अकेले में कभी
नोट: यह कविता १ दिसंबर २००५ को लिखी गयी थी. उस समय मैं रोमन लिपि में लिखा करता था. आजदेवनागरी में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

उस जीवन से इस जीवन तक
खाये हैं फल मैंने बहुतेरे!
पर घर के छोटे आंगन के
पहले अमरूद को कैसे भूलूँ?
ओ ऊँचे अमरूद की फुनगी
आ झुक जा! तुझको मैं छू लूँ.
वो पापा का फोन पे हँसना
पर अंदर अंदर ही घुटना
'पढ़ना है तो मत आओ तुम'
ये भी हँसते हँसते कहना.
दुर कहीं से फिर मम्मी का
ये चिल्लाना, 'बाबू आना..!'
प्यार की उस आवाज को सुनकर
मैं कठोर कैसे रह पाऊँ?
हाय रे ये आशा की कीमत!
चाहूँ, फिर भी जा ना पाऊँ.
माँ मेरी! तेरे बेटे ने,
जाने कैसा पाप किया है
जो नियति ने इस बालक को
ये निर्मम अभिशाप दिया है.
वो हँसता है, हँसी में पर
आह्लाद नहीं, कोई साथ नहीं है.
रोता है, पर रुदन में भी
वो बात नहीं, जज्बात नहीं है.
आँसू जो उसके पोंछ सके
वो हाथ नहीं है.

उस जीवन से इस जीवन तक
खाये हैं फल मैंने बहुतेरे!
पर घर के छोटे आंगन के
पहले अमरूद को कैसे भूलूँ?
ओ ऊँचे अमरूद की फुनगी
आ झुक जा! तुझको मैं छू लूँ.
वो पापा का फोन पे हँसना
पर अंदर अंदर ही घुटना
'पढ़ना है तो मत आओ तुम'
ये भी हँसते हँसते कहना.
दुर कहीं से फिर मम्मी का
ये चिल्लाना, 'बाबू आना..!'
प्यार की उस आवाज को सुनकर
मैं कठोर कैसे रह पाऊँ?
हाय रे ये आशा की कीमत!
चाहूँ, फिर भी जा ना पाऊँ.
माँ मेरी! तेरे बेटे ने,
जाने कैसा पाप किया है
जो नियति ने इस बालक को
ये निर्मम अभिशाप दिया है.
वो हँसता है, हँसी में पर
आह्लाद नहीं, कोई साथ नहीं है.
रोता है, पर रुदन में भी
वो बात नहीं, जज्बात नहीं है.
आँसू जो उसके पोंछ सके
वो हाथ नहीं है.

भावुक!!
खूबसूरत अभिव्यक्ति.
http://kakesh.com
दर्द तो सच्चा है विकास, पर ये २००५ की बात है न, तभी की होगी क्योंकि अब तुम इतने अकेले नही हो
पहली बार घर से बाहर निकलने पर ऍसा अनुभव हर विद्यार्थी का होता है।
अभिशाप के साथ कुछ वरदान भी मिल ही गये होंगे।
विकास जी .वैसे आपकी हर कविता अदभुत होती है ........
परंतु यह मेरी परिस्थिति से मेल खाती सीधे मन को छूती है ......
खासकर .......
प्यार की उस आवाज को सुनकर
मैं कठोर कैसे रह पाऊँ?
हाय रे ये आशा की कीमत!
चाहूँ, फिर भी जा ना पाऊँ.
Lovely poem, liked the way you described the feelings.
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