प्रेत

मेरे अन्दर का प्रेत
एक दिन छटपटाने लगा
मेरी इच्छाओं को नोचने लगा
मेरी कविताओं को खाने लगा।

घबराहट में मैंने तेजी से
अपने ह्रदय के झोले मे हाथ डालकर
उसकी शक्ल देखनी चाही।
कुछ भी हाथ न आया
एक दर्पण के सिवा।

फिर अचानक ऐसा लगा
कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण
अनंत गुना बढ़ने लगा है
और मैं अपने ही बोझ से
पाँव के नीचे वाली जमीन मे दबा जा रहा हूँ।
कब्र मे आधा पड़ा हाथ पाँव चला रहा था।

गलती से, मेरा हाथ सर पर गया;
ओह! वहाँ तो प्रेत बैठा
बेवजह ही मेरा वजन बढ़ा रहा था.

4 टिप्पणियाँ

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आशीष said...

सुंदर रचना ...लिखना जारी रखें


Udan Tashtari said...

अब पता चल गया है तो भगाओ प्रेत को और जितनी खा गया है वो वापस लिखकर परसो.

बात गहरी की है-ये वो प्रेत ही है जो विचारों के माध्यम से मन में पैठ कर जाता है और हम कारण खोजते रहते हैं.


परमजीत बाली said...

बढिया रचना है।बधाई।


आलोक कुमार said...

समझ मे आया नही...

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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