आई आई टी बी की वाणी

बहुत प्रयास, मित्रों के साथ एवं उत्साही कवियों के सानिद्ध्या के कारण, मैंने एक क्लब तो बना लिया लेकिन उसका भविष्य कैसा होगा - यह संशय मन मे सदैव बना रहता था। यद्यपि आलोक का उत्साह एवं समय समय पर उसकी क्रियाशीलता देख मन को थोड़ी शांति मिला करती थी तथापि मन का भय कभी कम ना हुआ।

वाणी - हिंदी अभिव्यक्ति का मंच। जब हम अपने हिंदी के इस समूह के लिए पहली बार मिले थे तो ५-६ लोग ही थे। आई आई टी जैसे संस्थान मे इससे अधिक संख्या की मुझे उम्मीद ना थी। बस कुछ ही दिनों पहले की बात है। १५ अगस्त को हमने यह निश्चित किया कि संस्थान मे हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए एक ऐसे मंच की आवश्यकता है जो लेखन, श्रवण एवं वाचन तीनों को प्रश्रय दे। यहां साहित्य के कुछ समूह क्रियाशील थे। वाद विवाद, कवितायेँ, वाचन शैली - सबके समूह हैं, परंतु सब कुछ अंग्रेजी। यह बात मुझे सदा खलती थी। प्रथम वर्ष से ही मैंने कोशिश की कि हिंदी को भी अपनी प्रतिभागिता मिले। परंतु ऐसा हो ना सका। शायद समान भावों के साथ आवाज नाम के समूह की रचना की गयी थी। परंतु आज वह साहित्य सेवी ना बनकर, एक अखबार मात्रा हो गया लगता था। मेरे इस विचार के समर्थन के लिए कुछ लोग मिले। फिर क्या था, हो गयी शुरुवात।

आनन फानन मे हमने वो सब कुछ कर दिया जो एक तकनीक का छात्र कर सकता है। गूगल पर समूह की रचना की, (आज समूह में १२० सदस्य हो चुके हैं) ईमेल द्वारा लोगों को आमंत्रित किया, एक ब्लोग भी बनाया गया, कुछ को हिंदी टायपिंग सिखाई और हिंदी मे पोस्टर बना कर सारे संस्थान मे लगा दिए गए। संख्या बढने लगी। कभी कभी मिलना होने लगा। फिर पता चला कि प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए एक सांस्कृतिक सप्ताहंत का आयोजन किया जा रहा है जिसमे प्रतियोगिताएं होगी। फिर क्या था...? वाणी के सौजन्य से एक हिंदी कविता प्रस्तुतीकरण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतिभागियों की संख्या अनुमान से अधिक थी। करीब ३५-४० लोग रहे होंगे। कौन कहता है कि उच्च शिक्षा मे हिंदी प्रेमी नहीं होते...? तब मुझे अनुमान हुआ कि इतने लोग जो हिंदी का प्रेम लिए आते हैं, उनका प्रेम धीरे धीरे क्षीण क्यों होता जाता है। जब अवसर ही नही होंगे, तो प्रेम उमडेगा कैसे?

हमारा उद्देश्य बस अवसर प्रदान करना है। इस कार्यक्रम की सफलता से उत्साहित होकर हमने एक और इसी तरह की प्रतियोगिता का आयोजन किया जो सभी वर्ष के छात्रों के लिए था। आलोक, मोंटी, आशीष, वैभव - कितनों ने कोशिश की कि कार्यक्रम सफल हो। यद्यपि प्रारम्भ मे केवल १० लोग उपस्थित थे और धीरे धीरे संख्या ३०-३५ तक ही पहुंची, लेकिन एक खास बात रही। वो यह कि अधिकांश लोगों ने अपनी स्वरचित कवितायेँ सुनायी। यहां भी ३० कवि हो सकते हैं, इसकी कल्पना मैंने ना की थी। हमारी उम्मीद से कम लोग आये, परंतु हम हतोत्साहित नही हैं। हमे गर्व है कि इतने कम समय मे हमने इतना कुछ कर लिया है। वो लोग जो आजतक मंच पर नही आये थे, उन्होने भी अपनी कवितायेँ सुनायी। कुछ वरीय छात्र भी आये, संख्या कम थी - लेकिन आये. (यहां यह कितना दुर्लभ है, कौन नही जानता?) और प्रथम वर्ष के छात्रों का जो उत्साह देख रहा हूँ, जो प्रतिभाएं सामने आ रही हैं- उससे भविष्य उज्जवल दिख रहा है. अतः हमारी यह कोशिश उस दम तक जारी रहेगी, जबतक हिंदी को यथोचित सम्मान नही मिलता।

और अन्त मे सबसे महत्वपूर्ण बात! कल की काव्य संध्या मे अनिता कुमार जी ने, जो कि एक हिंदी ब्लॉगर एवं कवियित्री हैं - स्वेच्छा से अपने पति समेत पधारी थीं। निर्णायक होने का गुरुतर भार भी उन्होने अपने कंधे पर लिया। कुछ मनुहारी कवितायेँ भी सुनायी. ना जाने कहॉ से मेरा नम्बर ढूँढ कर, स्वयम आगे आकर इस समूह से जुड़ने की बात की थी इन्होने - ५२ वर्षीया, युवा हृदयी अब मिलते ही कहॉ है? धन्यवाद किस मुख से करूंगा? नमन करता हूँ। आप जैसे लोग हम बच्चों का मार्गदर्शन करते रहें और उत्साह बढाते रहें - हमारा प्रयास स्वमेव सफल हो जाएगा। हिंदी को आप जैसे लोगों की अत्यंत आवश्यकता है।

बस इतना ही। जो लोग जुडे हैं, वो जुडे रहें। अन्य उत्साहियों को जुड़ने की प्रेरणा दें। अंत मे भारतेंदु की पंक्ति कहना चाहूँगा:
"अंग्रेजी पढ़ के जदपि सब गुन होत प्रवीण
पर निज भासा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।"

6 टिप्पणियाँ

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Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया! शुभकामनाएं!
अनीता कुमार जी के उत्साह से मैं भली-भांति परिचित हूं, काबिले-तारीफ़ है!!


Udan Tashtari said...

वाह भई, बहुत शुभकामनायें एवं अनिता जी को शुभकामनायें.


अफ़लातून said...

हिन्दी-प्रेमी समूह को शुभकामना ।


yunus said...

हम भी । हम भी । हम भी आयेंगे । पर हमारे पास समय की कमी है ।


alok kumar said...

बहुत अच्छा लेख!! ...और हाँ हमारे यहाँ सभी लोग आते रहें तो अच्छा लगेगा :)


Vipin Kumar said...

Mere office mein hindi typing software install nahi ho sakta hai toh mein english mein hi likhunga.

Haan, sabse pehle Vaani ko sthapit karne ke liye bahut bahut mubarakein. Par yadi aap thoda sa iitb ke hindi-prem ke itihaas ko khodien toh aapko pata chalega ki hindi kavita vachan ke liye hindi club mein pratiyogitaayein aayojit karwayi thi.

Yadi aap ussey aagey badhkar aur kuch naya karein toh dil ko bahut khushi hogi. Udharan toh aapney hi de diye hai, jaise hindi mein dumb-c, extempore ( jo ki IIM A mein hota hai ) wagerah wagerah.

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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