सी हो गयी हैं - पर अपनी चिता भी लगे हाथों जाता दी। और फिर धीरे से कह गया कि 'प्रेमचंद' की कहानियाँ पढ़नी शुरू करो। (पढी हुई तो मेरी सारी हैं, उसका तात्पर्य रेकॉर्ड करने से था)। अब रात को सोते वक़्त मैं तो कहानियाँ सुन नही सकता लेकिन ऐसे बौड़म लोग जिन्हें शायद ये पसंद आये, उनके लिए एक कोशिश करने मे कोई हर्ज नही लगा। सो अपने मित्र के आदेश का पालन करते हुए, मैंने ये कोशिश प्रारंभ की है। अब इतनी लंबी लंबी कहानियाँ लगातार १०-१५ मिनट तक रेकॉर्ड करने मे गलतियां तो वाजिब हैं, सो क्षमा की पोटली साथ ले के आना। एक इंसान भी इसे सुनता है, तो मेरा अहोभाग्य। नहीं तो बाद मे बुढापे मे जब आँखें काम ना करेंगी, तब ये कहानियाँ मेरे काम आएगी - ये सोचकर काम प्रारंभ कर रहा हूँ।
नियमितता कितनी कायम रहेगी, नही जानता। लेकिन सप्ताह मे एक की दर कायम रहे, इसकी कोशिश करूंगा। चट्कार्थ लिंक यह रहा: http://sunokahani.blogspot.com

4 टिप्पणियाँ

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Udan Tashtari said...

आईडिया निराला है. अभी सुन नहीं पा रहे पता नहीं क्यूँ. घर जाकर कोशिश करेंगे फिर से.


crazy devil said...

the boys is learning and growing very fast..nice voice makes it interesting to hear premchand's work


आलोक कुमार said...

ओह...मुझे बताये तक नही,मै नियमित श्रोताओ मे शुमार हो गया....


पुनीत ओमर said...

'कहने को हिन्दी की सेवा करते हो? और सुनेगा कौन की चिंता करते हो? ये सब बहाने हैं। कोई सुने ना सुने मैं सुनूंगा।'

मुझे अक्सर ऐसा लगने लगता है की क्या वाकई मे हिन्दी ऐसे ही हाथो मे जाती जा रही है?? हिन्दी के सेवक लगे हुए हैं बिना इस बात की परवाह किए हुए की कोई है भी उसे देखने सुनने वाला. ऐसी सेवा कहाँ जायेगी और हिन्दी को कहाँ ले जायेगी.. शाष्त्री जे फिलिप जी अगर पढ़ रहे हो तो कृपया जवाब दे.

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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