अकेले में कभी

नोट: यह कविता दिसंबर २००५ को लिखी गयी थी. उस समय मैं रोमन लिपि में लिखा करता था. आजदेवनागरी में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.



उस जीवन से इस जीवन तक
खाये हैं फल मैंने बहुतेरे!
पर घर के छोटे आंगन के
पहले अमरूद को कैसे भूलूँ?
ओ ऊँचे अमरूद की फुनगी
आ झुक जा! तुझको मैं छू लूँ.

वो पापा का फोन पे हँसना
पर अंदर अंदर ही घुटना
'पढ़ना है तो मत आओ तुम'
ये भी हँसते हँसते कहना.
दुर कहीं से फिर मम्मी का
ये चिल्लाना, 'बाबू आना..!'

प्यार की उस आवाज को सुनकर
मैं कठोर कैसे रह पाऊँ?
हाय रे ये आशा की कीमत!
चाहूँ, फिर भी जा ना पाऊँ.

माँ मेरी! तेरे बेटे ने,
जाने कैसा पाप किया है
जो नियति ने इस बालक को
ये निर्मम अभिशाप दिया है.

वो हँसता है, हँसी में पर
आह्लाद नहीं, कोई साथ नहीं है.
रोता है, पर रुदन में भी
वो बात नहीं, जज्बात नहीं है.
आँसू जो उसके पोंछ सके
वो हाथ नहीं है.

8 टिप्पणियाँ

Make A Comment

Udan Tashtari said...

भावुक!!


काकेश said...

खूबसूरत अभिव्यक्ति.

http://kakesh.com


सजीव सारथी said...

दर्द तो सच्चा है विकास, पर ये २००५ की बात है न, तभी की होगी क्योंकि अब तुम इतने अकेले नही हो


Manish said...

पहली बार घर से बाहर निकलने पर ऍसा अनुभव हर विद्यार्थी का होता है।


आलोक कुमार said...

अभिशाप के साथ कुछ वरदान भी मिल ही गये होंगे।


आलोक कुमार said...
This post has been removed by the author.

ashish said...

विकास जी .वैसे आपकी हर कविता अदभुत होती है ........
परंतु यह मेरी परिस्थिति से मेल खाती सीधे मन को छूती है ......
खासकर .......

प्यार की उस आवाज को सुनकर
मैं कठोर कैसे रह पाऊँ?
हाय रे ये आशा की कीमत!
चाहूँ, फिर भी जा ना पाऊँ.


Vipin Kumar said...

Lovely poem, liked the way you described the feelings.

Post a Comment


  • मेरे बारे में

    My Photo
    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
    View my complete profile
top