प्रेत
मेरे अन्दर का प्रेत
एक दिन छटपटाने लगा
मेरी इच्छाओं को नोचने लगा
मेरी कविताओं को खाने लगा।
घबराहट में मैंने तेजी से
अपने ह्रदय के झोले मे हाथ डालकर
उसकी शक्ल देखनी चाही।
कुछ भी हाथ न आया
एक दर्पण के सिवा।
फिर अचानक ऐसा लगा
कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण
अनंत गुना बढ़ने लगा है
और मैं अपने ही बोझ से
पाँव के नीचे वाली जमीन मे दबा जा रहा हूँ।
कब्र मे आधा पड़ा हाथ पाँव चला रहा था।
गलती से, मेरा हाथ सर पर गया;
ओह! वहाँ तो प्रेत बैठा
बेवजह ही मेरा वजन बढ़ा रहा था.
एक दिन छटपटाने लगा
मेरी इच्छाओं को नोचने लगा
मेरी कविताओं को खाने लगा।
घबराहट में मैंने तेजी से
अपने ह्रदय के झोले मे हाथ डालकर
उसकी शक्ल देखनी चाही।
कुछ भी हाथ न आया
एक दर्पण के सिवा।
फिर अचानक ऐसा लगा
कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण
अनंत गुना बढ़ने लगा है
और मैं अपने ही बोझ से
पाँव के नीचे वाली जमीन मे दबा जा रहा हूँ।
कब्र मे आधा पड़ा हाथ पाँव चला रहा था।
गलती से, मेरा हाथ सर पर गया;
ओह! वहाँ तो प्रेत बैठा
बेवजह ही मेरा वजन बढ़ा रहा था.

सुंदर रचना ...लिखना जारी रखें
अब पता चल गया है तो भगाओ प्रेत को और जितनी खा गया है वो वापस लिखकर परसो.
बात गहरी की है-ये वो प्रेत ही है जो विचारों के माध्यम से मन में पैठ कर जाता है और हम कारण खोजते रहते हैं.
बढिया रचना है।बधाई।
समझ मे आया नही...
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