मेरी दीपावली
दीप और पतंगे का प्रेम
कौन नही जानता?
कहीं पढ़ा था,
"दीप और पतंगे मे फर्क सिर्फ इतना है
एक जल के बुझता है, एक बुझ के जलता है।"
आजतक मतलब नही समझ पाया हूँ।
आज फिर दीपावली पर
दीपो की पंक्ति देखी।
और हर दीप के किनारे
जले सैकड़ों पतंगों को दम तोड़ते देखा.
कहीं ये पर्व प्रेम का मरघट तो नही?
कौन नही जानता?
कहीं पढ़ा था,
"दीप और पतंगे मे फर्क सिर्फ इतना है
एक जल के बुझता है, एक बुझ के जलता है।"
आजतक मतलब नही समझ पाया हूँ।
आज फिर दीपावली पर
दीपो की पंक्ति देखी।
और हर दीप के किनारे
जले सैकड़ों पतंगों को दम तोड़ते देखा.
कहीं ये पर्व प्रेम का मरघट तो नही?

ये पर्व तो अन्धकार का मरघट है ... अब प्रेम और अन्धकार मे कोई सम्बन्ध हो तो ये मुझे नही मालूम !!
प्रेम में जलना तो हर किसी को होता है. कभी विरह में तो कभी प्रेम की अतिशयता में.
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