मेरी दीपावली

दीप और पतंगे का प्रेम
कौन नही जानता?

कहीं पढ़ा था,
"दीप और पतंगे मे फर्क सिर्फ इतना है
एक जल के बुझता है, एक बुझ के जलता है।"

आजतक मतलब नही समझ पाया हूँ।

आज फिर दीपावली पर
दीपो की पंक्ति देखी।
और हर दीप के किनारे
जले सैकड़ों पतंगों को दम तोड़ते देखा.

कहीं ये पर्व प्रेम का मरघट तो नही?

2 टिप्पणियाँ

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आलोक कुमार said...

ये पर्व तो अन्धकार का मरघट है ... अब प्रेम और अन्धकार मे कोई सम्बन्ध हो तो ये मुझे नही मालूम !!


पुनीत ओमर said...

प्रेम में जलना तो हर किसी को होता है. कभी विरह में तो कभी प्रेम की अतिशयता में.

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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