निर्माण

सूरज से रोशनी, चंदा से चाँदनी, फूलों से खुशबू चुराया
सपनों के सागर में, गीतों को गूंधा; प्यार में उसको मिलाया

तब जाके मेरे खुदा ने सनम, फुरसत से तुझको बनाया

अल्हड़ घटाओं से उसने, जुल्फें तेरी हैं सजायी
सागर से गहराई मांगी फिर आँखें तेरी है बनायी
सम्मोहन का काला जादू, भौहों को तेरे सिखाया
तब जाके मेरे......

4 टिप्पणियाँ

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Sanjeeva Tiwari said...

वाह विकास भाई ।
तब जाके मेरे महबूब नें मुझसे दिल लगाया ।

www.aarambha.blogspot.com


Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया, विकास. लगे रहो.


आलोक कुमार said...

क्या बात है... साहित्य वार्ता के लिये तैयार है न?


Mrs. Asha Joglekar said...

बहुल सुंदर । क्या कमाल की सोच है ।

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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