गुलज़ार की कुछ त्रिवेणियाँ

कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे

ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।

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वह मेरे साथ ही था दूर तक मगर इक दिन
जो मुड़ के देखा तो वह दोस्त मेरे साथ न था

फटी हो जेब तो कुछ सिक्के खो भी जाते हैं।

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सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर

कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।

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शोला सा गुज़रता है मेरे जिस्म से होकर
किस लौ से उतारा है खुदावंद ने तुम को

तिनकों का मेरा घर है,कभी आओ तो क्या हो?

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आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!

चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा

5 टिप्पणियाँ

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yunus said...

छा गये


Udan Tashtari said...

सुन्दर त्रिवेणियाँ है. गुलजार जी इस विधा के जन्मदाता है. उनकी त्रिवेणियों का कोई जबाब नहीं.

आभार इस प्रस्तुति का.


Manish said...

विकास, शीर्षक 'गुलजार की चंद त्रिवेणियाँ' कर दो। बेहतर रहेगा।
बहुत सुंदर त्रिवेणियाँ चुनी हैं तुमने।
'कोई बात चले' में वो सुबह का अखबार...वाली त्रिवेणी खुद गुलज़ार की आवाज़ में है।


deepanjali said...

सुंदर है बहुत अच्छा लगा


prabhakar said...

क्या विकास जी धमाका कर रहे हैं?

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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