वाणी का ब्लोग

जैसा कि मैंने पहले बताया था, कुछ लोगों ने मिलकर IIT मुम्बई मे हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसारार्थ एक नया समूह बनाया है - 'वाणी'। इस समूह की गतिविधियों को थोडा और आगे बढाते हुए हमने एक नए ब्लोग का निर्माण किया है जिसमे सिर्फ और सिर्फ छात्रों की रचनायें प्रकाशित की जाएँगी। चुंकि ये सारे आभियांत्रिकी के छात्र हैं और इनमे से कई अहिन्दीभाषी क्षेत्रों के भी हैं तो संभव है कि रचनायें सुधिजनों को परिष्कृत ना लगें। परंतु इन्हें उत्साह की अत्यंत आवश्यकता है। सो आप इस ब्लोग पर अवश्य पधारें एवं इन नव-कुसुमों को पल्लवित होने का आशीर्वाद दें। ब्लोग का लिंक यह रहा : http://iitbkivaani.wordpress.com/

15 टिप्पणियाँ

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संजय तिवारी said...

पाठक तैयार करने के लिए ही प्रयास कर रहे हैं न?


संजय तिवारी said...

अच्छा मजाक है, आईआईटीवाले भी कविता कर रहे हैं. हिन्दी का सत्यानाश ऐसे ही थोड़े होगा.


विकास कुमार said...

संजय जी, चाहे और कुछ भी हो - यह मजाक तो बिलकुल नहीं है.


इष्ट देव सांकृत्यायन said...

सूचना के धन्यवाद. क्या ही बेहतर हो, अगर वैज्ञानिक सोच और दृष्टि से सम्पन्न लोग हिंदी में विज्ञान साहित्य लिख कर भाषा और परम्परा को समृद्ध बनाएं.


संजय बेंगाणी said...

अच्छा प्रयास है, शुभकामनाएं.


आशीष said...

शुभकामनाएं.


दुर्गा said...

अच्छा प्रयास है, शुभकामनाएं.


नूर मोहम्मद खान said...

बहुत अच्छा प्रयास है।
मैं वाणी पर गया और मुझे ये प्रयास बहुत पसन्द आया।


अभिनव said...

वाह विकास, वाणी देखकर चित्त प्रसन्न हो गया


अनिल रघुराज said...

चलने से ही राह निकलती है। वाणी का प्रयास काफी सराहनीय है।


Udan Tashtari said...

बहुत अच्छा प्रयास है, मेरी शुभकामनाएं. समय समय पर जाता रहूँगा आपके आदेशानुसार हौसला बढ़ाने. IIT केम्पस में भी साधुवाद का प्रचलन जल्द ही पायेंगे. :)


ALOK KUMAR said...

अरे विकाश सिर्फ और सिर्फ़ छात्रों क!!े……कुछ कविता छात्राओं के भी रहेंगे :p…वैसे बहुत ही अच्छा ब्लोग है और बहुत ही प्रशसा हो रही है:)


Neeraj Rohilla said...

विकासजी,
हम तो आते ही रहेंगे, साधुवाद स्वीकार करें ।

समीरजी की बात में दम है, ईश्वर करे कैम्पसों में साधुवाद की भावना जल्दी ही फ़ैले ।


अनूप शुक्ल said...

अच्छा है। लिखो-लिखाऒ। कविता ही क्यों? लेख संस्मरण और दूसरी चीजें भी आनी चाहियें।


Shrish said...

वाह स्वागत है, आप शुरु तो कीजिए, हम हैं न पढ़ने के लिए।

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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